आतंकवाद की कमर तोड़ने वाला है भाजपा सरकारों का रुख

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कनिष्का तिवारी
देश में जहाँ हर तरफ दीपावली के त्योहार की रौनक है, वहीं दूसरी तरफ लगातार आतंकी मंसूबो को अंजाम देने की कोशिशें भी जारी है। देश में दहशत का माहौल फैलाने और खून की होली खेलने के इरादे से इन आतंवादियों ने कभी पाकिस्तान की ओट लेते हुए तो कभी खुलेआम अपने इरादों को जाहिर किया है। दीपावली की अगली ही सुबह को भोपाल सेंट्रल जेल से सिमी के आठ आतंकी जेल तोड़ कर और एक हेड कांस्टेबल की हत्या कर फरार हो गए। इस घटना ने मध्य प्रदेश में दूसरी बार सनसनी फैला दी क्योंकि इससे पहले भी 2013 में इन्ही में से चार आतंकी खंडवा जेल से फरार हुए थे, जिन्हें तीन साल की कड़ी मुशकक्त के बाद पुलिस ने पकड़ा था। जाहिर है, इससे मध्य प्रदेश पुलिस को एक बड़ा झटका लगा, मगर अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए प्रशासन ने इस बार बड़ी चुस्ती के साथ इस मामले को संभाला। आतंकियों ने भागने के लिए सुबह लगभग दो बजे से 3 बजे के बीच का समय चुना था, जिस समय पहरेदारी की शिफ्ट बदली जाती है। उन्होंने चादर का इस्तेमाल रस्सी के तौर पर किया और दीवार कूद कर फरार हो गए। प्रशासन फौरन अलर्ट हो गया और पूरे राज्य में नाकाबंदी कर दी गयी, सभी राज्यों की जेल में सुरक्षा पुख्ता की गयी, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने खुद इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखी साथ ही गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी घटना की सूचना पाते ही फौरन रिपोर्ट माँगी और पल-पल की गतिविधियों की जानकारी ली। सभी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियो को सूचित किया गया और पाँच लापरवाह अफसरों को फौरन निलंबित किया गया। इस तरह के यथासंभव और तत्परतापूर्ण प्रयासों से दस घंटे के भीतर ही आठों आतंकियों को मार गिराया गया।
भाजपा की केंद्र समेत राज्य सरकारें भी आतंकवाद के विरुद्ध पूरे कठोर रुख के साथ खड़ी है। ये निश्चित रूप से आतंकियों की कमर तोड़ने वाला रुख साबित हो सकता है। मगर, विरोध के लिए विरोध, समुदाय विशेष का तुष्टिकरण आदि अपनी तुच्छ राजनीतिओं के लिए विपक्ष द्वारा जिस तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आतंकवाद जैसे मुद्दे पर मोदी सरकार का बेहद अतार्किक और अनुचित ढंग से विरोध किया जा रहा है, वो अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक है।
यह न केवल मध्यप्रदेश पुलिस के लिए बल्कि पूरे देश के लिए भी जरूरी था, क्योंकि लोगो के बीच उनकी सुरक्षा को लेकर पुलिस की जिम्मेदारी का एहसास और भी मजबूत हुआ है। तकनीकी रूप से पुलिस प्रशासन आज भी कई गुना पीछे है, जिसका फायदा इस तरह से आतंकवादी गुट उठाते है। आतंकियों के पास न केवल हथियार थे, बल्कि वे मुठभेड़ में मारे गए जिस से स्पष्ट है कि उनको किसी न किसी प्रकार की बाहरी सहायता मुहैय्या करवाई जा रही थी। यह भागना भी बिना किसी आतंरिक या बाहरी सहयोग के संभव नहीं नजर आता। निश्चित तौर पर इन पहलुओं की जांच होनी चाहिए, जिससे मामले के सारे पेंच और दोषी सामने आ सकें। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान इस सम्बन्ध में गंभीर हैं, उसे इसीसे समझा जा सकता है कि आतंकियों के फरार होने के पूरे मामले की एनआईए जांच के लिए उन्होंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मांग की, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया है।
