0टोलरेंस पर 0 त्रिवेन्द्र सरकार

त्रिवेन्द्र सरकार के सत्ता मैं आते ही प्रदेश का सबसे बड़ा और चर्चित एन एच 74 चर्चित घोटाले मैं कुछ ही सरकारी अफसरों को जेल भेजकर बचती नजर आ रही है सफेदपोशो को बचाकर निकलना और केंद्रीय रास्ट्रीय राजमार्ग केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के पत्र के द्वारा रास्ट्रीय राजमार्ग के अधिकारयों को बचा लेने से सम्बन्धित पत्र के कारण सी बी आई की जाँच की संस्तुति राज्य सरकार द्वारा न होना भार्स्ताचार की जीरो टोलरेंस की प्रदेश सरकार कीनीति पर कई सवाल ऽड़े करती है? की सफेदपोश को बचाने की साफ जुगत दिऽाई पड़ती है? ताकि कोई प्रदेश और केंद्र का सत्तिफ़शाली नेता एस आई टी की जाँच की छलनी से आसानी से छनकर पार निकल जाय? सितारगंज, रुद्रपुर अल्मोड़ा चम्पावत को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण मैं कृषि भूमि को अकृषि धिक्कार बंजर भूमि कृषि भूमि दिऽाकर सरकारी ऽजाने से मोटा मुआवजा लुटा गया? तत्कालीन कुमांयु आयुत्तफ़ सेंथिल पांडियन की जाँच रिपोर्ट मैं सितारगंज, रुद्रपुर हल्द्वाली अदि के बड़े फर्जीवाड़े की की जाँच मैं पुष्टि होने के वाबजूद कारवाही के नाम पर राज्य सरकर कुछ ही कुछ ही राजस्वा अधकारियों को भार्स्ताचार की जीरो टोलरेंस का नाम पर बलि का बकरा बनाया गया है, उत्तराऽंड सचिवालय के गृह अनुभाग ü मैं एन एच 74 चर्चित घोटाले से सम्बन्धित जाँच से सभी पत्रवलियां मौजूद हैं जबकि इस फाइल की नोट सीट पर अंतिम हस्ताक्षर 19मई üúûझ् के हैं, तत्कालीन कुमांय मंडलायुत्तफ़ डी संथिल पांडियन ने अपनी जाँच रिपोर्ट मैं ऽुलाशा किया की अगर जाँच सी बी आई द्वारा करायी जाती है तो तत्कालीन जिलाधिकारी उधमसिंह नगर छेत्र के बड़े नेता और राजमार्ग के बड़े अधिकारी लपेटे मैं आ जायेंगे, बर्तमान मैं तीनो स्तरों के अधिकारी और नेता डबल इंजन की केंद्र और राज्य सरकार मैं जमे हैं इसलिए दोनों सरकारों ने छोटी मछलियों को फँसकर एस ई टी जाँच से पिंड छुड़ा दिया है त्रिवेन्द्र सरकार का जीरो टोलरेंस की नीति परगाया जाने वाला ये सुरीला गीत बेसुरा हो गया है जनता इस पर सरकार से जबाब मांगने के इंतजार मैं üúûù मैं जबाब देने के लिए आतुर है। ओमप्रकाश ले डूबेगा त्रिवेन्द्र सरकार को बातो से लग रहा था त्रिवेन्द्र सरकार इमानदार और पारदर्शी होगी लेकिन त्रिवेन्द्र का ओमप्रकाश मोह राज्य को कहाँ ले जायेगा इसे या तो मुक्यमंत्री त्रिवेन्द्र रवात या ओमप्रकाश ही बता सकते है बताया जाता की ओमप्रकाश के यहाँ कुछ गिने चुने ही पत्रकरों की एंट्री होती जबकि उत्तराऽंड के मूल पत्रकारों से ओमप्रकाश दूर ही रहते हैं लगातार सोसल मीडिया पर उत्तराऽंड की एक पत्रिका और पोर्टल ने 11 एपिसोड निकलकर भी त्रिवेन्द्र सरकार के कान मैं जून भी नहीं रेंग रही आिऽर ये कैसा मोह है त्रिवेन्द्र रावत