चैनल की माइक आईडी बनी तमन्चा

 

नित दिन शुरू हो रहे क्षेत्रीय चैनलों ने मीडिया को बनाया उगाही का धंधा
राजनीति, कारोबार और समाज से गहराई से जुड़ा मीडिया जगत बेशक समाज में सम्मान हासिल करने का सशक्त जरिया है लेकिन आये दिन ऐसे मामलों का भी पर्दाफाश हो रहा है जिनमें तथाकथित पत्रकार उगाही करते हुए पाये जा रहे हैं

संजय कश्यप  हरिद्वार 
नित दिन शुरू हो रहे क्षेत्रीय चैनलों ने मीडिया को बनाया उगाही का धंधा
राजनीति, कारोबार और समाज से गहराई से जुड़ा मीडिया जगत बेशक समाज में सम्मान हासिल करने का सशक्त जरिया है लेकिन आये दिन ऐसे मामलों का भी पर्दाफाश हो रहा है जिनमें तथाकथित पत्रकार उगाही करते हुए पाये जा रहे हैं। नगर नगर पत्रकारों के संगठन होने के बावजूद भी पत्रकारिता पर रोक की कवायद सिरे नहीं चढ़ पा रही है। अजीबो गरीब नाम वाले दैनिक और वीकली व पाक्षिक पत्र-पत्रकारिताओं के परिचय पत्र जेब में लेकर घूमते इन फर्जी पत्रकारों की अच्छी खासी तादाद हर नगर और हर शहर में मौजूद है। न्यूज चैनलों का प्रचलन बढ़ने के बाद इलैक्ट्रोनिक मीडिया में कैरियर भी युवाओं के सपनों में शुमार हो गया है।
     शिक्षित युवा तो मास कम्युनिकेशन कोर्स कर इस क्षेत्र में कैरियर बनाने की राह पर निकल पड़ते हैं लेकिन अल्प शिक्षित छोटे मोटे वीकली या पाक्षिक पत्र पत्रिकाओं के परिचय पत्र लेकर और वाहनों पर प्रैस लिखकर अवैध वसूली के मार्ग पर अग्रसर हो जाते हैं।प्रैस लिखे वाहनों से अवैध शराब का कारोबार अन्जाम देने के मामलों का भंडाफोड़ हो चुका है। देश के अलग अलग राज्यों के अलग अलग शहरों से ऐसे फर्जी पत्रकारों के काले कारनामे अक्सर समाज के सामने आते रहते हैं। पुलिस और स्वयं प्रतिष्ठित पत्रकार फर्जी पत्रकारों की फौज से परेशान हैं किन्तु इस फौज पर अंकुश लगाने के उपाय ढूंढने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं।
हरिद्वार भी एक ऐसा ही शहर है। शहर के नामचीन शिक्षण संस्थान गुरूकुन विश्व विद्यालय ने देश को विलक्षण प्रतिभा के धनी ऐेसे महान लेखक, पत्रकार और सम्पादक दिये हैं जिन पर हरिद्वार के पत्रकारिता का गर्व है लेकिन बाजारवाद की आंधी में कहीं न कहीं पत्रकारिता की गरिमा को ठेस लगने की घटनाएं भी आम हो गई हैं। पत्रकारिता की आड़ में उगाही के मामले दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। शराब और खननसहित अन्य अवैध कारोबार ने भी पत्रकारों को बढ़ावा दिया है।
     अवैध धंधों में संलिप्त लोग कानून के डर से फर्जी पत्रकारों को भी यह सोचकर चुपचाप सुविधा शुल्क देने में अपनी भलाई समझते हैं कि वसूली की मांग करने वाला पत्रकार हो न हो लेकिन अगर उसका काला कारनामा उजागर हो गया तो वह पचड़ेबाजी में फंस जायेगा। लिहाजा वह छोटी मोटी धनराशि देेकर फर्जी पत्रकार का मुंह बंद कर देते हैं। पिछले कुछ समय से खनन के कारोबारियांे से वसूली की मांग को लेकर कतिपय पत्रकारों के मामले चर्चा का विषय बने जिनमें पत्रकारों की पेड़ से बांधकर पिटाई हुई व उल्टा उगाही का मुकदमा भी दर्ज करा दिया गया। बावजूद इसके पत्रकारिता चुनौती बनी हुई है।
