लोकायुक्त पर राजभवन की सरकार को फटकार

 

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लोकायुक्त पर फिर उत्तराखंड मैं रस्साकसी जारी हो गयी है बीजेपी और कांग्रेस दोनों राज्य मैं लोकायुक्त को लेकर गंभीर नहीं हैं , चुनाव के समय फिर लोकायुक्त का जिन्न बाहर निकल आया है और इस पर राजनीति शुरु हो गयी है, हरीश रावत कह रहे है मजबूत लोकायुक्त उत्तराखंड को मिलेगा लेकिन यह कब मिलेगा इसका कोई पता नहीं है ,उत्तराखंड मैं लोकायुक्त को लेकर दोनों दल गंभीर नहीं हैं आखिर बिल्ली क्यों चाहेगी ढूध की रखवाली करे, हफ्ते भर के भीतर ही राजभवन ने सरकार को दूसरा बड़ा झटका दे दिया। गत सोमवार को राज्यपाल डॉ. केके पॉल ने सरकार के लोकायुक्त पैनल को नियमविरूद्ध करार देते हुए खारिज कर दिया।

राज्यपाल ने सरकार को नए सिरे से पैनल बनाने को कहा है। अभी चार दिन पहले ही राजभवन ने दो निजी विश्वविद्यालयों के विधेयकों को मंजूरी दिए बिना ही सरकार को वापस लौटाया है। लोकायुक्त चयन पर सरकार के रुख से राजभवन शुरू से ही खुश नहीं है। सरकार के पैनल भेजने के कुछ दिन बाद ही राजभवन ने शासन से लोकायुक्त के लिए आवेदन करने वाले सभी लोगों के बायोडाटा तलब कर लिए थे। सरकार के पैनल और सभी 127 आवेदनों की गहन समीक्षा के बाद राजभवन ने पाया कि सर्च कमेटी और चयन कमेटी ने पैनल बनाने में कई स्तर पर नियमों की अनदेखी की है। राजभवन को भेजे गए पैनल के चयन में भी पारदर्शिता का अभाव है।

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सरकार द्वारा भेजे गए इन पैनलों में से राज्यपाल को एक मुख्य लोकायुक्त और चार लोकायुक्तों के चयन को मंजूरी देनी थी। चयन समिति के सदस्य और नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने भी मुख्य लोकायुक्त समेत दो लोकायुक्तों के पैनल में चयन पर गहरी आपत्ति दर्ज की थी। उनका आरोप था कि लोकायुक्त संगठन एक निष्पक्ष न्याय देने वाली संस्था है। यदि इसके पैनल में ऐसे लोगों को शामिल कर लिया गया जिनकी कार्यप्रणाली और आचरण पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर टिप्पणी कर चुका है तो उससे न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है। सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल ने नियमों की अनदेखी के साथ ही नेता प्रतिपक्ष की आपत्ति को देखते हुए लोकायुक्त संगठन के चयन को मंजूरी की फाइल लौटाकर दोबारा से सर्च कमेटी और चयन समिति के जरिए लोकायुक्त संगठन का गठन करने के निर्देश दिए हैं।

इसलिए खफा हुआ राजभवन
1. सर्च कमेटी को योग्य व्यक्ति के चयन के लिए मानक तैयार करने थे। तय करना था कि किस योग्यता के कितने अंक दिए जाने हैं पर इसमें लापरवाही की गई।
2. लोकायुक्त पद के लिए उसी व्यक्ति का चयन किया जा सकता है जो पूर्व में किसी सरकारी पद पर न रहा हो। पर जिन जेसीएस रावत का नाम सरकार ने सुझाया था, वो यूपी में सर्विस ट्रिब्यूनल में रह चुके हैं। चयन समिति की इस लापरवाही में राजभवन पारदर्शिता का साफ अभाव दिखा है।

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सरकार को राजभवन का कड़ा संदेश
निजी विश्वविद्यालय और लोकायुक्त पैनल पर सख्त रुख अख्तियार कर राजभवन ने सरकार को कड़ा संदेश दिया। राजभवन ने साफ कर दिया है कि सरकार की हर बात पर वो आंख मूंद कर विश्वास करने वाला नहीं है। सरकार की जो बात नियमानुसार होगी, केवल उसी का माना जाएगा।
यह पहला मौका नहीं है जब राजभवन ने सरकार को उसकी गलतियों पर बाखूबी आईना दिखाया है। लोकायुक्त से चंद दिन पहले ही राजभवन ने दो निजी विश्वविद्यालय के विधेयक भी उल्टे पांव लौटाए हैं। इन विधेयक में सरकार दोनों निजी विवि को अतिदरियादिली से असीमित अधिकार देने जा रही थी। राजभवन ने दोनों विवि को मंजूरी देने से इंकार करते हुए सरकार को संशोधन करने को कहा। मुख्यमंत्री हरीश रावत के ड्रीम प्रोजेक्ट अल्मोड़ा आवासीय विश्वविद्यालय पर राजभवन गहराई से मंथन कर रहा है। पिछले साल भेजे गए राज्य निर्माण आंदोलनकारियो को 10 फीसदी आरक्षण विधेयक पर लाख दबाव के बावजूद राजभवन ने अब तक निर्णय नहीं लिया है। आरक्षण का मामला हाईकोर्ट में होने की वजह से राजभवन अदालत के फैसले का इंतजार कर रहा है।

राजभवन
सर्च और सेलेक्शन कमेटी के मानकों का पालन न करने और यूपी लोक सेवा अधिकरण अधिनियम का उल्लंघन होने के कारण लोकायुक्त की पत्रावली सरकार को वापस लौटाई गई है। नामों के चयन में वांछित, व्यापक और सम्यक प्रयास नहीं पाए गए हैं। साथ ही चयन में पारदर्शिता का अभाव भी है। सरकार को लोकायुक्त एक्ट-2014 के अनुसार नए सिरे से पैनल बनाने को कहा गया है।

हरीश रावत, मुख्यमंत्री
राज्यपाल ने लोकायुक्त संगठन की फाइल लौटा दी है। राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख हैं। लिहाजा राज्य सरकार उनके आदेश के अनुसार दोबारा से सर्च कमेटी और चयन समिति बनाकर पैनल राज्यपाल को भेजा जाएगा।

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