उत्तराखण्ड में जो एक……

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उत्तराखण्ड में जो एक बार विधायक बन गया तो मान लिया जाता है कि उसकी सात पीढ़ियों को कुछ करने की जरूरत ही नहीं रहती। आलीशान सुविधाएं भोगने के आदी हो चुके ये विधायक सात दिन सुविधाजनक टेंटों में भी नहीं रहना चाहते। ऐसे में उनसे राज्य के विकास की उम्मीद करना बेमानी है। लगता नहीं कि गैरसैंण सत्र में कुछ सार्थक हो पाएगा। जीवन में उतार-चढ़ाव लगा रहता है। समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता है। कभी सुख है तो कभी दुख। आलीशान सुविधाएं भोगने के आदी हो चुके उत्तराखण्ड के विधायकों के लिए जीवन की इस सच्चाई के कोई मायने नहीं रहे।

लगता है कि पांच साल में वे अपने और अपनी सात पीढि़यों के लिए इतना बटोर लेते हैं कि महज सात दिन भी टेंटों में नहीं रहना चाहते। यही वजह है कि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में टेंटों में सत्र के आयोजन पर आपत्ति जताई तो मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत को आग्रह करना पड़ा कि विधायक सात दिन कष्ट उठाएं। पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्री की बातों का निचोड़ यही है कि विधायक इतने सुविधाभोगी हो चुके हैं कि उन्हें सात दिन टेंट में रहना खल रहा है। हालांकि वे मरे मन से गैरसैंण तो पहुंचेंगे, टेंट में भी रहेंगे, लेकिन जो विधायक देहरादून की आलीशान सुविधाएं भोगने पर भी जनहित में कुछ हासिल नहीं कर पाए उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि टेंट में उनका दिमाग ठीक से काम कर पाएगा?

ऐसे में इन आशंकाओं को निराधार नहीं कहा जा सकता है कि गैरसैंण में सत्र के नाम पर सिर्फ फिजूलखर्ची होगी। विधायकों को समझना चाहिए कि उन्हें तो टेंटों में सारी सुविधाएं मिलेंगी। देहरादून की तरह नौकर-चाकर उनके पीछे होंगे। शानो-शौकत में कोई कमी नहीं रहेगी, लेकिन वे भी तो लोग हैं जो आपदा से त्रस्त होकर पिछले दो सालों से बेघर हैं। सब कुछ तबाह होने के चलते उनके सम्मुख फिर से जीवन शुरू करने की अहम चुनौती खड़ी है और कहीं से कोई मदद या दूर-दूर तक कोई रास्ता उन्हें नहीं दिखाई देता। विकास की विनाशकारी परियोजनाओं के चलते लोग गुफाओं में तक जीवन जीने को मजबूर हुए।

संवेदनशील क्षेत्रों में लोग खतरे का अहसास होते ही सुरक्षित जगहों पर जाकर खुले आसमान तले रातें काटते हैं। समझ नहीं आता कि विधायकों को गैरसैंण से इतना डर क्यों? आखिर वहां भी तो लोग रह रहे हैं? आम लोगों की बात न भी करें तो वहां पंचायतों के प्रतिनिधि अपनी बैठकें करते हैं, वे भी तो जनता से चुने हुए हैं? क्या उन्हें जनप्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए? विधायक उनसे सीख तो लें कि वे कैसे दूर-दराज के क्षेत्रों में रह पाते हैं। सच तो यह है कि विधायक कभी भी पंचायत प्रतिनिधियों को अहमियत नहीं देंगे, वे तो उन्हें सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु समझते हैं।

चुनावों में उनका इस्तेमाल सिर्फ भीड़ जुटाने और वोट बटोरने के लिए करते हैं। दुखद यह है कि पंचायतें अभी इस बारे में जागरूक नहीं हो पाई हैं कि उनके अधिकारों पर डाका डालने वाले देहरादून में आलीशान सुविधाएं भोगते हुए उल्टे उन्हीं पर राजनीति कर रहे हैं। दरअसल, दिक्कत यह है कि राज्य की जनता ने पिछले पंद्रह सालों में कोई भी ऐसा सक्षम नेतृत्व पैदा नहीं किया जिसमें विकास की सोच और कुछ करने का जज्बा हो। उत्तराखण्ड से लगे हिमाचल के सिरमौर जिले में जन्मे डाॅ . वाईएस परमार में दूरदर्शिता और सोच रही तो हिमाचल प्रदेश सर्वांगीण विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ता गया।

डाॅ . परमार का नाम हिमाचल के लोग बड़े आदर से लेते हैं। हर पार्टी के नेता उनके रास्ते पर चलने की बात करते हैं। इसी तरह एक समय वृहद पंजाब में प्रताप सिंह कैरो ने राजधानी चंडीगढ़ ले जाने का विचार किया तो तब वहां कुछ नहीं था। सिर्फ कैरो की इच्छाशक्ति थी कि उन्होंने चंडीगढ़ में टेंटों में राजधानी चलाई और इसे दुनिया के सबसे सुव्यवस्थित शहरों में शामिल कर दिया। दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में पिछले पंद्रह सालों में यह तक तय ही नहीं हो पाया है कि गैरसैंण में सिर्फ कैबिनेट मीटिंग और कभी-कभार सत्र चलेगा या स्थाई राजधानी बनेगी। गैरसैंण की तो छोडि़ए देहरादून में भी यदि कुछ हुआ होता तो आज यह देश के सबसे गंदे शहरों में शामिल न होता।

जाहिर है कि राज्य बनने के बाद यहां भी विकास के नाम पर भ्रष्टाचार ही होता रहा। भ्रष्टाचार राज्य के लिए नासूर बन गया है। ऐसे में यह बात समझ से परे है कि जो विधायक सात दिन टेंटों में नहीं रहना चाहते कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय कैसे उनसे संपत्ति सार्वजनिक करने की उम्मीद कर बैठे हैं। आखिर किशोर क्या जताना चाहते हैं? अगर वे संपत्ति सार्वजनिक कर भी दें तो क्या हो जाएगा? कौन नहीं जानता कि आज के समय में विधायकों के धंधे अपने परिजनों के नाम से चलते हैं। उनकी करोड़ों-अरबों की संपत्ति भी परिजनों के नाम पर ही होती है। बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि गैरसैंण सत्र में कुछ ठीक हो सकेगा। यह सत्र भी पिछली बार की तरह फिजूलखर्ची की भेंट नहीं चढ़ेगा।

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