उत्तराखंड की बदहाली के लिये भाजपा-कांग्रेस जिम्मेदारः पुष्पेश त्रिपाठी

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अल्मोड़ा। उत्तराखंड क्रान्ति दल के केन्द्रीय अध्यक्ष पुष्पेश त्रिपाठी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विकास का नारा चुनावी है उसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। आजकल प्रधानमंत्री देश के जिस भी पर्वतीय राज्यों में जाते हैं वहां यह जुमला जरूर कहते हैं कि पहाड़ का पानी और पहाड़ का पानी पहाड़ के काम नहीं आते। इससे पहले वे जम्मू-कश्मीर में भी इस बात को कह चुके हैं। दरअसल यह बात सबसे पहले उक्रांद के संस्थापक, सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. डीडी पंत जी ने कही थी। उनका और मोदी के संदर्भों में बहुत बड़ा अंतर है। जहां डॉ. डीडी पंत ने इस नारे के साथ पहाड़ की पीड़ा को व्यक्त करने और हिमालय की हिफाजत के लिये संघर्ष की जमीन तैयार की वहीं भाजपा इसे भावनात्मक शोषण का हथियार बनाती रही है। भाजपा अपने जनविरोधी रवैये से उत्तराखंड के विकास को अवरुद्ध किया। राज्य बनने के बाद पहली अंतरिम सरकार भाजपा की ही बनी। उसने जिस तरह के जनविरोधी फैसले लिये वह पहाड़ के लोगों को चिढ़ाने वाले थे। इतना ही नहीं पहाड़ के पानी और जवानी को बचाने की बात तो दूर भाजपा ने ऐसी नीतियां बनाई कि राज्य बनने के बाद और तेजी से पलायन का रास्ता साफ हुआ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये त्रिपाठी ने कहा कि प्रधानमंत्री एक दिन रैली को संबोधित करने आते हैं उसी हिसाब से उन्हें कुछ ऐसा बोलना होता है जिससे उनका काम चल जाये। अगर उन्हें पहाड़ की पीड़ा और उसके लिये कुछ करने की मंशा होती तो अपने स्थानीय नेताओं से पूछ लेते। प्रधानमंत्री का पहाड़ के पानी और पहाड़ के पानी को काम पर लगाने वाली बात की पोल भाजपा के अब तक के काम खोल देते हैं। भाजपा ने ही अंतरिम सरकार में गैरसैंण राजधनी के मुद्दे को भटकाने के लिये राजधनी स्थल चयन आयोग बनाया था। उत्तराखंड ही ऐसा राज्य के जो अपनी स्थापना के सोलह साल बाद भी स्थाई राजधानी नहीं बना सका। इसके पीछे भाजपा का पहाड़ विरोधी चेहरा छुपा है। राजधानी को उलझाने के जिस दीक्षित आयोग का गठन भाजपा ने किया था उसको आगे बढ़ाते हुये कांग्रेस आज भी उत्तराखंड के लोगों की भावनाओं से खेल रही है। भाजपा ने जिस तरह, परिसीमन, परिसंपत्तियों और विकल्पधारियों के मामले में उत्तराखंड के साथ पक्षपात किया उसका खामियाजा आज भी हमें भुगतना पड़ रहा है। भाजपा अगर उत्तराखंड का भला चाहती तो उस समय केन्द्र, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की ही सरकारें थी। भाजपा की कारस्तानियों से ही आज भी हमारी कई परिसंपत्तियों पर उत्तर प्रदेश का कब्जा है। इतना ही नहीं भाजपा जब दूसरी बार सत्ता में आई तब भी उसने उत्तराखंड को लूट का उपनिवेश बना दिया। कांग्रेस की लूट की पंरपरा को बढ़ाते हुये भाजपा ने अपने शासनकाल में संसाधनों की ऐसी लूट मचाई कि 2010 में आई आपदा से लेकर कुंभ मेले तक में घोटालों का सिलसिला जारी रहा।

त्रिपाठी ने कहा कि पहाड़ की जवानी और पानी को यहां के काम लाने की बात करने वाले लोगों ने जिस तरह उत्तराखंड में राजनीतिक अपसंस्कृतिक को फैलाया वह किसी से छुपा नहीं है। अभी देश के लोग भूले नहीं हैं कि उत्तराखंड की सत्ता हथियाने के लिये भाजपा ने किस तरह अपने विधायकों को राज्य से बाहर फाइव स्टार होटलों में टिकाया। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को जिस तरह अपने विधायकों को बचाने और कांग्रेस के विधायकों को खरीदने में लगाया उसने पूरे लोकतंत्र को शर्मसार किया। ऐसे में पहाड़ के विकास की बात करना और यहां के लोगों का हितैषी बनने का ढोंग जनता अच्छी तरह समझती है।

त्रिपाठी ने कहा कि भाजपा और कांग्रेस जिस तरह से अपने राष्ट्रीय ऐजेंडे से स्थानीय मुद्दों को हाशिए में डालती है उसके प्रतिकार का समय आ गया है। उन्होंने इस बात पर आर्श्चय व्यक्त किया कि जहां एक ओर भाजपा और कांग्रेस की नीतियों के चलते पहाड़ की नदियां थापर, रेड्डी और जेपियों के हवाले हो गई है, इन पार्टियों के सहारे जमीनों के सौदे हो रहे हैं, उद्योगों के नाम पर बड़े पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है, रोजगार के नाम पर युवाओं को ठेके पर रखा जा रहा है, अपराध गांवों के आंगन तक पहुंच गया है, पलायन से राजनीतिक और सामाजिक भूगोल बदल गया है, अनियोजित विकास से पहाड़ का सीना चीरकर आपदाओं का रास्ता तैयार किया जा रहा है ऐसी नीति बनाने वाले लोग पहाड़ की बात करें तो समझ में नहीं आता।

त्रिपाठी ने कहा कि अब ज्यादा दिन भाजपा-कांग्रेस उत्तराखंड की जनता का भावनात्मक शोषण नहीं कर सकती। भाजपा के पास राज्य में कोई ऐसा नेता नहीं है जो भाजपा को सत्ता तक पहुंचा सके। चुनाव के नजदीक आते प्रधानमंत्री के सहारे वह अपनी नैया पार लगाने का सपना देख रही है। इस बार जनता पूरी तरह परिवर्तन चाहती है। वह भाजपा-कांग्रेस दोनों त्रस्त है। श्री त्रिपाठी ने कहा कि उत्तराखंड में इस बार उक्रांद तीसरे विकल्प के रूप में खड़ा होगा।

 

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