अनुसंधान से अछूते गांव

dataram500उत्तराखण्ड में पंतनगर और भरसार जैसे विश्वविद्यालय होने के बावजूद कृषि अनुसंधानों का लाभ गांवों तक नहीं पहुंच पाया है। कृषि विकास की सरकारी योजनाएं भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही हैं।पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित 100वें किसान मेले में प्रदेश के राज्यपाल डाॅक्टर कृष्ण कांत पाॅल ने कहा कि पर्वतीय कृषि को अधिक उत्पादक एवं लाभकारी बनाने के साथ ही युवाओं को कृषि के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए भी वैज्ञानिकों को आगे आना चाहिए। वैज्ञानिकों को नई-नई तकनीकें एवं नई प्रजातियों के गुणवत्तायुक्त बीज विकसित कर उन्हें पर्वतीय क्षेत्र के किसानों तक पहुंचाना होगा। उन्होंने यह भी आह्नान किया कि अलग-अलग विषयों के वैज्ञानिकों के दल राज्य के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जाकर किसानों से संपर्क करें, उनकी समस्याएं सुनें, समझें, उनसे सुझाव लें और स्थितियों का अध्ययन कर उनके अनुरूप ही शोध एवं प्रसार कार्यों को गति प्रदान करें। आमतौर पर राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करने के तौर पर देखी जाती है। लेकिन डाॅक्टर के.के. पाॅल शुरू से ही जिस तरह के जन उपयोगी सुझाव देते रहे हैं और विकास की दृष्टि से जो सक्रियता दिखाते रहे हैं, वह वाकई काबिले-तारीफ है। लेकिन उन्हें क्या पता कि उत्तराखण्ड में कृषि और उद्यानिकी के नाम पर सिर्फ फर्जीवाड़ा होता रहा है। सरकारी अधिकारी तो इसके लिए हमेशा बदनाम रहे ही हैं, लेकिन मौका मिलने पर वैज्ञानिक भी नहीं चूकते हैं।

वर्ष 2014 में देहरादून के सेलाकुई स्थित हर्बल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (सगंध पौधा केंद्र) के प्रभारी वैज्ञानिक खेती को प्रोत्साहित करने की आड़ में करोड़ों की सब्सिडी का फर्जीवाड़ा करने को लेकर सुर्खियों में रहे। यह फर्जीवाड़ा नेशनल हाॅर्टिकल्चर बोर्ड की योजनाओं के तहत स्टीविया और लेमनग्रास की खेती में किया गया। योजनाओं के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाने का यह एक अकेला उदाहरण नहीं है, बल्कि तमाम ऐसे और भी मामले हैं। पूर्व में केंद्र सरकार ने हिमालयी राज्यों में उद्यानीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘हार्टिकल्चर मिशन फाॅर नाॅर्थ इस्टर्न एंड हिमालय स्टेट्स (एचएमएनईएच) के नाम से जो योजना शुरू की वह उत्तराखण्ड में वर्ष 2003-04 में लागू हुई। वर्ष 2013-14 में दस साल की अवधि में इस योजना की हकीकत हैरान कर देेने वाली रही। योजना के तहत कागजों में प्रदेश को फलदार वृक्षों से आच्छादित कर दिया गया। लेकिन जमीन पर करोड़ों रुपए के उद्यानीकरण के नतीजे नगण्य रहे। काश्तकारों को पाॅली हाउस और ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों की जानकारी मिलनी तो दूर समय पर जरूरी सुविधाएं न मिल पाने के कारण वे बुरी तरह हतोत्साहित हुए।

समस्या सिर्फ योजनाओं में भ्रष्टाचार की नहीं, बल्कि राज्य की अब तक की सरकारों की उदासीनता की भी है। समझ में नहीं आता कि प्रदेश की राजनीतिक सोच अपने संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में क्यों नहीं जाती? राज्य में जिस पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना सन् 1960 में हो चुकी थी उसका फायदा हम आज तक कितना उठा पाए? देश में हरित क्रांति का अग्रदूत माने जाने वाले इस विश्वविद्यालय में हुए कृषि अनुसंधानों से राज्य के काश्तकार कब तक अनभिज्ञ रहेंगे? पर्वतीय क्षेत्रों में जनता को वैज्ञानिक कृषि की जानकारी मिली होती तो क्या वहां के गांव आज वीरान होते? किसानों को बेशक कागजों में उन्नत बीज, उन्नत औजार, कीटनाशक और खाद उपलब्ध करवाए जाते रहे हों, लेकिन सच यही है कि पर्वतीय क्षेत्रों में मिट्टी के परीक्षण की जरूरत तक नहीं समझी गई।

पंतनगर के साथ ही राज्य के पास आज भरसार विश्वविद्यालय भी है। इस विश्वविद्यालय के तहत दस परिसर और 13 एकेडमिक प्रोग्राम संचालित किए जा रहे हैं। इसके साथ ही दो सेंटर आॅफ एक्सीलेंस भी विश्वविद्यालय के पास हैं। लेकिन जनता को इस विश्वविद्यालय का फायदा कहीं मिला होता तो पर्वतीय क्षेत्र के खेत बंजर न पड़े होते। कृषि और पशुपालन कभी जिस पर्वतीय क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है, वहां के युवा आज भी पलायन को विवश नहीं होते। आखिर युवाओं को कृषि अनुसंधानों, तकनीकी और कृषि क्षेत्र में रोजगार की बेहतर संभावनाओं की जानकारी उपलब्ध कराने का दायित्व कौन लेगा? दुनिया के पर्वतीय देशों को छोड़ भी दें तो पड़ोसी हिमाचल राज्य का अनुसरण तो हम कर ही सकते हैं। हिमाचल ने कृषि और फल उत्पादन में खास पहचान बनाई है। हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जब तक वैज्ञानिक अनुसंधानों का लाभ गांवों तक नहीं पहुंचा पाता तब तक कृषि और फल उत्पादन की संभावनाएं क्षीण हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि राजनीतिक सोच इस दिशा में गंभीर होंगी।

Facebook Comments

Random Posts