सरकार जी! थोडा गुरूजी की भी तो सुनें ! , भाग-2

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(देव कृष्ण थपलियाल)

साल भर पहले कुछ समय के लिए नियुक्त किये गये ’अतिथि शिक्षकों’ के मामले में सरकार की हीलहवाली नीति सरेआम हुई है, सरकार और हुक्मरानों नें इनके साथ ऐसा खेल-खेला जैसे मानों ’कोई अपना दिल बहला रहा हो’ जबकी इन शिक्षकों के नियुक्ति होंनें से राज्य की शिक्षा व्यवस्था को ढर्रे पर लानें में बडी मदद मिली, धार-खालों के इण्टर कालेजों में लोंगों नें वर्षों बाद गणित, रसायन, फिजिक्स और अंग्रेजी जैसे कठिन विषयों के अध्यापकों के दीदार किये और अभिवाहकों नें राहत की सांस ली। दूसरी तरफ ’अतिथि शिक्षक’ के रूप में नौकरी पाये इन नौजवान युवक/युवतियों नें अपनी शिक्षा ग्रहण के दौरान कभी ऐसा संघर्ष नहीं देखा होगा जो उन्हे सरकार नें ’पुर्ननियुक्ति’ के दौरान दिखाये। अब आधी-अधुरी नियुक्ति के बाद ये शिक्षक फिर असमंजस में हैं अतएव वे आगामी दिनों में सडकों पर नहीं उतरगें ! पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता पर अपनें बाजिब हकों के लिए यह उनका अपना अधिकार भी होगा और कर्तव्य भी।

वर्षों से अनशन पर बैठे शिक्षा आचार्यों को लेकर सरकार की कोई स्पष्ट नीति अभी उजागर नहीं हो पाई है, 2012 से राज्यभर के 910 शिक्षा आचार्यों का कहना है की उन्हें शिक्षा मित्रों की श्रेणी में रखा जाय। सालों से ये लोग भी राज्य के सरकारी स्कूलों में बतौर शिक्षक अपना योगदान दे रहें हैं, क्या सरकार का ये दायित्व नहीं हैं कि उनके काम और योगदान को देखते हुए उन्हें उनकीं माॅगों का उचित समाधान दिया जाय ? वे वर्षों से सरकार के आगे हाथ फैलाकर अपनें जायज अधिकारों की माॅग कर रहे हैं। दूसरी राज्य हजारों-लाखों की तादात में शिक्षित-प्रशिक्षित युवा अपनीं नौकरी के लिए दर-दर की ठोंकरें खानें को मजबूर हैं,उनके सामनें उनका अंधकार होता भविष्य उन्हें अवसाद के गर्त में धकेल रहा है, यह राज्य की दोतरफा क्षति है एक तरफ हमारी बौद्विक क्षमता क्षरण हो रहा है तो दूसरी तरफ इन युवाओं की ऊर्जा नकारात्मक रूप से व्यय हो रही है।

सेवारत शिक्षकों की कोई ठोस नीति न होंनें से भी हडताल को बढावा मिल रहा है, मौसम के साथ-साथ बदलनें वाली रीति-नीतियो से शिक्षा का भला कैसे हो सकता है ? ट्राॅसफर, पोंस्टिंग और प्रमोशन व वेतन भत्तों में तमाम तरह की विंसगति व्याप्त है, तरक्की की बाट जोह रहे वरिष्ठ शिक्षक कब सेवानिवृत्त हो गये, उन्हें पता ही नहीं चला ? इससे शेष शिक्षक कर्मियों के मनोबल को आघात पहुॅच रहा है। अभी हाल में प्राथमिक, जुनियर और माध्यमिक शिक्षक संगठन हडताल पर थे, हालांकि प्राथमिक और जुनियर स्कूलों के शिक्षकों की हडताल महज चेतावनी के लहजे में बीच-बीच में होती रहीं, पर माध्यमिक शिक्षकों की लम्बी हडताल के चलते छात्रों का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई होंना बेहद मुश्किल है ?

सवाल ये भी है की इन शिक्षकों की मॅागों में कुछ भी ऐसा नहीं है, कि जिससे सरकार को कोई आपत्ति होती ? ये माॅगें सभी संवैधानिक दायरे में ही हैं, जिनका समाधान सरकार चाहे तो तत्काल संभव है। राजकीय माध्यमिक शिक्षक संगठन की माॅग पर गौर करें तो उनकी माॅगें हैं कि उन्हें तीन विशेष अवकाश मिलें, प्रोन्नत वेतनमान के तहत वेतनवृद्वि हो, पेंशन प्रकरण से वंचित शिक्षकों को पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाय, विद्यालयों में कोटिकरण के लिए कमेटी गठित की जाय, शारीरिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाय आदि-आदि, माना की इनमें से कुछ माॅगे सरकार और शासन स्तर से तत्काल संभव न भी हो किन्तु ज्यादातर माॅगे जायज होंनें के साथ-साथ जनोपयोगी भी हैं, जिनका समाधान संभव है, तथापि इन माॅगों को महज एक प्रार्थना पत्र/माॅग पत्र के जरिये ही मान लेंना संभव है।

लेकिन ये शासन में बैठे उच्चाधिकारियों का निकम्मापन ही है, कि उन्हे बार-बार की चेतावनीं देंनें के बावजूद वे अपनीं आॅखें खोलनें को तैयार नहीं है, बल्कि असली सवाल शासन में उन उच्चाधिकारियों और नेताओं की ’मानसिकता’ से भी हैं जिन्हें लगता है, ’’पढनें-पढानें का काम कोई भी कर/करा सकता है’’ अथवा ’’बिना पढे भी लोग पास हो जा रहे हैं’’ इसलिए शिक्षक और शिक्षालयों के बारे में उनके खयालात लगभग ’हल्के किस्म‘‘ के ही हैं, जिसका परिणाम आज खाली होते सरकारी विद्यालयों के परिसरों से साफ दृष्टिगोचर हो रहा है।

अगर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण संसाधन के प्रति हमारे हुक्मरानों की यही नीति रही, तो यकीनन राज्य की शिक्षा व्यवस्था और गरीब अवाम् के शिक्षा पाना बेहद मुश्किल हो जायेगा। एक दिन ऐसा भी आयेगा की सरकार द्वारा संचालित शिक्षा व्यवस्था पर बनिये, मुनाफाखोरों और व्यापारियों का ही राज होगा, (शायद यही सरकार चाह भी यही रही है,) जिनमें दाखिले के लिए योग्यता नहीं, आर्थिक हैसियत के आधार पर तय किये जायेंगें ? और तब इंसानों का नहीं हैवानों की संस्कृति से संचालित होगा ? फिर राज्य के सभ्य और सूसंस्कृत होंनें की आशा करना भी व्यर्थ है, क्योंकि जब तक किसी संगठन, संस्था को चलानें के लिए कोई नीति-नियम या निर्देशन अथवा सूस्पष्ट सोच का अभाव है तो हमें उसे आगे बढते देखनें की कल्पना भी नहीं करनीं चाहिए ? शिक्षा विभाग की कारगुजारियों को देखकर तो कम से कम यही लगता है,वह जैसे मेला खत्म हो और सामान समेटनें की तैयारी में है।

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