क्या गुल खिलायेगा यू पी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन उत्तराखंड में

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(मनीष वर्मा , स्वतंत्र पत्रकार )

मसूरी ,खटीमा ,देहरादून ,रामपुर तिराहा ,कोटद्वार गोलीकांड और उत्तराखंड राज्य आंदोलन को क्या उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी भूल गए ? क्या मिला चपरासी की नौकरी ? सपा और कांग्रेस के गठबंधन को देख उत्तराखंड की बहनों और माताओं के साथ समाजवादी पार्टी की तत्कालीन उत्तर प्रदेश की सरकार ने जो किया था वो सोच कर मसूरी और खटीमा व् रामपुर तिराहा के शहीद आंदोलन कारियों की आत्माएं धिक्कार ही रही होगी दिल्ली रैली में जा रहे आन्दोलनकारियों का रामपुर तिराहा, मुज़फ़्फ़रनगर में पुलिस-प्रशासन ने जैसा दमन किया, उसका उदारहण किसी भी लोकतान्त्रिक देश तो क्या किसी तानाशाह ने भी आज तक दुनिया में नहीं दिया होगा। निहत्थे आन्दोलनकारियों को रात के अन्धेरे में चारों ओर से घेरकर गोलियाँ बरसाई गईं और पहाड़ की सीधी-सादी महिलाओं के साथ दुष्कर्म तक किया गया। इस गोलीकाण्ड में राज्य के ७ आन्दोलनकारी शहीद हो गए थे। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी परिषद् के करता धर्ता आजतक आंदोलनकारियों को न्याय नहीं दिला पाये?16 साल बाद जब चुनाव आने को हुए तो 3 जून 2016 को 3100 रूपए की पेंशन की घोषणा की यानि 100 रुपये रोज ? मजदूर की दिहाड़ी भी 400 रुपये रोज है जनाब । क्या मजदूर से भी गए गुजरे हैं आंदोलनकारी ? ये वो ही आंदोलनकारी जिनकी कुर्बानी ने ये राज्य बनाया और जिनकी बदौलत आज पूर्व राज्यमंत्रियों की पूर्व मंत्रियो व् विधायको की ,पूर्व मुख्यमंत्रियों की पेंशन तो देखो । अधिकारी गण भी रिटायरमेंट से पहले की कोई आयोग या परिषद् ढूंड लेते है और अपना बुढ़ापे तक इंतज़ाम पेंशन के साथ कर लेते है जिससे की उनके किये कुकर्म पर भी पर्दा पड़ा रहे है और मलाई भी खाते रहे । क्या हो गया इस प्रदेश को ? क्या उस आंदोलन को भूल जाये ? नहीं नहीं कदापि नहीं …..ये समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का उत्तर प्रदेश का गठबंधन उत्तराखंड में कांग्रेस पार्टी को किस ऒर ले जायेगा ? और यहाँ के आंदोलनकारी और यहाँ की जनता समाजवादी पार्टी के गठबंधन को कभी बर्दाशत नहीं करेगी क्या मसूरी के शहीद स्थल जैसी पवित्र मंदिर पर समाजवादी गठबंधन को जनता स्वीकार करेगी ? क्या मसूरी ,खटीमा गोलीकांड परिवार के लोग इसको बर्दाश्त कर पाएंगे ? हमें सोचना होगा की हम एक तरफ तो तत्कालीन समाजवादी पार्टी का उत्तराखंड में विरोध करते आये है और आज उत्तर प्रदेश में उसी समाजवादी पार्टी की गोद में बैठकर उत्तराखंड राज्य के आंदोलनकारियों के सपनो और उनकी आत्माओं को कष्ट दे दे ? नहीं नहीं मेरी आत्मा मुझे झकझोर रही है …इन राजनेताओं के चाल चलन और सोच पर शक हो रहा है यदि आप सब बुद्धिजीवी और उत्तराखंडियों का खून ठंडा हो गया है तो आपको याद दिलाने के लिए आपको स्मरण कराता हूं कि आज जो आपके भृष्ट नेता और भृष्ट अधिकारी इस प्रदेश को गिरवी रख कर चुके है और सारा माल हजम कर चुके हैं वो उत्तराखंड प्रदेश निम्न शहीदों की चिता पर बना है और यहाँ के नेता दिल्ली बैठे आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं जिनका अपना दिमाग तो रसातल में चला गया है और सोच खत्म हो चुकी है ये शहीद और घटनाएं निम्न हैं :-

खटीमा गोलीकाण्ड

१ सितम्बर, १९९४ को उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का काला दिवस माना जाता है, क्योंकि इस दिन जैसी पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही इससे पहले कहीं और देखने को नहीं मिली थी। पुलिस द्वारा बिना चेतावनी दिए ही आन्दोलनकारियों के ऊपर अंधाधुंध फ़ायरिंग की गई, जिसके परिणामस्वरुप सात आन्दोलनकारियों की मृत्यु हो गई। खटीमा गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद :-