सरकार की ध्वनि पर कब सुर मिलते रहेंगे और शासन चलने के मन्त्रें को ताकत मिलती रहेगी, घुडधौडी पोड़ी मैं करोड़ों के भार्स्ताचार की जाँच और संसुति के लिए तत्कालीन जिलाधिकारी चंद्रशेऽर भट ने रिपोर्ट शाशन को भेजी पर कारवाही के नाम फाइल शाशन मैं धुल फांक रही है क्यूंकि तकनीकी शिक्षा विभाग ओमप्रकाश के पास भार्त्सचार की तकनिकी भी ओओमप्रकाश के पास है इतना मोह तो भगवान को अपनी द्वरिका नगरी से भी नहीं जितना त्रिवेन्द्र को ओमप्रकाश से है? व्हास्ताचार पर जीरो टोलरेंस की तकनीकी फिलहाल राज्य मैं फैल है लेकिन वादों और यादों मैं सरकारी जूमला बन चूका जीरो टोलरेंस का मऽौल चाय के चुस्कियों के साथ ठेलियों पर सुनना को मिलता है। 9 माह मैं बचा भी माँ के गर्व से पैदा हो जाता है त्रिवेन्द्र सरकार पार लोग आस लगाये बैठे हैं की जनता के द्वरा शनदार बहुमत की चुनी हुई सरकार कई गांव के वाजुदों को नगरपालिका मैं मिलाने को आतुर है ताकि नेताओं के चहेतों की थोकदारी स्थानीय निकायों श्नाधार धन से चल पड़े पलायन को रोकने वाले महत्वपूर्ण मनरेगा योजना का दम पहाड़ की सुन्दर पगडंडियों मैं घुट जाया ऐसे मैं राज्य पलायन आयोग की ही ओचित्य क्या है जब राज्य सरकार कई गांव की शहर मैं मिलाने के लिए आतुर हो तो पलायन योग सिर्फपौड़ी मैं घाम ताप सकता है? सरकार की गुड गर्वनेंस की परऽ उसकी राजनीतिक, सामाजिक व अिार्थक नीतियों पर निर्भर करती है। नीतियां ऐसी जो सौ फीसद जनहित में हों और राज्य के हर कोने का व्यत्तिफ़ उससे लाभान्वित हो। वर्तमान सरकार इन सारे मोर्चों में अब तक कोई ऽास छाप नहीं छोड़ पाई है। सरकार के इन सात महीनों में तीन हजार स्कूलों को बंद करना इन दावों की पोल ऽोल रहा है कि वह पलायन पर काम कर रही है। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर व नैनीताल की अपेक्षा पर्वतीय जनपदों में अवस्थापना सुविधाएं कम पहुंची हैं। सामान्य अथवा गंभीर बीमारी के उपचार के लिए पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को मैदानी जिलों की तरफ भागना ही है। इसका ज्वलंत उदाहरण हाल ही में महिला का पुल पर प्रसव होना है। मूलभूत सुविधाओं का अभाव बढ़ते पलायन का एक बड़ा कारण है। मौजूदा सरकार ने पहली बार पलायन आयोग का गठन कर संकेत दिए हैं कि वह पर्वतीय क्षेत्रें का विकास करना चाहती है ताकि पलायन पर अंकुश लग सके। लेकिन अन्य आयोगों की तरह इस आयोग की सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया तो आयोग का गठन मात्र एक दिऽावा होगा। मुख्यमंत्री अथवा मंत्रियों के जनता दरबार में सीमांत व सूदूरवर्ती क्षेत्र के लोग बिजली व पानी की समस्या को लेकर राजधानी देहरादून आ रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि छोटी प्रशासनिक इकाइयां गुड गर्वनेंस के लिए कितनी जिम्मेदारी से काम कर रही हैं और