उत्तराखंड में इस बार भाजपा बगैर चेहरे के चुनाव में जाएगी

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(विकास धूलिया)
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अंतिम प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भाजपा ने भावी कार्यक्रमों और चुनावी रणनीति पर तो मुहर लगा दी, मगर किसे बतौर मुख्यमंत्री पेश कर चुनाव लड़ा जाएगा, इस पर कोई फैसला नहीं हुआ।

दरअसल, पार्टी में इस कदर दिग्गजों की भरमार है कि नेतृत्व यह तय ही नहीं कर पा रहा कि चुनावी कमान किसके हाथ सौंपी जाए। इस स्थिति में यह तो संभव है कि किसी वरिष्ठ नेता को चुनाव अभियान समिति के संयोजक सरीखे पद पर बिठा दिया जाए, लेकिन इतना तय है कि बिहार और हरियाणा की तरह उत्तराखंड में भी भाजपा किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने नहीं जा रही है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए अब महज तीन-चार महीने का ही वक्त शेष है।

इसके बावजूद सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिशों में जुटी भाजपा अब भी ऊहापोह में है कि उत्तराखंड में दिल्ली और असम की तरह किसी नेता को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश कर जनता की अदालत में जाया जाए, या फिर बिहार और हरियाणा की तर्ज पर बगैर भावी नेतृत्व घोषित किए ही चुनाव लड़ा जाए।
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया था, हालांकि तत्कालीन पौड़ी गढ़वाल सांसद भुवन चंद्र खंडूड़ी को चुनाव अभियान की कमान सौंपी गई थी। चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद खंडूड़ी को ही मुख्यमंत्री बनाया गया।

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के नेतृत्व में ही चुनाव में गई थी, लेकिन यह लाजिमी भी था। इस बीच वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तराखंड की अपनी त्रिमूर्ति और पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी व रमेश पोखरियाल निशंक को लोकसभा चुनाव लड़ाकर केंद्रीय राजनीति में उतार दिया।

यह बात दीगर है कि इन तीन वरिष्ठ नेताओं की सूबाई सियासत में गैरमौजूदगी के बाद भाजपा अपने नेताओं की दूसरी पांत तैयार करने में बहुत ज्यादा कामयाब नहीं हो पाई। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ही पिछले लंबे अरसे से प्रदेश अध्यक्ष, यानी दोहरी जिम्मेदारी उठा रहे हैं।
इस बीच कांग्रेस में गत मार्च में हुई बगावत के बाद कई वरिष्ठ नेता भाजपा में शामिल हो गए।

इनमें पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत जैसे दिग्गज शामिल हैं। इससे पूर्व गत लोकसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस के एक बड़े क्षत्रप रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज भी भाजपा का दामन थाम चुके हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो त्रिमूर्ति के अलावा भाजपा के पास वरिष्ठ नेताओं की खासी जमात इकट्ठा हो गई है। इसके बावजूद यह भी सच है कि कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए वरिष्ठ नेताओं को इस विधानसभा चुनाव में भाजपा आगे करने की स्थिति में नहीं है।

यानी, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा भाजपा के जो बड़े सूबाई नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हो सकते हैं उनमें प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, प्रकाश पंत और मदन कौशिक का नाम लिया जा सकता है। साफ है कि भाजपा के पास इस वक्त मुख्यमंत्री पद के आधा दर्जन से ज्यादा दावेदार हैं और यही पार्टी की परेशानी का सबसे बड़ा सबब भी है।

इस स्थिति में अगर इनमें से किसी को भी मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर आगे किया जाता है तो इससे पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर असर पड़ सकता है। संभवतया यही वजह है कि भाजपा विधानसभा चुनाव में बगैर सीएम प्रोजेक्ट किए ही उतरने की तैयारी में है।

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