इंदिरा हृदयेश के पुतले की खबर को कौन पी गया?

 

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(शिव प्रसाद सती)
कौन पी गया इंदिरा हृदयेश के पुतले की खबर को? अधिकांश मीडिया में आज यह सवाल उठ रहा है कि इस खबर को रुकवाने के लिए कितने रुपयों की डील हुई? पत्रकारिता के लिए खबर रुकवान कितना घातक है? संपादकों की क्या जिम्मेदारी है? आखिर पत्रकारों की खबर को छापने वाले संपादक कहां खड़े हैं? क्या सरकारी विज्ञापन खबरों के लिए घातक साबित हो रहे हैं? क्या इंदिरा हृदयेश ने सारे दैनिक समाचार पत्रों के संपादकों को फोन किया कि खबर नहीं छपनी चाहिए या सरकारी विज्ञापन आड़े आया? आज आपको कुछ ऐसे अनछुये सवालों से रुबरु कराते हैं, समाज व लोकतंत्र के लिए मीडिया ही घातक साबित होता जा रहा है सवाल बहुत खड़े हैं लेकिन मीडिया को भी दूसरों को आइना दिखाने से पहले स्वंय अपनी जिम्मेदारी का एहसास करना चाहिए तभी मीडिया पर सवाल नहीं उठेंगे।
सवाल पत्रकारिता का है कि आखिर जब पत्रकार ही समाज के अन्दर अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझेंगे तो कैसे लोकतंत्र का भला होगा? जहां मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्ब कहा जाता है वहीं उत्तराखंड में कल इंदिरा हृदयेश के पुतले की खबर को ऐसे दफना दिया गया कि मानों उत्तराखंड के संपादकों के आंखों पर काली पट्टी बंधी हो आखिर कब इनकी काली पट्टी खुलेगी यह कहना अभी उचित नहीं होगा, जब इतनी बड़ी खबर को दबा सकते हैं तो और खबरों का क्या होता होगा? मुझे लगता है कि कल का दिन उत्तराखंड की मीडिया के लिए काला दिन था क्योंकि एक कबीना मंत्री के पुतले की खबर को चारों बड़े दैनिक समाचार पत्र और अन्य छोटे दैनिक समाचार पत्र पी गए।

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कल जब देहरादून के प्रेस क्लब में पत्रकारों ने इंदिरा हृदयेश का पुतला फूंका तो सोचा कि दूसरे दिन उत्तराखंड के चारों बड़े दैनिक समाचार पत्र भी इस खबर को उठाएंगे परंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि किसी भी दैनिक समाचार पत्र में यह खबर नहीं छपी, लगता है कि देहरादून के समाचार पत्रों को इंदिरा हृदयेश का पुतला फंूकना नागवार गुजरा। जब आज प्रेस क्लब में यह बात उठी तो संज्ञान में आया है कि प्रेस क्बल के कार्यकारिणी के अधिकांश सदस्य इन्हीं चार दैनिक समचार पत्रों से ही हैं, आज मीडिया इसीलिए बदनाम हो रहा है लेकिन सवाल यह उठता है कि कि कैमरामैन खबर करके ले जाता है और वह खबर कैमरे के अन्दर तक ही सीमित रह जाती है आखिर यह जिम्मेदारी किसकी है, क्या पत्रकारों को इंदिरा हृदयेश का पुतला फंूकने का शौक था? क्या प्रेस क्लब के कुछ पत्रकार राकेश डोभाल के साथ मिले हुए थे? कौन वह विभीषण हैं जो मीडिया को बदनाम कर रहे हैं?
उत्तराखंड के चारों बड़े दैनिक समाचार पत्रों के संपादकों को क्या यह खबर नहीं लगती है कि प्रेस क्लब की भूमि पर किसी का कब्जा हो गया हो और प्रदेश के अधिकांश पत्रकार इस मीटिंग में थे लेकिन सोशल साइड और पोर्टलांें पर अधिकांश पत्रकारों ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया लेकिन इन चारों दैनिक समाचार पत्रों के संपादकों को यह खबर नहीं लगती? कहते हैं कि मीडिया को दूसरों को आइना दिखाने से पहले खुद अपनी सूरत आइने में देख लेनी चाहिए, वह तभी तो समाज को आइना दिखा पाएगा जबकि वह स्वयं साफ-सुथरा हो, लेकिन शंखनाद टुडे टीम ऐसे दैनिक समाचार पत्रों की कड़ी निंदा करता है कि जो कब्जा किया हो और उस पर प्रदेश के सभी पत्रकार एकजुट होकर एक कबीना मंत्री का पुतला फंूक रहे हो और जनता की आवाज बनने वाले ये समाचार पत्र एक पैरा की खबर न छापें तो सवाल उठता है कि पत्रकारिता कहां जिंदा है, और जो भी कैमरमैन कवर करके इस खबर को ले गए थे, इस खबर पर या तो शासन-प्रशासन का दबाव था या फिर उस कबीना मंत्री का, जिसके दबाव में इतनी बड़ी खबर को पी गए।
जब शंखनाद टुडे संवाददाता ने दैनिक समाचार पत्रों के ब्यूरो प्रमुखों और वरिष्ठ संवाददाताओं से इस खबर पर प्रतिक्रिया जाननी चाही तो सभी अपना-अपना पल्ला झाड़ने लगे कि हमें इसका संज्ञान नहीं है लेकिन यह मीडिया और लोकतंत्र के लिए बहुत ही घातक है और जो विभिषण प्रेस क्लब में भूमिका भी निभा रहे हैं उन्हें तो चुल्लू भर पानी में डूब मर जाना चाहिए आखिर इनके अधिकांश प्रतिनिधि समाचार पत्रों से ही जुड़े हुए हैं लेकिन यह कहावत यहां पर चरितार्थ होती है कि जब अपने ही जमात के लोग उल्लू हों तो और का क्या भरोसा? यह तो सिर्फ एक छोटी खबर थी न जाने ऐसी ही कितनी बड़ी खबरों को ये लोग ऐसे ही पी जाते होंगे इसका अंदाजा लगाया जाना मुश्किल है, लेकिन शंखनाद टुडे टीम हर उस छोटी-बड़ी खबर को प्रमुखता से उठाता है जो जन मुद्दों और जनता के सरोकारों से जुड़ी हुई हो। लेकिन हम अंत में यही कहेंगे कि पत्रकार समाज का आइना है और लोगों को आइना दिखाएं और कोई पत्रकारों को दलाल न कहे, हमने तो सच लिखने का बीड़ा उठाया है लेकिन ये लोग ऐसा कदम कब उठाएंगे ये अभी भविष्य के गर्भ में है।

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