राजनीतिक रूप से पूरी तरह हाशिए पर चला जाएगा पहाड़ -पढ़िए विशेष रिपोर्ट

 

2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हुआ तो पहाड़ से कम से कम सात विधानसभा सीटें कम हो जाएँगी। इसके बाद पहाड़ में सिर्फ़ 27 सीटें ही रह जाएँगी और मैदान में 43 सीटें हो जाएँगी। इस तरह पहाड़ राजनीतिक रूप से पूरी तरह हाशिए पर चला जाएगा

 

 

पहाड़ के सामने  आज भी  पहाड़  जैसी चुनौतियां हैं उत्तराखंड  राज्य  बने 17साल  हो चुके  हैं  लेकिन  राजधानी के नाम पर अभी  भी  रसा-कस्सी  जारी है योजना आयोग के आंकड़े के अनुसार आज भी  पहाड़  मैं  विकाश के आंकड़े चौंकाने वाले  हैं ,योजना आयोग की  रिपोर्ट  के अनुसार राज्य  का पहाड़ी  हिस्सा आज भी  विकाश  से अछुता  है ?पहाड़  मैं  विकाश  न  होने  के कारण लोग  पहाड़  से मैदान  की  तरफ  भाग  रहे  हैं  जिसका मुख्य कारण है  की  विकाश  न  होना ?लोग सुख -सुविधाओं के लिए  मैदानों  का रुख कर  रहे  हैं ?पहाड़  की  राजधानी  पहाड़  मैं  होना  अनिवार्य  है ?तव  ही  पलायन  रुक  पायेगा ?योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तराखंड के 58 प्रतिशत गाँवों में अभी तक सड़क नहीं पहुँची है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि पहाड़ी क्षेत्र में सिर्फ़ 18 प्रतिशत ज़मीन पर ही सिंचाई के साधन हैं। जबकि मैदान में 95 प्रतिशत ज़मीन सिंचित है।

मैदानी क्षेत्र के हरिद्वार, देहरादून, उधमसिंहनगर ज़िले में जनसंख्या घनत्व लगातार बढ़ता ही जा रहा है। हरिद्वार में प्रति किमी 817 लोग रह रहे हैं। जबकि उत्तरकाशी में प्रति किमी 41 और चमोली में 49 लोग रह रहे हैं। इस तरह मैदान सत्ता का केंद्र बनता जा रहा है और पहाड़ इस होड़ में पीछे छूटता जा रहा है। पलायन के चलते पहाड़ की राजनीतिक ताक़त कमज़ोर होती जा रही है।

2011 की जनगणना के मुताबिक़ उत्तराखंड के 16,793 गाँवों में से 1053 गाँव में अब एक भी आदमी नहीं है। जबकि 400 गाँवों की आबादी दस से भी कम रह गई है। यह तो 2011 की जनगणना के आँकड़े हैं। हालिया स्थिति यह है कि अब उत्तराखंड के क़रीब तीन हज़ार गाँव ख़ाली हो गई है। जबकि एक हज़ार गाँव ऐसे हैं, जहाँ अब गिने-चुने बुज़ुर्ग रह गए हैं। स्थिति यह हो गई है कि 88 फ़ीसदी पहाड़ में 47 फ़ीसदी लोग रहते हैं। जबकि 12 फ़ीसदी मैदान में 53 फ़ीसदी आबादी रहती है।

पहले पहाड़ में 40 विधानसभा सीटें थी। 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन के बाद पहाड़ से छह सीटें कम हो गई और अब पहाड़ में 34 विधानसभा सीटें रह गई हैं। जबकि परिसीमन के बाद मैदान में 30 सीट से बढ़कर 36 हो गई हैं। अब 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हुआ तो पहाड़ से कम से कम सात विधानसभा सीटें कम हो जाएँगी। इसके बाद पहाड़ में सिर्फ़ 27 सीटें ही रह जाएँगी और मैदान में 43 सीटें हो जाएँगी। इस तरह पहाड़ राजनीतिक रूप से पूरी तरह हाशिए पर चला जाएगा और उत्तर-प्रदेश से अलग हुए पहाड़ी राज्य की अवधारणा भी ख़त्म हो जाएगी।

आजकल लोग  राजधानी  को लेकर सड़कों  पर  हैं पूरा  पहाड़  राजधानी गैरसैण बनाने के पक्ष  मैं है लेकिन  राजनीतिक दल चुपी साधे  हुए  हैं ?गैरसैण जन भावनाओं  की  राजधानी  है ,और  लोग चाहते  हैं गैरसैण राजधानी बने !
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