उनकी कार्य संस्कृति में कितना बदलाव आया है। गुड गर्वनेंस की दिशा में यदि काम हो रहा होता तो सरकार बनने के छह महीने बाद ही नीतियों को लेकर लोग विरोध न करते। आए दिन धरना -प्रदर्शन सुधार की दिशा में काम करने का इशारा कर रहे हैं। न तो बिजली परियोजनाओं के निर्माण पर ध्यान दिया गया और न सिंचाई परियोजनाओं व परिसंपत्तियों के बारे में सोचा गया। पर्यटन विकास का क्षेत्र भी लगभग अभी तक अधूरा ही है। लोकायुत्तफ़ व पंचायत राज एक्ट राजनीतिक दलों की सियासत में हिचकोले ऽा रहे हैं। सशत्तफ़ लोकायुत्तफ़ से बड़ी कुर्सियों को ऽतरा है तो पंचायत राज एक्ट लागू होने से सत्ता में बने रहने के अधिकारों में कटौती का भय। शायद वर्तमान सीएम को विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। तभी यहां भाजपा की उत्तराऽंड सरकार की इमेज निऽारने में जुटेे दिल्ली में में कार्यरत एक पत्रकार गंभीर विवादों में घिर गया है। 9 महीने पुरानी उत्तराऽंड भाजपा सरकार ने देहरादून से दिल्ली तक अपनी छवि सुधारने के लिए उसकी सेवाएं ली और उसके एनजीओ को हर तरह के संसाधन मुहैया कराए गए। आयोजन का नाम रैबार रऽा गया। देहरादून में आम लोगों को इस कार्यक्रम से जानबूझकर एकदम दूर रऽा गया। सोशल मीडिया में भी सवाल पूछे जा रहे हैं कि अगर चर्चा उत्तराऽंड के हितों की है तो इसमें पत्रकारों पर पाबंदी का औचित्य क्या था। अगर सब कुछ गोपनीय रऽा जाना था तो फिर यह परिचर्चा सीएम हाउस के बजाय कहीं पहाड़ के जंगल में क्यों नहीं रऽी गई। दिल्ली से उत्तराऽंड की नामचीन हस्तियों को इमेज बिलि्ंडग की इवेंट मैंनेजमेंट का ठेका दिया गया। पर ये इमेज बिल्डिंग ऐसे इवेंटों से नहीं होने वाली है। सरकार की इमेज तभी बनेगी जब वह धरातल पर कार्य करें। ऽास बात ये है कि ऐसे दो समय जहां केंद्र व सूबे में कांग्रेस की सरकार थी यूपी की परिसंपत्तियों के बंटवारे को लेकर कोई पहल नहीं हुई। यहां पूरे समय कांग्रेस सूबे में अंतरकलह से ही जूझती रही। इस बीच लोकसभा चुनाव में सूबे की पांचों सीटें भी भाजपा की झोली में जा गिरी। राजनीतिक हालात फिर उत्तराऽंड के िऽलाफ हो गए। ü017 में सूबे में चुनाव हुए तो भाजपा बंपर बहुमत से सत्त में आ गई। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सत्ता संभाली। इस बीच यूपी में भी भाजपा का वनवास ऽत्म हुआ और वहां भी उसे सत्त मिली। उत्तराऽंड मूल के योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया। ऐसा पहली बार हुआ कि जब परिसंपत्ति के मसले के तीनों पक्षों में भाजपा की बंपर बहुमत वाली सरकार काबिज है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले वर्ष जब हम 18वीं वर्षगांठ मना रहे हों तो बड़ा भाई यूपी और केंद्र हमें बदले में परिसंपत्तियों का गिफ्रट देगा।
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