हठधर्मिता की इंतिहा

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दाताराम चमोली

उम्मीद है कि उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री कम से कम अब तो सरकारी आवास खाली कर देंगे। ताकि माननीय हाईकोर्ट के आदेशानुसार उनके विरुद्ध पुलिस कार्रवाई की जरूरत न पड़े। यदि इस पर भी ‘श्वेत पत्र’ जारी हो जाए कि पिछले सोलह साल में कौन-से सरकारी गेस्ट हाउस कितने दिन तक किस-किस विधायक, मंत्री, नौकरशाह, सरकारी वकील आदि के नाम से बुक रहे, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

इसी वर्ष अगस्त माह में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जब उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास खाली करने के आदेश दिए थे, तब ‘दि संडे पोस्ट’ के 14 अगस्त 2016 के अंक में अपने नियमित कॉलम ‘श्वेत पत्र’ में मैंने सुझाव दिया था कि राजनीति में ‘स्वविवेक’ और ‘स्वाभिमान’ जैसे भी कोई शब्द होते हैं। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को चाहिए कि हजारों करोड़ रुपए के कर्ज तले दबे अपने राज्य में आलीशान सरकारी सुविधाओं का मोह छोड़ दें। यह इंतजार न करें कि कल जब कोर्ट आदेश देगा तभी वे सरकारी आवास खाली करेंगे। माननीय समय रहते ही अपनी छीछालेदर कराने से बच सकते हैं। लेकिन माननीय इतने महान निकले कि उन्हें न तो छीछालेदर होने के कोई फिक्र रही और न ही 407 अरब के कर्ज तले दबे उत्तराखण्ड राज्य की। हठधर्मिता ही इंतिहा है यह। माननीय नैनीताल हाईकोर्ट का आभार कि ऐसी हठधर्मिता से जनता को मुक्ति दिलाई। रूलक संस्था के अवधेश कौशल की जनहित चाचिका पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ का यह फैसला अति सराहनीय है कि पूर्व मुख्यमंत्री हर हाल में 15 फरवरी तक सरकारी आवास खाली कर देंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो पुलिस बल का इस्तेमाल किया जाए।

अफसोस कि हाईकोर्ट के निर्देश पर सरकारी आवास खाली करने का नोटिस भेजे जाने के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, भुवन चंद्र खण्डूड़ी, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और विजय बहुगुणा गंभीर नहीं हो सके। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी अवश्य कुछ दिन पहले सरकारी आवास खाली कर गए हैं। लेकिन बड़े दर्प से कह रहे हैं कि चाहे जेल में डाल दो सरकारी आवास का किराया नहीं दूंगा। जनता में ‘भगतदा’ के रूप में लोकप्रिय पूर्व मुख्यमंत्री से अपेक्षा है कि वे अपने शब्दों पर पुनर्विचार करेंगे। अन्य पूर्व मुख्यमंत्रियों से भी अपेक्षा है कि कम से कम अब इतना तो रह जाए कि उनके विरुद्ध पुलिस बल का इस्तेमाल न करना पड़े।

दरअसल, मुख्यमंत्री किसी पार्टी विशेष के नहीं, बल्कि आम जनता और सभी पार्टियों के लिए सम्मानित होते हैं। उनसे अदर्श स्थापित करने की उम्मीदें रहती हैं, ताकि राज्य के तमाम मंत्री और विधायक उनका अनुसरण कर सकें। दुर्भाग्यवश पिछले सोलह साल में हालात यह रहे कि जनता के चुने हुए अधिकांश विधायकों और मंत्रियों ने सरकारी सुविधाओं के दुरुपयोग को ही अपना राजनीतिक धर्म बना डाला। उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक तमाम सरकारी गेस्ट हाउसों और बंगलों का रिकॉर्ड खंगाल कर देखा जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। लोग हैरान हो सकते हैं कि जो विधायक साल में 100 दिन गेस्ट हाउसों में ठहरे हों वे अपने क्षेत्रों के लिए भला क्या काम कर पाए होंगे?

हर कोई समझ सकता है कि एक व्यक्ति एक समय एक ही जगह पर ठहर सकता है। लेकिन उत्तराखण्ड में तो ऐसे भी विधायक मिल सकते हैं जिनके नाम से एक ही दिन देहरादून, नैनीताल और दिल्ली तीनों जगह सरकारी आवास बुक हुए हों। समझने की बात है कि एक ही विधायक के नाम से कोई गेस्ट हाउस या बंगला साल में कितने दिन तक बुक रह सकता है? विधायक तो दूर ऐसे भी उदाहरण मिल जाएंगे, जब कोई सरकारी वकील नैनीताल या देहरादून के किसी गेस्ट हाउस में महीनों तक ठहरता रहा हो। सरकार को चाहिए कि पिछले सोलह साल में कौन-से गेस्ट हाउस कितने दिन तक किस-किस विधायक, मंत्री, नौकरशाह, सरकारी वकील आदि के नाम से बुक हुए, उस पर जनहित में ‘श्वेत पत्र’ जारी करे।

सरकार के लिए यह श्वेत पत्र जारी करने तो राजनीति शास्त्र और समाज विज्ञान के छात्रों के लिए शोध का विषय है कि आखिर कैसे एक विधायक एक ही दिन में तीन अलग-अलग शहरों जिनके बीच सैकड़ों किलोमीटर की दूरी हो, ठहर पाया होगा? जनता के चुने हुए प्रतिनिधि सरकारी संपत्तियां को अपनी पैतृक संपत्ति समझकर दुरुपयोग करते रहे हैं। लिहाजा माननीय हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी आवास खाली कराने को लेकर जो आदेश दिया है वह स्वागत योग्य है। राज्य के विधायकों, मंत्रियों, सरकारी वकीलों या नौकरशाहों द्वारा सरकारी गेस्ट हाउसों के दुरुपयोग का विषय भी माननीय हाईकोर्ट के संज्ञान में आ पाता तो जनता को इससे काफी राहत मिल जाती। हां, यदि कोई पूर्व मुख्यमंत्री अब भी सरकारी आवास खाली नहीं करता है तो उससे मार्केट रेट के हिसाब से किराया वसूला जाना चाहिए। उन सरकारी अधिकारियों पर भी यह लागू होना चाहिए जो सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी आवास खाली नहीं करते। उन्हें सिर्फ तीन-चार माह की मोहल्लत दी जानी चाहिए। माननीय हाईकोर्ट से अपेक्षा है कि हर सप्ताह सरकार से यह जानकारी ली जाती रहे कि पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी आवास खाली करवाने की दिशा में क्या प्रगति हुई?

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