दम तोड़ने की कगार पर, गोपेश्वर का एकमात्र जड़ी-बूटी शोध संस्थान

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सरकार पहाड़ चढ़ना चाहती नहीं और सिर्फ पहाड़ के वोटरों पर राजनीति करना चाहती है। उत्तराखंड में एकमात्र जड़ी-बूटी शोध संस्थान आज दम तोड़ती हुई नजर आ रही है, लेकिन करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद भी पैसों को ठिकाने क्यों लगाया जा रहा है जबकि हर्बल की उत्तराखंड में अपार संभावनाएं हैं।

जनपद चमोली का एकमात्र जड़ी-बूटी शोध संस्थान दम तोड़ने की कगार पर है। हर्बल प्रदेश के नाम पर जो छलावा यहां पर हो रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है जनपद चमोली के अन्तर्गत मण्डल पर करोड़ों रुपए खर्च कर जड़ी-बूटी शोध संस्थान बनाया गया था लेकिन गलत नीतियों के कारण यह दम तोड़ता हुआ नजर आ रहा है, जबकि उत्तराखंड में हर्बल व जड़ी-बूटियों की अपार संभावनाएं हैं। जनपद चमोली के अन्तर्गत यह शोध संस्थान अपनी अंतिम सांसे गिन रहा, खत्म होने की कगार पर।

घोषणाओं का लाॅलीपाॅप बना उत्तराखंड सिर्फ फाइल और कागजों तक ही सीमित है। पिछले 15 सालों में शासन में बैठे लोग और नीति नियंता यह तय नहीं कर पाए कि राज्य को किस ओर ले जाना है पिछले डेढ़ दशक में हिमालयी राज्य उत्तराखंड के पर्वतीय भू-भाग पर जड़ी-बूटी की अपार संभावनाओं को देखते हुए गोपेश्वर मण्डल में जड़ी-बूटी शोध संस्थान खोला गया था लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई भी नहीं।
एक तरफ राज्य सरकार जहां प्रदेश में जड़ी-बूटियों की खोज के लिये संजीवनी प्राधिकरण बनाने की बात कह रही है, वहीं राज्य का एकमात्र जड़ी-बूटी शोध संस्थान शासन की लापरवाही और देहरादून में रहने के मोह के चलते धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।

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आज स्थिति कुछ ऐसी है कि बिना स्थाई डायरेक्टर के चलने वाले इस संस्थान में महज संविदा के कुछ कर्मचारियों के साथ-साथ चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी इस संस्थान को चला रहे हैं। वहीं आज तक इस संस्थान में स्थाई वैज्ञानिक को तैनात तक नहीं किया गया है जो संस्थान की दशा बताने के लिये काफी है। यह जड़ी-बूटी शोध संस्थान चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर से 12 किमी दूर मंडल में स्थित है। यह राज्य का एकमात्र जड़ी-बूटी शोध संस्थान जो यहां पहाड में होने वाली जड़ी-बूटियों के दोहन के साथ ही रोजगार परक बनाने के लिये खोला गया था वह उपेक्षित है।

अधिकारी देहरादून में रहने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब इस क्षेत्र में संस्थान खोला गया तो सरकार ने ग्रामीणों की सैकडों नाली जमीन इस शर्त के साथ ली गई थी कि यहां स्थानीय लोगों को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार दिया जायेगा. आज हालत यह है कि न ग्रामीणों के पास जमीन रही और न ही रोजगार मिल पाया। कईं बार इसको लेकर आंदोलन भी किये गये लेकिन हर बार सरकार की तरफ से आश्वासन मिला मगर संस्थान की स्थिति आज तक नहीं सुधर पाई है।

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