चकराता के जंगल में मिली प्राचीन गुफा, दर्जनों छोटे-बड़े शिवलिंग मौजूद, पूजा-अर्चना शुरु

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(चंदराम राजगुरु)

जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल चकराता से 40 किमी दूर गोरछा गांव के समीप जंगल में एक रहस्यमय गुफा का पता चला है। गुफा के अंदर दर्जनों छोटे-बड़े शिवलिंग और अनेक प्रकार की देव मूर्तियां मौजूद हैं। जबकि, गुफा के ऊपरी भाग में कई घंटियां व विशेष आकृति बनी हुई हैं। इसकी जानकारी मिलने पर आसपास के गांवों के लोगों ने गुफा में पूजा-अर्चना शुरू कर दी है। देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में पांडवकालीन एवं पुरातात्विक महत्व वाले प्राचीन मंदिरों के कई अवशेष मौजूद हैं। इनमें सबसे प्रमुख मंदिर श्री महासू देवता मंदिर हनोल व प्राचीन शिव मंदिर लाखामंडल की ख्याति देश-दुनिया में है।

इसके अलावा यहां कुछ अन्य प्राचीन मंदिर व गुफाएं भी हैं, जो उपेक्षित पड़ी हैं। जबकि, कुछ के बारे में तो लोगों को जानकारी ही नहीं। गोरछा गांव के समीप जंगल में ऐसी ही एक गुफा का पता लोगों को कुछ ही रोज पहले चला। आबादी से कुछ दूर चीड़, रई व कैल के घने जंगल में मिली इस गुफा का पता भरम क्षेत्र के कुछ पशुपालकों को सबसे पहले चला। इसके बाद गोरछा, बुल्हाड़ व आसपास स्थित गांवों के कई ग्रामीण गुफा देखने जंगल गए।

गुफा के अंदर कई शिवलिंग व मूर्तियां देख वे आश्चर्यचकित रह गए। गुफा के दीदार को पहुंचे बुल्हाड़ निवासी पूर्व जिला पंचायत सदस्य विजयपाल सिंह रावत ने बताया कि कांडोई-भरम क्षेत्र के कोटी कनासर-गोरछा मार्ग से दो किमी दूर आरक्षित जंगल के बीच स्थित इस प्राचीन गुफा की गहराई 20 से 25 मीटर और चैड़ाई 15 से 20 फीट है। अंदर दर्जनों छोटे-बड़े शिवलिंग व प्राचीन महत्व की कई मूर्तियां मौजूद हैं। गुफा का प्रवेशद्वार काफी चैड़ा है।

पर्यटन का केंद्र बने गुफा
ग्रामीणों ने गोरछा गांव से दो किमी दूर जंगल के बीच मिली इस रहस्यमय गुफा का प्राचीन महत्व जानने को स्थानीय प्रशासन व पर्यटन विभाग से गुहार लगाई है। पूर्व जिला पचांयत सदस्य विजयपाल रावत ने कहा चकराता वन प्रभाग के ट्रैकिंग रूट से जुड़ी इस प्राचीन गुफा को अगर पर्यटन की दृष्टि से संवारा जाए तो यह स्थान पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन जाएगा।

जाना जाएगा ऐतिहासिक महत्व
तहसीलदार चकराता डीडी शर्मा के मुताबिक गोरछा के पास जंगल में मिली इस रहस्यमय प्राचीन गुफा का ऐतिहासिक महत्व जानने का प्रयास किया जाएगा। इस संबंध में पर्यटन विभाग, पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग व वन विभाग के अधिकारियों को पत्र भेजा जा रहा है।

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