पत्रकारिता को बढ़ावा देने में ऐसे कुछ क्षेत्रीय न्यूज चैनलों का भी हाथ है जो फील्ड स्टाफ को सैलरी और भत्ते देने के बजाय उनसे प्रतिमाह एकमुश्त रकम की डिमांड रखते हैं। कोई चैनल 40-50 हजार रूपये प्रतिमाह मांगता है तो कई इससे भी आगे बढ़ जाते हैं। एक बहुचर्चित क्षेत्रीय चैनल में लम्बे समय तक काम कर चुके युवा पत्रकार ने आहत होकर चैनल को छोड़ने के बाद कहा कि चैनल प्रबन्धन रिपोर्टर को अंडरवर्ल्ड के उस शार्प शूटर की तरह यूज करता है जो डरा धमका कर रंगदारी वसूल करता है।
     उक्त पत्रकार ने पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि चैनल हाथ में आईडी नहीं देता बल्कि पिस्टल देता है कि जाओ और इसके दम पर ज्यादा से ज्यादा वसूली करके लाओ, आख्रि चैनल चलाना कोई मामूली बात है क्या! हर तरफ खर्चे ही खर्चे हैं। उस युवा पत्रकार ने दूसरा चैनल पकड़ा जिसमें वह महीनो से मेहनत कर रहा है लेकिन अभी तक न उसे परिचय पत्र दिया गया और न वेतन आदि तय किया गया है। यह पहला मामला नहीं है जिसमंे युवा पत्रकार के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा हो। आक्रोश4मीडिया में आये दिन युवा पत्रकारों के शोषण के मामले उजागर होते रहते हैं। दर्जनो चैनल अपने फील्ड स्टाफ को कुछ देने के बजाय उससे प्रतिमाह तयशुदा रकम चाहते हैं, पत्रकार के विफल रहने पर उसे किसी न किसी बहाने हटा दिया जाता है और जो रकम देने में सक्षम हो उसके हाथ में आईडी थमा दी जाती है।
     पिछले कुछ वर्षों में पैदा हुए कुछ पत्रकारों पर नजर डाली जाये तो बहुत से ऐसे मिल जायेंगे जिनके पास न भाषाई ज्ञान है और न व्याकरण-उच्चारण की तमीज लेकिन अपने दमखम पर वह बेहतरीन पत्रकार बन गये और देखते ही देखते सड़क से कोठियों में आ गये। पत्रकारिता के जरिये साईकिन या स्कूटर से कारों तक पहुंचने वाले पत्रकारों की अच्छी खासी संख्या नगर में मौजूद हैं। चैनल ही नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया में ऐसे धुरंधर पत्रकार मौजूद है जिन्हें मानदेय के तौर पर कुछ हजार रूपये प्रतिमाह मिलते हैं लेकिन हाथ में 15 से 25 हजार का मोबाइल और 80 से लाख सवा लाख की बाइक होती है।
समाज से अवैध कारोबार का सफाया करने का दम भरने वाला प्रशासन भी ऐसे पत्रकारों से उनकी सम्पत्ति अर्जित करने के माध्यम के बारे में पूछताछ करने का साहस नहीं कर पाता। राजनीति में आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के मामलों में भले ही नामचीन राजनेताओं पर केस चल रहेे हो लेकिन बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों में कुकुरमुत्तांे की तरह उगे फर्जी पत्रकारों की सम्पत्ति के स्त्रोत जानने में प्रशासन कतई दिलचस्पी नहीं लेता।
अफसोस की बात तो यह है कि अब ऐसे प्रतिष्ठित पत्रकारों पर भी अवैध कारोबारियों से नजदीकियों के आरोप लगने लगे हैं जो स्थापित पत्रकार संगठनों के उच्च पदों पर आसीन हैं। मिशन पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों का कहना है कि अगर समाज में व्याप्त बुराईयों को दूर करना है और लोकतंत्र के स्तम्भों को भ्रष्टाचार की दीमक से बचाना है तो लोकतंत्र केइस चौथे स्तम्भ यानि मीडिया को फर्जी पत्रकारों से सुरक्षित करना होगा वर्ना लोकतंत्र के बाकी तीन स्तम्भों के निरंकुश होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। बाजारवाद के कल्चर ने वैसे ही पत्रकारिता को कारोबार की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है।
