अब झेलिए भाजपा का कांग्रेसी संस्करण

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योगेश  भट्ट

महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण का वह प्रसंग हम सबको मालूम है, जब दु:शासन चीर खींचते-खींचते बुरी तरह थक जाता है, और आश्चर्यचकित होकर कहता है कि, ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है,
नारी की ही सारी है कि सारी की ही नारी है।
प्रदेश की मौजूदा स्थिति पर यह प्रसंग और यह उक्ति सौ फीसदी सटीक बैठती है। महाभारत काल की ही भांति इस वक्त प्रदेश की राजनीति का भी चीर हरण हो रहा है। जिस राजनीति को सिद्धातों के लिए जाना जाता था, विचारों के लिए जाना जाता था वह अब पूरी तरह सत्ता हथियाने का जरिया बन कर रह गई है। दस बागियों के बाद बीते रोज एक और कांग्रेसी नेता यशपाल आर्य भाजपा में शामिल हो गए। चाहे भाजपा का हाई कमान हो या फिर कांग्रेस के बागी, दोनों के मिलन का मकसद एक ही है। भाजपा हाईकमान ने बागियों को इस लिए अपने बेड़े में शामिल किया ताकि इनकी मदद से बहुमत के आंकड़े के पार पहुंचा जा सके, दूसरी तरफ बागी इस बात को अच्छी तरह जान चुके हैं कि कांग्रेस अब डूबता जहाज हो चुका है। लेकिन इन बागियों को साथ रख कर क्या भाजपा अब सुचिता की बात कर सकती है? काडर बेस पार्टी मानी जाने वाली भाजपा में उन्हीं लोगों को तरजीह दी जाती थी, जो पहले दिन से पार्टी की विचारधारा से जुड़े होते थे। जिनकी पृष्ठभूमि या तो संघ की होती थी या जो विद्यार्थी परिषद और वीएचपी जैसे संगठनों से होकर आते थे। लेकिन अब सारी वर्जनाएं खत्म हो चुकी हैं। पार्टी को अब सिर्फ जिताऊ प्रत्याशी चाहिए। इसके लिए पार्टी उस परिवारवाद को भी स्वीकार कर रही है जिसका विरोध करते-करते वह इस मुकाम पर पहुंची है। कुछ दिन पहले भी प्रधानमंत्री मोदी ने दो टूक शब्दों में कहा था कि नेतागण अपने करीबियों के लिए टिकट मांगने से बचें। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। बीते रोज कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए यशपाल आर्य और उनके बेटे का तो भाजपा ने टिकट भी तय कर दिया है। यशपाल आर्य की बात की जाए पिछले पांच सालों से वे बतौर मंत्री सत्ता की मलाई खाने में लगे थे। कांग्रेस में रहते हुए वे विधायक बने, मंत्री बने और आठ साल तक प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने झटके में भाजपा का दामन थाम लिया? क्या विचारधारा इतनी हल्की होती है? यशपाल और उन जैसे दर्जनभर कांग्रेसियों को पार्टी में शामिल करने और विधानसभा चुनाव के लिए टिकट देने वाली भाजपा के हाईकमान ने यह कदम उठाने से पहले क्या एक बार भी अपने उन समर्पित कार्यकर्ताओं के बारे में सोचा, जिनका भविष्य अब पूरी तरह हाशिए पर चला गया है। कतई नहीं। पार्टी का यह कैसा दोहरा चरित्र है कि एक तरफ जनता से प्रदेश को कांग्रेस मुक्त बनाने की अपील कर रही है और दूसरी तरफ खुद को दिनों दिन कांग्रेस युक्त करने में लगी है। इस तरह की राजनीति से भाजपा को भले ही सियासी फायदा मिल सकता है, लेकिन प्रदेश की जनता के साथ यह बहुत बड़ा छल है। इस तरह की राजनीति, प्रदेश के भविष्य को अवसरवाद के ऐसे घने अंधेरे में ले जा रही है, जहां से बाहर निकल पाना नामुमकिन होगा। भाजपा को लगता है कि यह फैसला उसे तात्कालिक रूप से लाभ पहुंचाने वाला साबित होगा, जिसमें कि अभी संशय है, लेकिन यदि ऐसा होता है तो तब भी उसे शायद यह अंदाजा नहीं है कि उसे भविष्य में इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

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