इस जलस्रोत पर होती है ‘‘भूत’’ की स्तुति… पढ़िए कहां

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प्रेम पंचोली

सीमान्त जनपद उत्तरकाशी में बहने वाली यमुना नदी में सैकड़ो छोटी-छोटी जल धारायें संगम बनाती है। इनमें से एक जलधारा यमुना नदी की दायीं ओर कुड़ गांव से निकलती है। जहां से यह जलधारा निकलती है वहां इस जलधारे को ‘‘भूत राजा का पन्यारा’’ कहते हैं। अर्थात राज्य के अन्य जलधारों के जैसे इस जलस्रोत का नाम देवताओं से नही बल्कि भूत के नाम से प्रचलित किया गया है। जो पहली बार इस जलस्रोत का नाम सुनेगा, वह एक बारगी जल आचमन करने से पहले चिन्ता में पड़ जायेगा। हालांकि इस जलस्रोत से कुड़ गांव के अनुसूचित जाति के लोगो की जीवन रेखा चलती है। वे इस पानी का भरपूर उपयोग करते हैं। बस उन्हे गम है तो इस जलस्रोत के नामाकरण से। कहते हैं कि उनके आस-पास सभी जलस्रोतो का नाम देवी-देवताओं से जुड़ा है परन्तु उनके जलस्रोत का नाम ‘‘भूतराजा का पन्यारा’’ क्यों हो गया? जो भी हो इस बहाने लोग जल संरक्षण के काम से जुड़े तो हैं।

गौरतलब हो कि उत्तराखण्ड राज्य में जितने भी जलस्रोत हैं उनका नामाकरण, संरक्षण व दोहन किसी न किसी देवी-देवता के नाम लिए बिना नहीं हो सकता। अब उत्तरकाशी के ‘‘कुड़ गांव’’ में एक ऐसा जलस्रोत है जिसे ‘‘भूत के नाम’’ से जाना जाता है। कह सकते हैं कि जल संरक्षण की यह प्रवृति भूत के बिना भी अधूरी रही होगी। इसलिए इस गांव की जलधारा भूत से संबोधित होती है। भूत के नाम से वैसे भी आस्तिक लोग डर जाते है। आम तौर पर हिन्दू शास्त्रों में भूत का मतलब ही डरावना होता है। जनाबा! क्या मजाल कि लोग इस जलस्रोत का गलत दोहन कर सकें। यही वजह है कि आज भी गांव में इस जलस्रोत से निकलने वाली धारा से लोगो की जलापूर्ती पूरी होती है। कभी भी यह जलधारा सूखी नहीं है। ग्रामीण कहते हैं कि कई दौर ऐसे आये कि गर्मीयों के मौसम में यमुना का पानी भी कम हो जाता है मगर ‘‘भूतराजा’’ की जलधारा सदाबहार रही।

बता दें कि कुड़ का सीधा अर्थ कुण्ड से है यह गांव कुण्ड जैसे आकार के स्थान पर बसा है। गांव की सरहद पर यह जलधारा आगन्तुको का स्वागत यूं करती है कि पथ-प्रदर्शक गांव में पंहुचते ही इस पानी को ‘‘अंजूली’’ में लेकर अपनी थकान उतारते हैं। पर गांव में पंहुचते ही इस जलधारे का नाम सुनकर एक बार चैंक जाते हैं। खैर, कुड़ गांव के ‘‘भूतराजा’’ नाम के जलस्रोत से निकलने वाली जल धारायें आगे जाकर सैकडों नाली कृषि भूमी को सिंचित करती है। यही नहीं इस पानी से सिंचित खेतो में उपज की मात्रा भी अधिक होती है। इस गांव के सिंचित खेतो में एक अलग प्रकार की स्वादिष्ट धाना की प्रजाति का उत्पादन होता है। जिसका रंग सफेद नहीं मैरूम/लाल होता है। स्थानीय लोग इस धान की प्रजाति को ‘‘लाल चावल’’ कहते है। कुड़ गांव में अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं। कुछ लोगो का मानना है कि जाति भेद को लेकर इस जलस्रोत का नाम भूत रखा होगा। आश्चर्य इस बात का है कि राज्य में अन्य जलस्रोतो का नाम देवताओं से जोडा गया, अपितु कुड़ गांव में यह अकेला जलस्रोत है जिसे ‘‘भूत के नाम’’ से प्रचारित किया गया।

लोक मतानुसार कालातीत में इस स्थान पर भूतों का वास था, बताते हैं कि बसासत से पहले भी यह जलस्रोत विद्यमान था। मौजूदा समय में इस जलस्रोत के पास एक पत्थर की आकृति है। जिस आकृति पर एक हाथ में डमरू, एक में त्रिशूल, एक में चक्र व एक में शंख रेखांकित किया हुआ है। भले यह मूर्ति छोटी जरूर है परन्तु इसकी बनावट ही अति-आकर्षक है। देखने में यह पत्थर की नक्कासीदार आकृति ‘‘शिवा’’ की लगती है। फिर भी मूर्ती के विपरित इस जलस्रोत का नाम रखा गया है। जबकि यह आकृति भी पाण्डव कालीन बतायी जा रही है। हालांकि वर्तमान में ‘‘कुड़ गांव के भूतराजा के पन्यारे’’ का भी सौदंर्यकरण हो चुका है। लोगो की आस्था आज भी इस जलस्रोत पर पूर्व के जैसी ही बनी हुई है। ग्रामीण इस जलस्रोत की पूजा करते हैं तो इसके पानी को पवित्र भी मानते है। बस उन्हे गम है तो इस जलस्रोत के नाम से।

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