सरकार जी! थोडा गुरूजी की भी तो सुनें ! , भाग-1

male-teacher-cartoon500

(देव कृष्ण थपलियाल)

आये-दिन शिक्षक संगठनों की हडताल से राज्य के नौंनीहालों की शिक्षण व्यवस्था का बूरी तरह से प्रभावित हों जाना स्वाभाविक है, जिसका सबसे बडा असर पहाड के उन दूर-दराज इलाकों के सैकडों-हजारों ग्रामीण बच्चों को झेलना पड रहा है जिनका एकमात्र, शिक्षा का साधन ये सरकारी विद्यालय ही हैं,( अथवा जिनके पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं), तमाम कोशिशों के बाद राज्य सरकार नें इन विद्यालय को स्थापित तो कर दिया, पर समुचित प्रबंधन के अभाव में ये स्कूल जैसे-तैसे चल रहे हैं। चुकीं अब बाजार-कस्बों में सरकारी विद्यालयों का अस्तित्व घट रहा है, या वे पूरी तरह से बंद होंनें की कगार पर हैं। अतः इसी बहानें इन विद्यालयों को शिक्षक ’नसीब’ तो ही हों रहे हैं, परन्तु बार-बार की हडताल से इन बच्चों के भविष्य के साथ जो खिलवाड हो रहा है वह चिंता का विषय है।

आर्थिक रूप से संपन्न लोग तो वैसे भी पहाडों में नहीं हैं, जो बचे-खुचे हैं, वे भी किसी खास परिस्थितियों के चलते गाॅवों में हैं, लेकिन गरीब के लिए यही शिक्षण संस्थान सब कुछ हैं, बार-बार शिक्षकों का शिक्षण कार्यों से विरत होंना व अपनीं माॅगों को लेकर सडकों पर उतरकर, हरदम सरकार से दो-दो हाथ करनें के मुढ में रहनें से, राज्य की शिक्षा व्यवस्था लगभग चैपटाये नमः है, खास तौर से जब से राज्य अस्तित्व में आया है, तब से लेकर आज तक किसी न किसी बहानें राज्यभर के स्कूलीं शिक्षक, स्कूलों में कम, देहरादून राजधानी स्थित सचिवालय, विधान भवन और मुख्यमंत्री आवास जैसे बडे से बडे गलियारों की शोभा बढाते/इर्द-गिर्द चक्कर लगाते, आॅदोलित होते हुए ज्यादा नजर आते हैं।

लेकिन राज्यभर के गाॅव-गलियों से लेकर आम बाजार-कस्बों में इस बात की चर्चा है, कि गुरूजी लोगों की असली दिक्कत क्या है ? वे बार-बार शिक्षण जैसे महत्वपूर्ण काम को त्यागकर हडताल पर जानें को क्यों अभिसप्त हैं, अर्थात उनका टारगेट भी ये गुरू लोग ही होते हैं, एक आम आदमी के लिए वैसे भी सरकार और उसकी नीतियों से बहुत ज्यादा वास्ता नहीं होता, इसलिए वे किसी भी रूकावट के लिए शिक्षकों को ही दोषी मानते हैं/मानते रहे हैं, जबकी सच्चाई ये भी है की हर बार शिक्षक ही दोषी नहीं है, अगर हमारे शिक्षकों का अतीत, और वर्तमान खंगालें तो सच्चाई कुछ और होगी।

सीधी बात कहें तो सरकार की रीति-नीतियाॅ ही ढुलमूल हैं, जो राज्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए अवरोध का काम कर रही है, वरना शिक्षकों का आचरण ऐसा नहीं है/रहा है ? उन्होंनें हमेशा से ही एक शिक्षक के दायित्वों का निर्वहन पूर्ण ईमानदारी और जबावदेही के साथ किया है, आज भी ऐसा नहीं है, कि हमारे शिक्षक/शिक्षिकाओं में अपनें कार्यों के प्रति कोई उदासीनता अथवा लापरवाह हो, स्कूल-विद्यालयों में शिक्षक गणों से जिस सृजनात्मक वातावरण की अपेक्षा थी वे उसके प्रति पूर्ण समर्पित हैं।

Facebook Comments

Random Posts