उत्तराखंड में तबाही मची है लेकिन लूटनेवालों के लिए समुंदर है

(विनोद मुसान)

vi500अगर आप बेरोजगार है तो उत्तराखंड आइए। एक कैमरा और एक माइक लेकर आइए। इससे कोई मतलब नहीं कि आपका पत्रकारिता का अनुभव कितना है। आप दस पांच लाइन लिख भी पाते हैं या नहीं। या आप उत्तराखंड को कितना जानते हैं। बस सलीके से कुछ जोड जतन कीजिए। आपको सवा करोड रुपए का विज्ञापन मिल सकता है। दो तीन विज्ञापन मिल गए तो आपकी पुश्त तर गई। हां, ये तभी संभव है जब आप उत्तराखंड से नहीं, बल्कि थोडा दूर से आए हों। इसके तिकोन फायदे हैं। देने वाले को , मिलने वाले को, मिलाने वाले को। सर्वनाश केवल उत्तराखंड का हो रहा है। कई युवा जिनके अपने क्षेत्र इलाकों में सिनेमा हाल का गेट कीपर बनने की औकात नहीं थी वो यहां कथित मीडिया के नाम पर लाखों रुपए हडप रहे हैं।

एक बडे अखबार के पत्रकार को जब उसके संस्थान ने हटाया तो वह अपने गांव नहीं गया। जबकि नौकरी से हटाए जाने के बाद उसका उत्राखंड में कुछ भी नहीं था। लेकिन वह उत्तराखंड में ही जम गया। क्योंकि उसकी कामधेनु तो यहीं थीं। उसने जुगाड लगाया और छोटे से टीवी चैनल में चला गया। चला क्या गया उसे वहीं से शुरू किया। अब सुनने में आया है कि एक विज्ञापन का कमीशन उसे इतना मिल गया कि तीन पुश्त पाल लेगा। केवल एक नौकरशाह ने इसे मालदार बना दिया है। इस चैनल का कोई ओर छोर नहीं। उत्तराखंड की 95 प्रतिशत जनता को इस चैनल का नाम भी पता नहीं होगा। लेकिन कागजों पर विज्ञापन यह सब नहीं देखता।

ये रातों रात उगे छोटे छोटे टीवी चैनल माइक हाथ में थामे केवल देहरादून में नजर आते हैं। या फिर टूरिस्ट ठिकानों पर। केवल नेताओं के बयान तक सीमित है। पहाड़ों में बंदर की समस्या किसी नए आपदा की तरह है, इन टीवी चैनलों के स्वयम्भू किस्म के पत्रकारों को गांव से कोई लेना देना नहीं। उत्तराखंड से कोई लेना देना नहीं। देहरादून ही इनके लिए उत्तराखंड है। देहरादून इनके लिए कुबेर की नगरी है। इनमें कइयों ने तो इटर पास किया हो यह भी कहना मुश्किल हैं। इस तरह बडे संस्थान में ब्यूरो के पद को पा जाना भी रहस्य की तरह है। सब चांदी बटोरने का कुप्रयत्न हैं। इन पत्रकारों की परीक्षा हो जाए तो वन विभाग में गार्ड की परीक्षा में पूछे गए सवाल का जवाब भी ठीक से नहीं दे पाएंगे।

हाल इसके ऐसे हैं कि देहरादून में एक घंटाघर है इसके अलावा ये पहाड के बारे में कुछ नहीं जानते। डायरी में आठ दस नेताओं के नाम, कुछ नौकरशाहों के नाम लिखे मिल जाएंगे। पिछला पत्रकारिता का इतिहास कुछ नहीं। केवल देहरादून इनके लिए आमदनी कमाने का ससुराल है। केदारनाथ की आपदा आई तो ऐसे ही पत्रकारों के हाथ पांव फूल गए थे। पहाडों से आई खबरों पर विश्लेषण नुमा पेंबद लिखते थे। हाल ये है कि न उत्तराखंड की संस्कृति का पता, न राजनीति का पता न खान पान का पता, न संस्कृति का पता, न यहां के जनजीवन का पता, न यहां के आंदोलनों का पता, लेकिन बडे-बडे पद हथियाए हुए हैं। या लाइजनिंग करके पाए हुए हैं। जब संस्थान से किसी भी वजह हटाए जाते हैं तो इन्हें परवाह नहीं होती। ये करोडों कमा चुके होते हैं।
न जाने पहाड़ के पत्रकार कहां चले गए।

कुछ तो चिंता करते अपने पहाड़ की। कुछ ही मैदानी पत्रकार हैं जो गरिमा के साथ अपना काम कर रहे हैं। पत्रकारिता का धर्म निभा रहे हैं। चाहे खबर में हों या डेस्क में। बाकि यहां अधेंर गर्दी मचाने आए हैं। दस साल पहले इनके पास साइकिल में हवा भरने के लिए पंप खरीदने का पैसा नहीं होता था। आज आलीशीन गाडियों में घूम रहे हैं। कमीशनखोरी से दो दो घर बना लिए हैं। सब कमीशन का खेल है।

उत्तराखंड में तबाही मची है लेकिन लूटनेवालों के लिए समुंदर हैं। कोई पूछने वाला नहीं। पिछले पांच दस साल में कई पत्रकार यहां डेरा जमाकर बैठ गए हैं। हर आदमी यहां मीडिया संस्थान में नौकरी करने खासकर ब्यूरो मीडिया में जाने के लिए लालायित है। सब गौरखपुर कानपुर इलाहाबाद दिल्ली जाने के बजाय देहरादून में ही धूनी रमाना पसंद कर रहे हैं। देहरादून से कहीं नहीं जाना चाहते। उनके माई-बाप देहरादून में ही बैठे हैं।

कुछ पत्रकार घरों में अपने लोगों को फोन करते हैं , बस जरा चुनाव निपट जाएं फिर यहां से आते हैं। जाहिर है नेताओं के जरिए चुनाव में वो धीरू भाई अंबानी बनना चाहते हैं। उत्तराखंड की जितना सर्वनाश कथित मीडिया और छद्म किस्म के पत्रकारों के जरिए हो रहा उतना किसी और के जरिए नहीं। ऐसे पत्रकार जो एक पैरा नहीं लिख पाते हैं, जिन्हें न्यूज, विश्लेषण, लेख, स्पाट रिर्पोटिंग किसी चीज की समझ नहीं। लेकिन चापलूसी, जुगाडबाजी, गुटबाजी से बडे पदों पर बैठे हैं। अगर उत्तराखंड को रास्ते में लाने की थोडी भी इच्छा हो, तो यहां के मीडिया के हालात पर गौर करना बहुत जरूरी है।

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