       सत्ता से नजदीकियों का लाभ उठाने की लालसा में बड़े बड़े अखबार भी सत्ता की कमियों और नाकामियों को जनता के सामने लाने से कतराने लगे हैं। ऐसे में स्वस्थ और निष्पक्ष पत्रकारिता को पुर्नजीवित करना जोखिम भरा काम हो गया है। जो इमानदारी से पत्रकारिता करते हैं उनके भाग्य में या पीठ पीछे गालियां और सामने से गोलियां मिलती हैं। यकीन न आये तो इतिहास का अवलोकन कर लीजिये। जिन्होंने साहस के साथ काले कारनामों को उजागर करने का जोखिम उठाया उनका अन्जाम सड़क पर लाश मिलने के रूप मंे सामने आया। बिहार और यूपी में मिशन पत्रकारिता के पथ पर कई पत्रकार शहीद हो चुके हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश में देवभूमि में युवा पत्रकार उमेश डोभाल नामक पत्रकार हत्याकांड उत्तराखंड का बहुचर्चित हत्याकांड है।
     आज उमेश डोभाल के नाम पर युवा पत्रकारों को पुरूस्कृत तो किया जाता है लेकिन उसी देवभूमि उत्तराखंड में अलग राज्य बनने के बाद सैकड़ो ऐसे फर्जी पत्रकार पैदा हो गये हैं जिनके काले कारनामों से देवभूमि की गरिमा को ठेस लगी है। प्रदेश की राजधानी देहरादून ऐसे पत्रकारों के लिए उगाही की सर्वाधिक सुरक्षित शरणस्थली बन चुकी है जिन्होंने सत्ता का वरदहस्त प्राप्त कर लाखों करोड़ों की सम्पत्ति अर्जित कर ली। पूर्व सरकार के कार्यकाल में एक ऐसे पत्रकार का नाम सुर्खियों में रहा था जो यूपी से खाली हाथ आया था लेकिन देखते ही देखते करोड़पति बना और महंगी कारांे और आलीशान कोठी का मालिक बन गया। नजरें दौड़ाये तो ऐसे पत्रकारों की अच्छी खासी जमात है जो सत्ता के मठाधीशों के सरंक्षण में पले बढ़े और आज देहरादून ही नहीं बल्कि प्रदेश की पत्रकारिता में उस मुकाम तक पहुंच गये कि सत्ता के गलियारों से लेकर सचिवालय तक के उनके नाम का सिक्का चल रहा है।
बात हरिद्वार की करें तो धर्मनगरी में भी गंगा पार के इलाके से ताल्लुक रखने वाले कुछ ऐसे पत्रकार है जो खाली हाथ आये लेकिन आज लाखों के मालिक बन गये। आईडी को तमन्चे की तरह यूज करने वाले इन पत्रकारों की डिमांड हजारों में नहीं बल्कि लाखों में होती है, जबकि कोई विवादों के चलते पुलिस के राडार पर आये प्रापर्टी डीलर/बिल्डर से फ्लैट की मांग करता है। लगातार उगाही की शिकायतों के बाद ऐसे महानुभावों को नेशनल न्यूज चैनलों से हटाया भी गया। यह और बात है कि वह हटाये जाने का अपमान छिपाते हुए खुद अलग हो जाने की बात करते हैं। कहने का मतलब यह है कि समाज को सही दिशा देने का सर्वाधिक सशक्त माध्यम अल्प समय में तिजोरी भरने का जरिया भी बन गया है। कई पत्रकार स्थापित होने के बाद विभिन्न विभागों की ठेकेदारी कर रहे हैं।

महज नामचारे को अखबार छापने वाले पत्रकार/सम्पादकों के ठेकेदार बनने की कथा फिर कभी…..।

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