अमर शहीद स्व० भगवान सिंह सिरौला, ग्राम श्रीपुर बिछुवा, खटीमा
अमर शहीद स्व० प्रताप सिंह, खटीमा
अमर शहीद स्व० सलीम अहमद, खटीमा
अमर शहीद स्व० गोपीचन्द, ग्राम रतनपुर फुलैया, खटीमा
अमर शहीद स्व० धर्मानन्द भट्ट, ग्राम अमरकलाँ, खटीमा
अमर शहीद स्व० परमजीत सिंह, राजीवनगर, खटीमा
अमर शहीद स्व० रामपाल, बरेली
इस पुलिस फायरिंग में बिचपुरी निवासी श्री बहादुर सिंह और श्रीपुर बिछुवा निवासी श्री पूरन चन्द भी गम्भीर रुप से घायल हुए थे।
२ सितम्बर, १९९४ को खटीमा गोलीकाण्ड के विरोध में मौन जुलूस निकाल रहे लोगों पर एक बार फिर पुलिसिया क़हर टूटा। प्रशासन से बातचीत करने गईं दो सगी बहनों को पुलिस ने झूलाघर स्थित आन्दोलनकारियों के कार्यालय में गोली मार दी। इसका विरोध करने पर पुलिस द्वारा अंधाधुंध फ़ायरिंग कर दी गई, जिसमें लगभग २१ लोगों को गोली लगी और इसमें से चार आन्दोलनकारियों की अस्पताल में मृत्यु हो गई।

मसूरी गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद :-

अमर शहीद स्व० बेलमती चौहान (४८), पत्नी श्री धर्म सिंह चौहान, ग्राम खलोन, पट्टी घाट, अकोदया, टिहरी
अमर शहीद स्व०हंसा धनई (४५), पत्नी श्री भगवान सिंह धनई, ग्राम बंगधार, पट्टी धारमण्डल, टिहरी
अमर शहीद स्व० बलबीर सिंह नेगी (२२), पुत्र श्री भगवान सिंह नेगी, लक्ष्मी मिष्ठान्न भण्डार, लाइब्रेरी, मसूरी
अमर शहीद स्व० धनपत सिंह (५०), ग्राम गंगवाड़ा, पट्टी गंगवाड़स्यूँ, टिहरी
अमर शहीद स्व० मदन मोहन ममगाईं (४५), ग्राम नागजली, पट्टी कुलड़ी, मसूरी
अमर शहीद स्व० राय सिंह बंगारी (५४), ग्राम तोडेरा, पट्टी पूर्वी भरदार, टिहरी
रामपुर तिराहा (मुज़फ़्फ़रनगर) गोलीकाण्ड
: रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड
२ अक्टूबर, १९९४ की रात्रि को दिल्ली रैली में जा रहे आन्दोलनकारियों का रामपुर तिराहा, मुज़फ़्फ़रनगर में पुलिस-प्रशासन ने जैसा दमन किया, उसका उदारहण किसी भी लोकतान्त्रिक देश तो क्या किसी तानाशाह ने भी आज तक दुनिया में नहीं दिया होगा। निहत्थे आन्दोलनकारियों को रात के अन्धेरे में चारों ओर से घेरकर गोलियाँ बरसाई गईं और पहाड़ की सीधी-सादी महिलाओं के साथ दुष्कर्म तक किया गया। इस गोलीकाण्ड में राज्य के ७ आन्दोलनकारी शहीद हो गए थे।

रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड में मारे गए शहीदः

अमर शहीद स्व० सूर्यप्रकाश थपलियाल (२०), पुत्र श्री चिन्तामणि थपलियाल, चौदह बीघा, मुनि की रेती, ऋषिकेश
अमर शहीद स्व० राजेश लखेड़ा (२४), पुत्र श्री दर्शन सिंह लखेड़ा, अजबपुर कलाँ, देहरादून
अमर शहीद स्व० रवीन्द्र सिंह रावत (२२), पुत्र श्री कुन्दन सिंह रावत, बी-२०, नेहरू कॉलोनी, देहरादून।
अमर शहीद स्व० राजेश नेगी (२०), पुत्र श्री महावीर सिंह नेगी, भानियावाला, देहरादून।
अमर शहीद स्व० सतेन्द्र चौहान (१६), पुत्र श्री जोध सिंह चौहान, ग्राम हरिपुर, सेलाक़ुईं, देहरादून।
अमर शहीद स्व० गिरीश भद्री (२१), पुत्र श्री वाचस्पति भद्री, अजबपुर ख़ुर्द, देहरादून।
अमर शहीद स्व० अशोक कुमार कैशिव, पुत्र श्री शिव प्रसाद कैशिव, मन्दिर मार्ग, ऊखीमठ, रुद्रप्रयाग।

