थ्री पी’ फाॅर्मूला अपनाएं

 

06_02_2016-06uttrakhand01

 

दाताराम चमोली

उत्तराखण्ड सरकार को चाहिए कि पहाड़ पर सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की तैनाती के लिए ‘थ्री पी’ फाॅर्मूले पर विचार करे। कम से कम इसी बहाने स्कूलों में शिक्षक और अस्पतालों में डाॅक्टर तो दिखेंगे।

हाल में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने नई दिल्ली स्थित उत्तराखण्ड सदन में दिल्ली में कार्यरत उत्तराखण्ड के पत्रकारों को रात्रि भोज पर आमंत्रित किया। ऐसा लगा कि इस भोज के बहाने उनका उद्देश्य पत्रकारों से बेहतर संवाद कायम करना था। उनसे राज्य के विकास में सहयोग की अपेक्षा थी। यही वजह है कि बातचीत में उन्होंने जहां विकास में आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को लेकर पत्रकारों से खुलकर बात की, वहीं पत्रकारों के सुझावों को भी गंभीरता से सुना। गैरसैंण, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, रोजगार जैसे बुनियादी विषयों पर चर्चा हुई। चिंता जाहिर हुई कि पहाड़ खाली हो रहा है। इस पर मैंने भी मुख्यमंत्री को सुझाव दिया कि कुछ चीजें हम यूपी से भी सीख सकते हैं। मसलन अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय ‘थ्री पी’ यानी पनिशमेंट (दंड), प्रोबेशन (परीक्षण) और प्रमोशन (प्रोन्नति) फाॅर्मूला अमल में लाया जाता था। जिस किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को दंड देना होता था तो उसे पहाड़ भेज दिया जाता था। नए अधिकारी या कर्मचारी को प्रोबेशन पर पहाड़ भेज दिया जाता था। यानी किसी भी नए डाॅक्टर या स्वास्थ्यकर्मी के लिए पहाड़ के लोग अनुभव हासिल करने के लिए अच्छे साधन थे। प्रमोशन के तौर पर किसी अधिकारी को पहाड़ में मानो कमाई करने के लिए भेज दिया जाता था।

अविभाजित उत्तर प्रदेश की तमाम सरकारों ने इस फाॅर्मूले को अच्छी तरह आजमाया। यह अलग बात है कि राज्य आंदोलनकारियों और जागरूक लोगों की ओर से इसका विरोध होता रहा। लेकिन इस फाॅर्मूले के चलते पहाड़ के अस्पतालों में डाॅक्टर देखने को मिल जाते थे। स्कूलों में अध्यापक थे। अन्य सरकारी विभागों में भी कर्मचारी थे। मैंने मुख्यमंत्री को सलाह दी कि भले ही सरकार और कुछ न कर पाए थ्री पी फाॅर्मूले पर अवश्य विचार कर ले। कम से कम इससे अस्पतालों, स्कूलों और अन्य विभागों में स्टाफ तो दिखाई देने लगेगा। इस पर मुख्यमंत्री मुस्कराए और उन्होंने कहा कि कल एक अन्य व्यक्ति ने भी यही सुझाव दिया था। उन सज्जन ने क्यों यह सुझाव दिया होगा, ये तो वही जानें या फिर मुख्यमंत्री जी समझ सकते हैं। हां, मैंने तो इसलिए यह बात कही कि जो लोग पिछले सोलह साल से बेहद हताश और निराश हो चुके हैं, शायद थ्री पी फाॅर्मूला लागू होने से उन्हें कुछ उम्मीदें जग जाएं। पनिशमेंट पर गया कोई डाॅक्टर या स्वास्थकर्मी बुरे वक्त पर उन्हें थोड़ी भी स्वास्थ्य सुविधा दे पाए तो शायद वह उनके लिए भगवान साबित हो जाए। गांवों में उल्टी-दस्त होने पर लोगों को ग्लूकोज चढ़ाने वाला कोई नहीं होता। मामूली सा इलाज न मिलने पर लोग अकाल मौत के ग्रास बन जाते हैं।

फिर सोलह साल में राजनीतिक हालात भी तो बदल गए हैं? अविभाजित उत्तर प्रदेश में बेशक काम न करने वाले स्टाफ को पहाड़ों पर भेजा जाता रहा हो, लेकिन उत्तराखण्ड में ऐसी संभावनाएं नहीं रहेंगी। कारण कि यहां जिन अधिकारियों को दंडित होना चाहिए वे सरकारों को कुछ ज्यादा ही प्यारे लगे हैं। बहुत से ऐसे भ्रष्ट अफसर हैं जिन्हें हर सरकार के समय महत्वपूर्ण दायित्व मिले हैं। जाहिर है कि पनिशमेंट पर उसी अच्छे स्टाफ को पहाड़ भेजा जाएगा जिसका कहीं कोई राजनीतिक जुगाड़ न हो। वैसे भी राजनीतिक जुगड़बाजी में अच्छा आदमी हमेशा पिछड़ जाता है। दरअसल, उसे अपनी योग्यता पर भरोसा होता है इसलिए उसका स्वाभिमान उसे नेताओं की चंपुगिरी की इजाजत नहीं देता। ऐसे अधिकारी या कर्मचारी यदि सजा पर पहाड़ भेज दिए जाएं, तो वे हताश-निराश जनता के लिए वरदान भी साबित हो जाएंगे। प्रोबेशन और प्रमोशन पर भी वही स्टाफ पहाड़ भेजा जाएगा जिसके लिए देहरादून या मैदानी शहरों में कोई जगह न हो? यानी तीनों श्रेणियों में जो भी स्टाफ पहाड़ भेजा जाएगा उसके ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ होने की संभावनाएं ज्यादा रहेंगी।

मेरे कहने का आशय यह था कि पिछले सोलह साल में सरकारों ने आखिर जनता को क्या दिया जो पहाड़ खाली नहीं होगा? कब तक कोई वहां बदहाली और असुरक्षा के माहौल में जीने को अभिशप्त रहेगा? राज्य गठन से पूर्व कम से कम लोग इसलिए पहाड़ों में ठहरे हुए थे कि अलग राज्य बनने पर कभी तो अंधेरा छटेगा। लेकिन नए राज्य की सरकारों की नीतियों ने जनता को इस कदर निराश किया कि लोगों ने पलायन करना ही उचित समझा। अविभाजित उत्तर प्रदेश की सरकारों पर भले ही पहाड़ की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हों। लेकिन उन्होंने जनता को इतना भी निराश नहीं किया कि लोग टूट ही जाएं। अविभाजित उत्तर प्रदेश में पहाड़ के अस्पतालों में डाॅक्टर होते थे। स्कूलों में शिक्षकों की इतनी व्यवस्था थी कि डीएम और एसडीएम के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। रोडवेज की बसें दूरस्थ ग्रामीण इलाकों तक पहुंचती थीं। पर्वतीय विकास मंत्रालय के जरिए तत्कालीन सरकारें पहाड़ की जनता को विकास का अहसास कराती रहीं। नए राज्य में तो यह अहसास भी नदारद है। इसी वजह मैंने मुख्यमंत्री को ‘थ्री पी’ ­­­फाॅर्मूला फिर से व्यवहार में लाने की सलाह दी।

Facebook Comments

Random Posts