भांग के फैसले से कितने लोग खुश उत्तराखंड मैं

bhang123

शंखनाद टीम

 

हरीश रावत   के कुछ  फैसले  उनके   लिए ही मुसीबत  बनते  जा रहे  हैं ? आज शंखनाद  टुडे  टीम  एक  उनके  किये फैसले  पर आम  राय जानने की कोशिस कर रही   है भांग का फैसला  चुनाव  मैं  किस  तरह   काम करेगा  यह  फैसला  पहाड़  के हित  मैं है या नही क्या इससे पहाड़  मैं बेरोजगारी दूर होगी ? भांग  का फैसला क्यौं लिया गया ? क्या  हरीश  रावत  के   राजनीतिक  सलाहकार  फ़ैल  हो चुके  हैं ?सवाल  बहुत   सारे  हैं  इस  पर आपकी  राय  भी तय  करेगी  की भांग  के फैसले    हरोश  रावत  घिर  चुके  हैं ?क्या उस  पर सोशल  मीडिया  पर  लोग  क्या  प्रतिक्रियाएं  लोग  दे  रहे हैं

सुनील  नेगी

उत्तराखंड सरकार ने लगाई भांग की खेती पर अपनी सकारात्मक मोहर, क्या ये सही फैसला है ? अपनी रे दें, दोस्तों
उत्तराखंड में मौजूदा सरकार ने भांग की खेती को क़ानूनी अमलीजामा पहनाकर इसे वैध करार कर दिया है. हालाँकि यह तथ्त्य किसी से छिपा नहीं है की दुनिया के पैमाने पर लघभग हर देश भांग की खेती को क़ानूनी दृष्टिकोण से अवैध मानता है और इनपर बकायदा रोक लगाई है. कौन नहीं जानता की भांग से हेरोइन जैसे अत्यधिक जानलेवा जहर पैदा होता है और अन्य प्रकार के कई नशे जिनकी अंतराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों की कीमत होती है और इनका जुड़ाव सीधे सीधे नशे के तस्करों, उग्रवाद, अपराध और अंडरवर्ल्ड की दुनिया से होता है. यानि अगर ईश्वर की धरती पर भांग जैसे खतरनाक नशीली प्रजाति की व्यापक खेती को सरकार इजाजत देती है तो इसके मायने साफ़ हैं की देवभूमि उत्तराखंड में अब अपराध की दुनिया की संकरी गलियों का वो रास्ता खुल जायेगा जहाँ से बर्बादी और युवा पीढ़ी के अंधकारमय भविष्य के अल्लावा और कोई रास्ता नहीं दिखाई देता. इतिहास गवाह है की जिन मुल्कों में भांग की कह खेती को बढ़ावा मिला वो मुल्क पूरी

 

योगेश  भट्ट

 

जाते-जाते भांग भी झोंक गए
मुख्यमंत्री हरीश रावत के एजेंडे में अब एक भांग ही बची थी, जिसे भी उन्होंने जाते-जाते उत्तराखंड के भाग में झोंक दिया है। अभी तक सरकार ने जितने भी बड़े फैसले लिए, उन सभी के पीछे कोई बड़ा गेम जरूर रहा है।

ऐसे में भांग के पीछे दिखाई गई इस ‘बेचैनी’ का भी देर सवेर खुलासा हो ही जाएगा। प्रदेश में भांग की खेती को बढावा देने के पीछे सरकार का तर्क भले ही यह हो सकता है कि इससे लोगों को रोजगार मिलने के साथ ही राज्य की आमदनी में भी इजाफा होगा।

सरकार यह तर्क भी रख सकती है कि भांग के रेशों और डंडों के व्यावसायिक उपयोग से होने वाली आमदनी को प्रदेश के विकास में लगाया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि मुख्यमंत्री हरीश रावत के विकास के एजेंडे में यदि भांग ही है, तो फिर वे कोदे झंगोरे की बात क्यों करते हैं? पहाड़ी दाल, पहाड़ी सब्जियों की बात क्यों करते हैं?

खेतों में अगर भांग उगेगी तो फिर ये सब क्या घरों की छतों पर उगेगा? यह विरोधाभास नहीं तो क्या है? प्रदेश में होने वाली पारंपरिक खेती की बात करें तो उसमें कोदा, झंगोरा, चौलाई, सोयाबीन आदि मोटा अनाज, राजमा, गहत, उड़द जैसी दालें और मौसमी सब्जियों का उत्पादन शामिल है। बाजार में इस सब की भारी मांग भी है।

दूसरी तरफ भांग की बात करें तो पहाड़ी समाज में इसे अभिशाप माना जाता है। इतना बड़ा अभिशाप कि यदि किसी कारणवश उम्मीद के मुताबिक फसलों का उत्पादन न हो पाए, तो कहा जाता है कि खेतों में भांग जम गई है। गौर करने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री हरीश रावत ने चौतरफा विरोध के बावजूद प्रदेश में भांग की खेती को हरी झंडी दी है।

जाहिर है इसके पीछे कोई तो खास बात होगी। एक और महत्वपूर्ण बात है जिस पर ध्यान आकृष्ट कराना जरूरी है। मुख्यमंत्री हरीश रावत के बेटे हैं, आनंद रावत। सियासत में बहुत पहले ही एंट्री कर चुके आनंद रावत पिछले कई दिनों से नशे के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं।

प्रदेशभर में जनता, खास कर युवाओं के बीच जाकर वे उन्हें नशे के दुष्प्रभावों से रूबरू करा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनके पिता हरीश रावत भी उनका पूरा सहयोग कर रहे हैं।

कमाल है। एक तरफ नशे के खिलाफ अभियान और दूसरी तरफ नशे की खेती को बढावा देना। इसका क्या मतलब निकाला जाए? जिस प्रदेश का युवा लगातार नशे के दलदल में धंसता जा रहा है, जिस प्रदेश में आए दिन भारी मात्रा में नशीली सामाग्री पकड़ी जा रही है, जिस प्रदेश में रोजाना नशे की वजह से एक परिवार तबाह हो रहा है, उस प्रदेश में नशे की खेती को वैधता देकर क्या मुख्यमंत्री सबके भविष्य के साथ नहीं खेल रहे?

उत्तराखंड में स्कूल जाने वाले किशोरों से लेकर तीर्थ यात्रा पर आने वाले जोगी-जोगटों तक के लिए भांग सबसे सुलभ नशा है। ऐसे में जब यहां भांग उगाने की खुली छूट मिल जाएगी तो हालात किस कदर बिगड़ सकते हैं, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर कहना गलत नहीं होगा कि प्रदेश के भविष्य की कीमत पर बोई जाने वाली यह भांग वाकई में प्रदेश के भाग्य में ही बो दी गई है।

तरह से बर्बाद होकर इतिहास के गर्त में समा गए. आप क्या कहेंगे

Facebook Comments

Random Posts