देहरादून गोली कांड

३ अक्टूबर, १९९४ को रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड की सूचना देहरादून में पहुँचते ही लोगों का उग्र होना स्वाभाविक था। इसी बीच इस काण्ड में शहीद स्व० श्री रवीन्द्र सिंह रावत की शवयात्रा पर पुलिस के लाठीचार्ज के बाद स्थिति और उग्र हो गई और लोगों ने पूरे देहरादून में इसके विरोध में प्रदर्शन किया, जिसमें पहले से ही जनाक्रोश को किसी भी हालत में दबाने के लिये तैयार पुलिस ने फ़ायरिंग कर दी, जिसने तीन और लोगों को इस आन्दोलन में शहीद कर दिया।

देहरादून गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद:

अमर शहीद स्व० बलवन्त सिंह सजवाण (४५), पुत्र श्री भगवान सिंह सजवाण ग्राम मल्हाण, नयागाँव, देहरादून
अमर शहीद स्व० दीपक वालिया (२७), पुत्र श्री ओम प्रकाश वालिया, ग्राम बद्रीपुर, देहरादून
अमर शहीद स्व० राजेश रावत (१९), पुत्र श्रीमती आनन्दी देवी, २७-चंद्र रोड, नई बस्ती, देहरादून
स्व० राजेश रावत की मृत्यु तत्कालीन समाजवादी पार्टी नेता सूर्यकान्त धस्माना के घर से हुई फ़ायरिंग में हुई थी। जो अब कैंट विधान सभा से कांग्रेस प्रत्याशी हैं

कोटद्वार काण्ड

३ अक्टूबर १९९४ को पूरा उत्तराखण्ड रामपुर तिराहा काण्ड के विरोध में उबला हुआ था और पुलिस-प्रशासन किसी भी प्रकार से इसके दमन के लिये तैयार था। इसी कड़ी में कोटद्वार में भी आन्दोलन हुआ, जिसमें दो आन्दोलनकारियों को पुलिसकर्मियों द्वारा राइफ़ल के बटों व डण्डों से पीट-पीटकर मार डाला गया

कोटद्वार काण्ड में मारे गए शहीद:

अमर शहीद स्व० राकेश देवरानी
अमर शहीद स्व० पृथ्वी सिंह बिष्ट, मानपुर ख़ुर्द, कोटद्वार

नैनीताल गोलीकाण्ड

नैनीताल में भी विरोध चरम पर था, लेकिन इसका नेतृत्व बुद्धिजीवियों के हाथ में होने के कारण पुलिस कुछ कर नहीं पाई, लेकिन इसकी भड़ास उन्होंने निकाली होटल प्रशान्त में काम करने वाले प्रताप सिंह के ऊपर। आर०ए०एफ० के सिपाहियों ने इन्हें होटल से खींचा और जब ये बचने के लिये होटल मेघदूत की तरफ़ भागे, तो इनकी गर्दन में गोली मारकर हत्या कर दी गई।

नैनीताल गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद:

अमर शहीद स्व० प्रताप सिंह
श्रीयन्त्र टापू (श्रीनगर) काण्ड संपादित करें
श्रीनगर शहर से २ कि०मी० दूर स्थित श्रीयन्त्र टापू पर आन्दोलनकारियों ने ७ नवम्बर, १९९४ से इन सभी दमनकारी घटनाओं के विरोध और पृथक उत्तराखण्ड राज्य हेतु आमरण अनशन आरम्भ किया। १० नवम्बर, १९९४ को पुलिस ने इस टापू में पहुँचकर अपना क़हर बरपाया, जिसमें कई लोगों को गम्भीर चोटें भी आई, इसी क्रम में पुलिस ने दो युवकों को राइफ़लों के बट और लाठी-डण्डों से मारकर अलकनन्दा नदी में फेंक दिया और उनके ऊपर पत्थरों की बरसात कर दी, जिससे इन दोनों की मृत्यु हो गई।

श्रीयन्त्र टापू में मारे गए शहीद:

अमर शहीद स्व० राजेश रावत
अमर शहीद स्व० यशोधर बेंजवाल
इन दोनों शहीदों के शव १४ नवम्बर, १९९४ को बागवान के समीप अलकनन्दा नदी में तैरते हुए पाए गए थे।
साथियो बात टिकट मिलने या न मिलने की नहीं बात है आवेदन करना तो सबका अधिकार है पर ये लड़ाई है सही सोच की , सही विचारों की , ये लड़ाई है दूरदर्शिता की ,ये लड़ाई है भृष्ट से , ये लड़ाई से उस बात से की 16 साल कम नहीं होते की आज भी लोग धक्के खा रहे हैं पर वो सपने का उत्तराखंड कही नहीं दिखता जिसे सोच और सींच कर उस आंदोलन की परिकल्पना की गयी थी आज वो आका बने बैठे हैं जिन्हीने कहा था कि मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा । आज वो आका बने बैठे हैं जो दिल्ली गए उत्तराखंड आंदोलनकारियों के खिलाफ थे रात 2 बजे उनके पास जाकर उनको कंबल पानी देने के बजाये गिन रहे थे की इनका क्या होने वाला है ? इनको वापस कैसे भेजे ?बरहाल कम लिखे को अधिक समझे अब लोकतंत्र का बड़ा उत्सव आ गया है ऐसे में क्या निर्णय लेना है आपको सोचना है

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