इसे भी सिर्फ संयोग नही कहा जा सकता की यह घटना भी उस वक्त हुई है जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी छत्तीसगढ़ का दौरा करने वाले है। इशरत जहाँ के बाद इसे शायद दूसरा असफल प्रयास मान लेना गलत नही होगा। बहरहाल, खतरा सही वक्त पर भाप लिया गया और प्रशासन ने स्थानीय लोगो के द्वारा सूचना पाये जाने पर अपनी सक्रियता से जेल से महज 12 किलोमीटर की दूरी पर बसे ईँटखेड़ी गाँव में आंतकियो का मुठभेड़ कर सफाया कर दिया। आतंकियों के इस एनकाउंटर समेत इससे पहले भी नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात में हुए इशरत जहां आदि लश्कर आतंकियों का एनकाउंटर कहीं न कहीं भाजपा की आतंकवाद के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति का ही व्यावहारिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
हालांकि इस एनकाउंटर पर भी विपक्ष का रुख इशरत जहां मामले की तरह ही बेहद निराशाजनक नजर आ रहा है। जहां कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह ने घटना के काफी घंटो बाद जानें किस आधार पर सिमी की तुलना बजरंग दल से की और इस घटना को एक मिली-जुली साजिश बताया तो वही आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता अल्का लांबा को यह विचित्र लगा कि मुठभेड़ के दौरान आठों आतंकवादी एक ही जगह पर क्यों मारे गए ? ये वही दिग्विजय सिंह हैं, जो ओसामा बिन लादेन और हाफी सईद जैसे देश के दुश्मनों को ससम्मान संबोधित करते हैं। मुठभेड़ के लिए उन्हें हथियार आदि कैसे प्राप्त हुए, यह भी सवाल भाजपा विरोधियों द्वारा उठाया जा रहा है। इन्हें कौन समझाए कि ये आतंकी देश के अंदर मौजूद आतंकी संगठन सिमी के थे, ऐसे में इनके फरार होने के बाद इनके संगठन की तरफ से इन्हें हथियार आदि प्राप्त होना कत्तई मुश्किल नहीं है। विरोधियों द्वारा ये तमाम सवाल तो उठाए गए, मगर आश्चर्य कि मध्य प्रदेश सरकार और पुलिस की तत्परता पर प्रशंसा के शब्द किसी विपक्षी के मुह से नहीं सुनाई दिए। कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष का ये रुख निश्चित तौर पर आतंक के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करने वाला है।
बहरहाल, देश में आतंक के प्रति एक जोरदार प्रतिरोध का वातावरण है और मौजूदा केंद्र सरकार उसको समझ रही है तथा आतंकवाद के विउद्ध अपने रुख की कठोरता को व्यावहारिकता में भी ला रही है। सीमा पर सेना द्वारा पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक कर आतंकी कैम्पों को नष्ट करना तथा आतंकियों की अनेक घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम कर उनका सफाया करना तथा अब ये मप्र के फरार आतंकियों के एनकाउंटर का मामला आदि सब बातें दिखाती हैं कि भाजपा की केंद्र समेत राज्य सरकारें भी आतंकवाद के विरुद्ध पूरे कठोर रुख के साथ खड़ी है। ये निश्चित रूप से आतंकियों की कमर तोड़ने वाला रुख साबित हो सकता है। मगर, विरोध के लिए मोदी सरकार का विरोध, समुदाय विशेष का तुष्टिकरण आदि अपनी तुच्छ राजनीतिओं के लिए विपक्ष द्वारा जिस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आतंकवाद जैसे मुद्दे पर सरकार का बेहद अतार्किक और अनुचित ढंग से विरोध किया जा रहा है, वो अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक है।

(लेखिका पत्रकारिता की छात्रा हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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