हरीश का एजेंडा, ‘बस मैं ही मैं’

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योगेश भट्ट

मुख्यमंत्री हरीश रावत के सियासी हुनर को देखते हुए उनके बारे में कहा जाता है कि वे किसी दुधमुंहे बच्चे को छह महीने तक बिना दूध के पाल सकते हैं। अब जबकि वे प्रदेश की सियासत में एक पारी खेल चुके हैं तो यह बात पूरी तरह सही मालूम पड़ती है। इसके साथ ही उनका यह ढाई साल से ज्यादा अवधि का कार्यकाल एक और कहावत, ‘बरगद का पेड़ अपने नीचे दूब तक को नहीं पनपने देता’ को भी चरितार्थ करता है। यूं तो वे राजनीति के सभी दाव-पेंचों में निपुण हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कला झूठ बोलना है। ये कहना कि यह कला उनमें कूट-कूट कर भरी है, गलत नहीं होगा। बीते ढाई साल में इस कला के दम पर उन्होंने किस किसको नहीं भरमाया। अपने सहयोगी मंत्रियों से लेकर दिल्ली के आकाओं और पक्की नौकरी की मांग कर रहे संविदा कर्मियों से लेकर रोजगार की बाट जोह रहे पढे-लिखे बेरोजगारों, पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं और पत्रकारों तक को उन्होंने गच्चा दिया। इन ढाई सालों में उन्होंने सब कुछ अपनी मर्जी से किया। इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि उनके द्वारा कहा गया एक वाक्य, ‘न खता न बही, जो हरीश रावत कहे वो सही’ आज प्रदेश में सबसे ज्यादा कहा-सुना जाने वाला जुमला बन चुका है। मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार से लेकर संगठन तक हर जगह उनका ‘मैं ही मैं’ चलता रहा। सरकार और संगठन दोनों में शायद ही कोई होगा जिसे उसका मनचाहा समय पर मिला हो। बेरोजगारों के साथ भी हरीश रावत ऐसा ही करते रहे। पूरे सालभर उन्हें नौकरी का सपना दिखाते रहे। दावा करते रहे कि हजारों की संख्या में नौकरियां आने वाली हैं, और आखिर में कितनी नौकरी निकली, हर कोई जानता है। इसी तरह समाज के तमाम वर्गों को भी वे कभी परवान न चढ सकने वाली योजनाओं की मीठी गोली से लुभाते रहे। अपने सहयोगी मंत्रियों को बीते ढाई साल में उन्होंने कितनी तवज्जो दी ये बात उनके मंत्रीगण ज्यादा बेहतर जानते हैं। तमाम मौकों पर बेचारे मंत्रियों को यह तक पता नहीं चलता था कि उनके महकमे में क्या चल रहा है। घोषणाओं का अंबार लगाने के बाद यह दावा करना कि दो तिहाई से ज्यादा घोषणाएं पूरी हो चुकी हैं, उनके द्वारा कहा जाने वाला एक और बड़ा झूठ है। पहले बहलाना, फिर टहलाना और आखिर में किसी को एक्सपोज कर देना तो कोई इनसे सीखे। सूचना आयुक्त की नियुक्ति वाला प्रसंग इसका सबसे सटीक उदाहरण है। पिछले दो सालों में वे कई पत्रकारों को सूचना आयुक्त बनने का ख्वाब दिखाते रहे। देहरादून ही नहीं बल्कि दिल्ली और मुंबई तक के कई पत्रकारों के आगे उन्होंने यह चुग्गा डाला हुआ था। बेचारे पत्रकार सूचना आयुक्त पद के नियुक्तपत्र का इंतजार करते रह गए और इधर राज्य में आचार संहिता लग गई। अब ये पत्रकार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, लेकिन किसी से भी दर्द बयान नहीं कर पा रहे। दरअसल इनमें से कई पत्रकारों ने तो अपनी कलम तक गिरवी रख दी थी। मुख्यमंत्री ने अपनी छवि चमकाने के लिए उनका भरपूर इस्तेमाल किया। लालबत्तियों के बंटवारे में भी उन्होंने अपने संगठन के लोगों की फजीहत करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पहले तो लाख मिन्नतें करने के बाद भी कांग्रेस संगठन के लोगों को दायित्वों से दूर रखा और जब चुनाव आचार संहिता लगने में चंद दिन बाकी रह गए तो उन्हें रेवड़ियों की तरह दायित्व बांट दिए। इससे इन कांग्रेसियों की खूब जगहंसाई हुई। ऐसे तमाम प्रसंग हैं जिन पर लिखना शुरू कर दिया जाए तो कलम-कागज कम पड़ जाएंगे। बहरहाल उनके इस ‘मैं ही मैं स्टाइल’ से इतना तो साफ हो चुका है कि वे अपने आगे किसी और को फूटी आंख भी नहीं देख सकते हैं। अब देखने वाली बात यह है कि उनके इस स्टाइल को प्रदेश की जनता से कितनी स्वीकार्यता मिलती है।

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