नैंणी देवी की जात यात्रा अर्थात् दैविक, दैहिक और भौतिक संतापों से मुक्ति की तांत्रिक प्रक्रिया

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(शिव प्रसाद सती/हरीश मैखुरी)

उत्तराखंड को देवभूमि इसलिए कहा जाता है कि यहां आज भी देवी-देवताओं का वास है, लोग पूरी श्रद्धा से मानते भी हैं। देवी-देवताओं की विशेष रुप से जात यात्राएं भी आयोजित की जाती हैं जिसे बन्यात अर्थात् जात, यात्रा, देवरा एवं सरकुड़ा अनेक नामों से जानी जाती है, बन्यात शब्द का तात्पर्य देवी-देवताओं की उस जात यात्रा से है जो किसी गांव अथवा क्षेत्र विशेष के संताप एवं दुख-दारिद्रय व कष्टों के निवारणार्थ एक विशेष किस्म की तांत्रिक यात्रा है जिसमें गांव के चारों तरफ विशेष पूजा सामग्रियों द्वारा कील बंधन (क्योर) डाल दी जाती है ये कील बंधन करने वाले सात, नौ अथवा ग्यारह लोग होते हैं जो उस दिन सुबह पूरे व्रत, निहार व बिना जल पिए नंगे पांव चलकर यह प्रक्रिया संपन्न करते हैं।

बन्यात अथवा जात यात्रा समस्त ग्रामीण जनों की मनोती के अनुरुप इसके गणवे और ज्योतिषी द्वारा निर्धारित मुहूर्त से शुरु होकर छह माह के क्षेत्र भ्रमण के पश्चात देवी भागवत् के साथ विशिष्ट मुहूर्त पर संपन्न होती है इसी क्रम में इन दिनों चमोली जिले की नारायणबगड़ विकासखण्ड में रैंस गांव की नैंणी देवी की जात यात्रा दिशा भ्रमण हेतु निकाली गई है।

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नैंणी- नैंणी का तात्पर्य है अतीव दर्शनीय नयनवाली अर्थात् नैंणी देवी के नेत्रों की पूजा का विशेष महात्मय है। हमारे यहां शास्त्र सम्मत् विधि से अलग-अलग कष्टों और अभिष्टों के लिए देवी के अलग-अलग नामरुपों की पूजा की जाती है नैंणी देवी को कल्याण शोभना अर्थात् प्राणों की रक्षा करने वाली देवी के रुप में भी पूजा जाता है।

किम्वंदती है कि द्वापर युग के समय भृगु ऋषि नागलोक से नौ कन्याओं को लेकर आ रहे थे, जब वह चमोली जिले के कोब गांव के अंदर थान नामक स्थान पर पहुंचे तो वहां पर एक बड़े पत्थर पर भृगु ऋषि ने नौ कन्याओं को आराम करने के लिए बैठा दिया, ज्यों ही भृगु ऋषि का ध्यान दूसरी तरफ हुआ इसी मध्य एक गडरिया(बकरी चराने वाला) आया, गडरिए के नौ पुत्र थे गडरिया सोचने लगा कि नौ पुत्रों के लिए एक साथ ही नौ कन्याए मिल गईं, और गडरिए ने अपना दोखा (मोटे ऊन का बुना हुआ वस्त्र) उन नौ कन्याओं पर डाल दिया तत्क्क्षण कन्याओं ने नागिन का रुप धारण कर लिया और अपनी-अपनी दिशा की ओर चल दीं और इसी प्रकार ये नौ कन्याए चमोली जिले के अलग-अलग गांव में चली गईं। तभी से इस क्षेत्र के गांवों में विशेष रुप से कण्डारा, रैंस, सणकोट, भटियाणा, डुंगरी, कोब, बनियाला, घनियाल, रतूड़ा गांवों में कौथीग होने लगा। परंतु आज भी जिस चैक में दोखा रखा होता है उस चैक में नैंणी प्रवेश नहीं करती है।

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नैंणी की जात यात्रा हर बीस साल बाद आयोजित की जाती है इसमें देवी को मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकालकर तीन महीने तक अपने मायके में रहती हैं तथा तीन महीने बाद धियाणों के द्वार जाती हैं और तीन महीने का जात्रा कौथीग होता है इसमें देवी के पुजारी, गणवें (तंत्र पूजा वाला व्यक्ति) जो तंत्र-मंत्र द्वारा डोली को चलाते हैं, डोली जड़ीबूटियों द्वारा बंधित होती है, गणवे अपनी शक्तियों द्वारा डोली को चलाते हैं। इस जात्रा में ऐरवाल (स्वांग रचने वाले) और चिनवाल भी होते हैं, लोक परंरपरा के आधार पर नैंणी देवी का उत्सव बड़े धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। नवमी की रात को विशेष मुर्हत पर नैंणी का ब्रहम बांधा जाता है, जो कल सुबह साढ़े चार बजे ब्रहम बांधा गया, इस अवसर पर क्षेत्र के लोग अपने सभी रिश्तेदारों और घ्याण बेटियों को बुलाते हैं, यह पर्व लगभग 190 दिन तक चलता है।

