गौरी लंकेश,शांतनु भौमिक ,के जे सिंह की मौत ?नहीं थम रहा पत्रकारों की हत्या का सिलसिला?

विमल सती /रानीखेत उत्तराखंड

महान कथाकार रामबृक्ष बेनीपुरी ने कहा था कि ‘पत्रकारों, लेखकों और कवियों को विद्रोही होना चाहिए तभी समाज, राजनीति और मानव का कल्याण संभव है।‘लेकिन समय का पलटा देखिए, आज यही विद्रोहीपन,आजाद कलम अपनी कुर्बानी मांगती है। कलम के साथ आजाद हो जाना एक तरह से खतरे को निमंत्रित करना है। कलम की आबरू बचानी है तो आपको जान की बाजी लगानी ही होगी या फिर दूसरा रास्ता सत्ता और सियासत के दरबार की ओर जाता है जहां आप कलम को सलामी के अंदाज में झुका कर स्तुतिगान कीजिए और सुरक्षित रहिए।
       अभी-अभी त्रिपुरा से टीवी पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या की खबर मिली। उससे पहले कन्नड़ पत्रकार गौरी लंकेश,दो वर्ष पूर्व शाहजहांपुर में जगेंद्र नाम के पत्रकार को जला दिया गया, पीलीभीत में एक पत्रकार को मोटर साइकिल के पीछे बांधकर घसीटा गया।2014 में उड़िया पत्रकार तरूण कुमार आचार्य को एक काजू सयंत्र के मालिक ने इसलिए मरवा दिया क्योंकि उसने सयंत्र में कार्य कर रहे बच्चों की अमानवीय स्थिति को उजागर किया था।तेलुगु पत्रकार एमवीएन शंकर की एक स्थानीय माफिया ने इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने केरोसिन की कालाबाजारी का खुलासा किया था। इतना ही नहीं,2013 में भारत को पत्रकारों के लिए सीरिया और इराक के बाद विश्व का तीसरा सबसे असुरक्षित देश माना गया क्योंकि इस वर्ष देश में 11 पत्रकारों को मौत के घाट उतारा गया।
     आज सत्ता केंद्रों में बैठे लोग और उनके संरक्षण में फलफूल रहा माफियातंत्र अपने खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं, और सच्चाई सामने आने के बाद उनकी गुस्से भरी बिलबिलाहट किसी पत्रकार की मौत के रूप में सामने आती रही है।पहले पत्रकारों की हत्या के बहुत कम मामले सुनाई देते थे लेकिन हालिया वर्षों में इस तरह के मामलों में इजाफा हुआ है,ये दीगर बात है कि ऐसे पत्रकारों की राष्ट्रीय पहचान न होने के कारण उनकी मौत के साथ ही मौत की खबर भी मर जाती है। नीम सच्चाई यह भी है कि आज ऐसे निर्भीक पत्रकारों के पक्ष में न तो पत्रकारों की बड़ी जमात खड़ी दिखती है और न ही मीडिया समूह के मालिक। क्योंकि पत्रकारिता का चेहरा, तेज व मिज़ाज अब पहले जैसा नहीं रहा।कहना न होगा पत्रकारिता पहले से जितनी स्वच्छंद हुई है उतनी ही चापलूस भी।
     पहले राजाओं के दरबार में प्रशस्ति गायक होते थे जो चंद मोती आभूषण के मोह में उनका काव्यात्मक प्रशस्ति गान करते थे आज न्यूज चैनल पर बैठे एंकर चीख-चीख कर सत्ता की स्तुति में उनसे भी दो कदम आगे दिखाई देते हैं। दरअसल, चैनल एवं अखबारों के मालिक भी ऐसे पत्रकार, एंकर खोज कर रखते हैं जिनकी सत्ता के दरबारों में अच्छी पैठ हो और उनके जरिए विज्ञापनों से अर्थ जुटाया जा सके।ऐसी दरबारीपन वाली पत्रकारिता से आप सत्य को उद्घाटित करने या फिर ज्वलंत समस्याओं को रोशनी में लाने की उम्मीद कैसे कर सकते है?यह दुखदायी सत्य है कि ऐसी पत्रकारिता का न कोई मानवीय दायित्व दिखता है न कोई सामाजिक सरोकार।
     सत्ता के किसी जनविरोधी निर्णय पर भी इनका नुक्ताबीं नज़रिया सिरे से गायब दिखता है और कलम का जब़ी सत्ता दरबार में स्वलोभवश झुका दिखाई देता है।जिस दौर में पत्रकारिता सामाजिक सरोकार रखती थी तो समाज भी उसके साथ बद्ध नजर आता था आज पत्रकारों की हत्याओं पर समाज में हलचल नदारद रहने का कारण यही है कि पत्रकारिता ने वैचारिक चरित्र खोने के साथ ही अपनी समृद्ध गौरवशाली परम्परा को धूमिल कर दिया है।पत्रकारिता क्षेत्र ने जिस तरह देश में कुछ वर्षो में व्यापक विस्तार लिया उसी तेजी से इसमें‘दलाल भर्ती‘ भी हुई यही कारण है कि इस दौर में पत्रकारिता का पेशा उतना आदरेय नहीं रहा जैसा कभी था।
   आज प्रशस्ति गायकों की भीड़ में ऐसे सजग, निडर पत्रकारों को ढूंढना बेहद कठिन है जो आलोचना धर्म की चुनौतियों व खतरों को स्वीकारते हुए देश के कोने-कोने में व्यवस्था को पंगु बना रही दिशाहीन भ्रष्ट राजनीति को बेपर्दा कर रहे हैं। क्योंकि ऐसे पत्रकार गिनती के हैं, और संावादिकता के कथित टाई वाले स्तुति गायक बहुतायत में, जो सत्ता के स्तुति नायकों का एजेंडा बांच रहे हैं।
    ऐसे में,बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे पत्रकार जो मानवीय दायित्व, सामाजिक सरोकार और आलोचना धर्म की चुनौतियों का स्वीकारते हुए खडे़ हैं क्या स्वयं को बचा पाएंगे?वह भी तब जब असंगठित पत्रकार बिरादरी, पत्र-चैनल समूह के स्वामी उनसे हाथ छुड़ाते दिखते हैं।और ऐसे में क्या देश में निर्भीक पत्रकारिता का अस्तित्व बच पाएगा? और सत्तानिष्ठा के पत्रकारीय दौर में एक पत्रकार को पत्रकार रूप में जीवित रहना होगा या प्रशस्ति गायक के रूप में?यह शायद हमें ही तय करना होगा।
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