देवभूमि का दर्द

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17 साल हो गये मुझे तुमने अलग राज्य बना दिया किसके लिए बनाया अलग राज्य ? क्या किसी को याद है ?? 17 साल हो गये मुझे अलग हुए और अब एक और चुनाव करवा रहे हो ? और न जाने तुम्हारी बुद्धि को कौन का नशा लील कर गया है  भांग डेनिस का नशा या क्या खाकर तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो चुकी है या फिर तुम्हे अपनी व्यक्तिगत खुदगर्जी ने तुम्हे ध्रतराष्ट्र की तरह अँधा  कर दिया 

याद है :

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  1. देव भूमि की माताओं देवियों के श्रापों के कलुषित जिनको तुमने अफ्रीका के रेगिस्तान के गुलामो की तरह जंगल में भूखे पेट लकड़ी लाने भेजा,  पहाड़ो की बीरन भयावह जंगलो की तपती दोपहरों में घास काटने भेजा , खेतो के काम करने भेजा जानवरों की गोबरो की महका माँ का आँचल , अनीमियां कुपोषण अस्थमा  की बीमार माँ से तुम दूर हो गयें. और तुम अपना मूल छोड़ मैदानों में भाग खड़े हुए    
  2.  हर साल हजारो में जब तुम या तुम्हारे मित्र परिजन बीमार होने पर मैदानों को लाये जाते हैं ताकि मैदानी क्षेत्रो तक कुछ बचे खुचे पहुचे मरीज , तुम्हारी मेहनत की कमाई को लूटने खसोटने के लिए कसाई,  भूखे भेडियो की तरह तुम्हें नोंच सके और आधे तो लम्बे हर साल बरसात की भेंट चढ़े रास्तो में ही मर जाते हैं  200-300 किलोमीटर तक तुम्हारे पास रेल यातायात नहीं है कोई सुविधा नहीं 17 साल से तुम्हारे पास तुम्हारे यहाँ नामी गिरामी अस्पतालों में  दर्जनों गर्भवती महिलायें एक हफ्ते किडनी फेल होकर मर जाती हैं तुम्हारे पास अच्छे अस्पताल नहीं ICU जैसी सुविधा नहीं
  3. तुम्हारे नौनिहालो की जवानी तो किसी मेट्रो ,किसी लाला मारवाड़ी, कॉर्पोरेट की सेवा में बीत जानी है वो घर से मीलों दूर,  सिडकुल जैसे उधोग धंधे आये भी तो उससे तुम्हारा भला नहीं हुआ वो सब कॉर्पोरेट के टैक्स बचाने के अड्डे बन गयें ..या फिर मानव तस्करी 100 -150 की ध्याड़ी के लोगो के शोषण के लिए….रोजगार पलायन जैसे मुद्दे पर चिन्तन के लिए तुम्हारे पास विज़न नहीं कोई रास्तें नहीं   
  4. नदियों के उद्गम में रहने वाले पर पहाडियों , नालो सीवरों का पानी पीने वाले तुम, 70% पेट और चमड़ी में मरीजो तुम्हे तो तुम्हारी उद्गम की नदियों का पानी भी नसीब नहीं नालो की गंदगी तुम्हारे जहन में हो तो भला तुम क्या पवित्र सोच सकते हो ?..अब तुम्हारी नदियों की बांध बनाकर हिमालय में विनाशक डायनामाइट चलाकर तुम्हारी जमीन खिसकाने की पूरी तैयारी हो चुकी है क्यूंकि संवेदनहीनता ‘लाश’ की तरह है जिसे कोई भी चीज कव्वे जानवर उठाकर कहीं भी ले जा सकते हैं तुम्हारी माता अलखनंदा, भागीरथी के उफान को बाधने की तैयारी हो चुकी है..ताकि महानगरो में बैठे तुम्हारे पूंजीपति नौकरशाह और जन प्रतिनिधि वातानुकूलित आनंद में अय्यासी कर सकें