ऐरवाल- ये दो या चार की संख्या में व्यक्ति होते हैं जो पूरी यात्रा के दौरान अपनी विशिष्ट वेशभूषा और भाव-भंगिमाओं के द्वारा लोगों का मनोंरंजन करते हैं और भीड़ के आर्कषण का केंद्र बनते हैं लोग इनकों स्थानीय उत्पाद-चूडे़, बुझले, मिष्ठान व धन-धान्य देकर तृप्त करते हैं।

क्योर- क्योर शब्द सुनने में शायद आपको जरा अजीब सा लग रहा होगा लेकिन पहाड़ के अन्तर्गत गांव में जब कोई भी कार्यक्रम अथवा उत्सव होता है तो गांव का पंडित गांव की चारों सीमाओं को अपने तंत्र-मंत्र की विद्या से कील बंधन कर दिया जाता है, ऐसा इसलिए किया जाता है कि गांव के लोगों पर कोई बिमारी अथवा कोई छलछाया व विपत्ति न आए। आज भी जब नैंणी का कौथीग होता है तो गणवे अपने पूरे क्षेत्र में क्योर यानि कील बंधन करता है जिसे आज भी दैविक, दैहिक और भौतिक संतापों का प्रवेश इस क्षेत्र के अन्तर्गत इस तांत्रिक पद्धति द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है।

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ब्रहम ठांग- यह देवी का दिशा-सूचक यंत्र होता है जिसे बांस के लट्ठे पर विशेष तांत्रिक पद्धतियों व पराभौतिक जड़ी-बूटियों के माध्यम से स्वाचालित किया जाता है, इस ब्रहम ठांग को विशेष व्रत वाले लोग ही पकड़कर ले जाते हैं यह एक तरह का अनुष्ठान है जो ब्रहम ठांग स्थापित होने के बाद बहुत सारी काल गणनाएं , लोगों की शंकाएं और उनका समाधान तत्क्क्षण प्रस्तुत करता है, इसलिए इसकी जात यात्रा में विशेष महत्ता है।

जगनी पुरुष- जगनी पुरुष को हम यज्ञ पुरुष भी कहते हैं यज्ञ एवं हवन की समस्त विधाएं एवं अनुष्ठान यज्ञ कुंड व यज्ञ पुरुष की स्थापना के बाद ही प्रारंभ होते हैं इस यज्ञ पुरुष को विशेष रुप से मिट्टी व विशेष घास के माध्यम से तैयार कर यज्ञ कुंड के समीपस्थ स्थापित किया जाता है। समस्त यज्ञ कर्म एवं होम आहुतियां इसी यज्ञ पुरुष के नाम से दी जाती हैं, यज्ञ कुंड के एक ओर यज्ञ पुरुष तथा दूसरी ओर योनि स्थापित की जाती है जिसमें संपूर्ण यज्ञ के दौरान घी की आहुतियां प्रवाहित की जाती हैं, इस यज्ञ कर्म से समस्त क्षेत्र की दुख-बाधाएं यज्ञ कुंड में आहुतियों के साथ जलकर समाप्त हो जाती हैं एवं सुख-समृद्धि हेतु वातावरण स्थापित हो जाता है।

बालदेव- वटास्य पत्रस्य पुटसयानम्।। बालम् मुकुन्दम् मनुषास्मरमि।। अर्थात जब लय के बाद पहली बार सृष्टि के दर्शन हुए तो जलमय सृष्टि के बीच भगवान बालरुप में प्रथम बार ऐसे दिखे जैसे बड़ के पत्ते में भगवान श्रीमन्नारायण मुंह में उंगली चूसते हुए लेटे हुए हों। बाल भगवान का सबसे अभिनव रुप श्रीकृष्ण का बालरुप माना जाता है विशेषकर जब वह नाग के फन में बंशी बजाते हैं तो सारा नन्दन-कानन सम्मोहित हो जाते हैं। भगवान के बालरुप की पूजा बालभोग लगाने के लिए तांत्रिक पद्धति के अनुसार बन्यात में की जाती है जिसे बालद्यो कहते हैं। बिना बालभोग के कोई भी पूजा संपन्न नहीं की जाती बालद्यो को बुर्जग पंडित सदैव अपनी देखरेख में रखते हैं क्योंकि बाल भगवान का रुप अत्यंत नाजुक माना जाता है।

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