फूट डालो राज करो , बांट डालो राज करो : हरीश रावत

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हरीश रावत यानी फूट डालो राज करो कहा जाए तो कोई बुरा नहीं होगा कहते है की राज्य का मुख्या राज्य के लोगो की पीड़ा और  दुःख – सुख का साथी होता है लेकिन हरीश रावत तो जनता का प्रति हरदा के नाम से प्रख्यात और सुविख्यात है लेकिन काम धन्दे जनता के अनुकूल नहीं सिर्फ अपने और चेलो – चापटो के लिए राज्य का खजाना तीन  साल लुटते रहे लोगो को ही नहीं बल्कि कांग्रेस को नेताओ मे भी फूट डाला और राज करा ,  ईस्ट इंडिया कंपनी भी ऐसा नहीं करती थी जैसा हरीश रावत ने उत्तराखंड मे इन तीन सालो मे किया हो राज्य का खजाना खली और सबको तीन साल तक लोलीपोप देने का काम किया जनता को ही नहीं राज्य के प्रतिनिधियो  और लोकतंत्र के कुछ चौथे स्तंभ भी हरीश रावत खली निप्पल से दूध पिलाते रहे लेकिन अन्त मे लोग हरीश रावत की चल को समझ गए,  अब चुनाव के समय झूठे वादे और जनता को भर्मित करने का सिलसिला जारी है झूठे नारों और वादों के साथ फिर जनता के द्वार वोट मागने का सिलसिला जारी रखे है , आखिर हरीश रावत ने इन तीन सालो मे ऐसा कौन सा काम कर दिया की जनता इन्हें दुबारा वोट दे ?….    यही नीति अपनाई थी फिरंगियों ने हिंदुस्तान में राज करने के लिए। आए थे व्यापार के बहाने और गुलाम बना लिया पूरे देश  को। अंग्रेजों ने भाषाई आधार पर देश  के लोगों को बांटा और राज किया। वही काम सूबे की हरीष रावत सरकार फिरंगियों से बेहद प्रभावित है और उन्हीं के नक्षे कदम पर चल रही है। अंग्रेज तो विदेषी थे और दूसरे देश  में राज करने के लिए उन्होंने अपनी उसी तरह की नीति बनाई थी , लेकिन जनसेवक के नाम पर चुने जाने वाले नेता भी वही नीति अपना रहे हैं यों तो राजनीति में साम, दाम, दण्ड, भेद सब अपनाए जाते है इससे सब वाकिफ है लेकिन हमारे सूबे के सूबेदार ने तो हद ही कर दी है। अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए हरीष रावत कोई भी  कसर नहीं छोड़ रहे हैं अब वे प्रदेश  के लोगों को आरक्षण के नाम पर बांट रहे हैं। यानि जातियों को आधार बनाकर समाज के टुकड़े-टुकड़े कर रहे हैं। सिर्फ और सिर्फ अपनी राजनीति के लिए। आरक्षण की आग में ही जला था उत्तराखण्ड। आरक्षण के आंदोलन ने ही रूप लिया था नए राज्य की मांग के आंदोलन का। जिस आरक्षण के खिलाफ राज्य जला, यहां के सपूतों ने जान की कुर्बानियां दीं, अब उसी के नाम पर इस राज्य को बांटा जा रहा है। हरीश  रावत जातियांे और इलाकों के नाम पर बांट रहे हैं मासूम जनता को। हाल ही में उनकी सरकार ने उत्तराखण्ड में रहने वाली तीन जातियों को ओबीसी का दर्जा दे दिया। जिन तीन जातियों को ओबीसी का दर्जा दिया गया है उनमें पौड़ी के राठ का पूरा क्षेत्र, चमोली के पैनखंडी और गंगाड़ी समुदाय षामिल है हद हो गई पूरे राठ इलाके को ही ओबीसी में षामिल कर दिया गया यहां की किसी खास जाति को नहीं किया गया। षासन ने इसके लिए आदेष भी जारी कर दिए। पिछले दिनों हुई कैबिनेट की बैठक में इन तीन समुदायों के लोगों को ओबीसी आरक्षण का लाभ देने का फैसला लिया गया। जनता को इसका लाभ बताया जा रहा है कि इससे इन जिलों में रहने वाले करीब 2 लाख से ज्यादा लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलेगा। दरअसल आरक्षण का खेल करके सूबे की सरकार सिर्फ अपना राजनीतिक हित साधने की कोषिष में है। आपको बता दें कि नियमानुसार आरक्षण 50 फिसदी से ज्यादा नहीं दिया जा सकता। इसमें ओबिसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है बाकि आरक्षण एससी और एसटी जातियों के लिए है। उत्तराखण्ड में एससी औ एसटी की जनसंख्या कुल आबादी की तीन फीसदी भी पूरी नहीं है। ऐसे में एससी के आरक्षण का लाभ उत्तराखंड से बाहर के लोग यहां आकर लेते हैं। सरकारी नौकरी में उन्हीं को फायदा मिलता है। राज्य में जब एससी , एसटी हैं ही नहीं तो उनका लाभ बाहरी ही लेगा। अब रही ओबिसी की बात। ओबीसी में सरकार इस कदर जातियों को षामिल कर रही है ताकि उसका पूरा लाभ कांग्रेस को मिले। सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों से सामाजिक और षैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने कानून के जरिये सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाशाई अल्पसंख्यक षैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिषत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की है। संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया। केंद्र सरकार ने उच्च षिक्षा में 27 फीसदी आरक्षण दे रखा है। राज्य अपने यहां आरक्षणों में वृद्धि के लिए कानून बना सकते हैं। सर्वोंच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता।

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