  5. तुम्हारे पहाड़ उजाड़ गये हैं बीरान हो गए हैं तुम्हारे धारे नौले सूख गए हैं पावन मूल स्रोतों के आसपास पेप्सी, कोका कोला, बेफेर्फ़ के पैकेड और डेनिस,  ओल्ड मोंक की अध्धे पव्वे नजर आती है गांव के गांव खाली हो गए , तुम्हारे आकाओ के पास कोई वैकल्पिक हल नहीं है जिस अवधारणा के लिए 17 पहले मुझे अलग किया , आज तुम भूल गये ? 
  6. तुम्हारे पहाड़ो का कोई ग्वाला गुसाई माई बाप नहीं है कई पहाड़ मैदान डांडे(पहाड़) सब बिडला टाटा सिंघानिया  अम्बानी जिंदल ने खरीद लिए अब वो दिन दूर नहीं जब किसी रास्ते सड़क पर बोर्ड में लिखा जाएगा ‘पहाडी और जानवरों के लिए ये रास्ता आम नहीं है …पर चिंता मत करो तुम फिर भी वहीँ गुजरोगे उन रास्तो से क्यूंकि उन अमीरों  में जूठे बर्तन तुम ही साफ़ करोगे या सिडकुल की तरह 5000 की पगार में मजदूरी करोगे  …आज तुमने अपनी मात्रभूमि को बाजार में नीलाम कर दिया है जो चाहे बोली लगा ले हिमांचल प्रदेश सा ‘भूमि अधिग्रहण बिल’ भी तुम्हारे पास नहीं
  7. तुम्हारे बस अड्डो ,रेलवे स्टेशनों में लटकाए मुर्गो के तंदूर के उड़ने वाले ‘भभके’ पंजाबी माडवाड़ी खाने, ठेके बार, अंग्रेजी शराब की  बढती दुकानों  और हिमाचल प्रदेश यूरोप सा पर्यटन की बात करने वालो,  ऋषि मुनि तपस्सियो की भूमि को तुमने शराब कबाब अय्यासी का जो अड्डा बना दिया है ..क्या इस हाल में देवभूमि देखने वाला पर्यटक क्या यही सब देखेगा ?
  8.   अपने मूल भाषा संस्कृति  से दूर ‘आई हेट पहाडी संस्कृति’ वाले तुम्हारे नौनिहाल को तुम क्या दे जाओगे जो तुम्हे वो याद करेंगे ?
  9. पूरी जिन्दगी की खून पसीने की कमाई से गर्मी से तपते तराई भाभर में भभकने बसने के लिए तुम्हारे रहनुमा हर साल भू माफियाओ के बाजार मूल्य बढ़ा देते हैं और राजस्व मूल्य घटा देते है ताकि भू माफिया रुपी कुम्भकर्ण तुम्हें खा जाएँ और परदेसियो की तरह तुम भाभर तराई में मेट्रो गुमनाम बुढ़ापा गुजारो  अब फिर से चुनाव आ रहा है तुम श्रापित कुल्सित अपने को छद्म बुद्धिजीवी कहने वालो फिर से सब भूल जाओ जो तुम युगों के भूलते आये हो और इस बार भी अपनी नयी पीढी  इजाओ आमाओ माताओं बुजर्गो को अपनी जमीन फिर भुलवा दो और फिर से राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता को उलझा दो अव किसी भी कीमत पर उनको जीत चाहिए पहाड़ो के  अरमानो की लाश पर भी …कौन किस ओर है और किसके साथ मौका परस्ती के खेल ? सब तुम्हारे सामने फिर भी तुम अंधे देख नहीं पा रहे  

पर ध्यान रखो ऐ अंधे धार्तराष्ट्रो, तमाशाई  द्रोणाचार्यो भीष्मो तुम्हे भी एक दिन सरसय्या में लेटना होगा तुम्हारा भविष्य तुम्हे ऐसी शब्द बाण मरेगा और इतिहास तुम्हे कौरवो की तरह याद करेगा 

मैं देवभूमि तो केवल पहाड़ के पावन तपवस्वी लोगो के अंश ,धारो ,नौलो ,बीरन, डाँडो बुजुर्गो माताओं के लिए दुखी हो रही हूँ  पर न जाने कब तक ?

 

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