सही ‘दिशा’ में नहीं उत्तराखंड ‘सरकार’ के कदम

मौजूदा सरकार के सुशासन, भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस और विकास के बड़े बड़े दावों के बीच दो घटनाओं का जिक्र बेहद जरूरी है । पहला, आर्थिक हालात नाजुक होने के बावजूद पहले विधायक निधि में एक करोड़ की बढ़ोतरी और उसके बाद विधायक, मंत्रियों के वेतन में 120 फीसदी का इजाफा यानी नेताओं की बल्ले-बल्ले । दूसरा, तमाम विरोध के बावजूद प्राइवेट मेडिकल कालेजों की फीस तय करने का अधिकार उन्हीं को सौंप देना

 

योगेश  भट्ट

मौजूदा सरकार के सुशासन, भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस और विकास के बड़े बड़े दावों के बीच दो घटनाओं का जिक्र बेहद जरूरी है । पहला, आर्थिक हालात नाजुक होने के बावजूद पहले विधायक निधि में एक करोड़ की बढ़ोतरी और उसके बाद विधायक, मंत्रियों के वेतन में 120 फीसदी का इजाफा यानी नेताओं की बल्ले-बल्ले । दूसरा, तमाम विरोध के बावजूद प्राइवेट मेडिकल कालेजों की फीस तय करने का अधिकार उन्हीं को सौंप देना । फैसला होते ही मेडिकल कालेजों का तत्काल फीस पांच गुना बढ़ा देना और सरकार का इस फैसले पर खुलकर मेडिकल कालेजों का पक्ष लेते हुए छात्रों और अभिभावकों को ‘नसीहत’ पिलाना । इसी के साथ एक और निजी मेडिकल कालेज को हरी झंडी दे देना। ये फैसले सरकार की ‘चाल’ और ‘चरित्र’ बताने के लिये काफी हैं ।इनसे स्पष्ट है कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? इसके बावजूद अगर अपनी गौरव गाथाओं में सरकार खुद को जनता का ‘मसीहा’ बता रही है तो यह सिवाय ‘फरेब’ के कुछ नहीं । बहरहाल बात राज्य की दशा और सरकार की दिशा की है । सनद रहे, प्रदेश की राजनीति का जब इतिहास लिखा जाएगा तो निसंदेह उसमें मौजूदा कालखंड एक अलग अध्याय के रूप में दर्ज होगा जो ‘सरकार की नाकामी’ के लिये नहीं बल्कि ‘जनता की नाकामी’ और ‘सरकार की संवेदनहीनता’ के लिये जाना जाएगा । आज नारा जरूर यह गढ़ दिया गया हो कि ‘देश में नरेंद्र और प्रदेश में त्रिवेंद्र’ सरकार जमकर अपनी ‘गौरवगाथा’ भी लिख और लिखवा रही है, लेकिन सच यह है कि प्रदेश के हालात दिनोंदिन खराब होते जा रहे हैं, सरकार के खिलाफ जनआक्रोश निरंतर बढ़ता जा रहा है । युवाओं से लेकर कर्मचारी, किसान और राजनैतिक कार्यकर्ता, कोई भी सरकार से खुश नहीं । सरकार में अराजकता हावी है, मुद्दों की बात हमेशा की तरह बेमानी है। अखबारों और टीवी चैनलों पर चल रही सरकार की पेड ‘गौरवगाथाएं’ इसका जीता प्रमाण हैं । सच यह है कि प्रदेश के हालात नैनीताल जिले के प्रेम सिंह धोनी की तरह होते जा रहे हैं, हाल ही में जिसने इलाज के लिये आते हुए बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया । राज्य की स्थिति रिखणीखाल की उस बीना देवी की तरह है जो प्रसव पीड़ा से कराहते हुए जंगल में बच्चा जनने को मजबूर हुई, और इलाज के अभाव में बच्चे को जीवित नहीं बचा पायी । यह सही है कि प्रदेश में इस वक्त केंद्र की तरह वन मैन शो है, लेकिन यह भी सही है कि उत्तराखंड की सरकार में कोई दम नहीं। सरकार के बयानों पर न जायें तो, मौजूदा सरकार के साल भर बीतने के बाद यह तो लगभग साफ हो ही चुका है कि इस सरकार का चाल, चेहरा और चरित्र पुरानी सरकारों से बहुत इतर नहीं । यह भी नजर आने लगा है कि सरकार के कदम किस दिशा में हैं । दरअसल अब राज्य में एक नए किस्म का ‘केंद्रीयकृत माफियावाद’ पनपने लगा है। सरकार को सिवाय अपने और अपने आकाओं के किसी की कोई परवाह नहीं । इतिहास हालांकि पुरानी सरकारों का भी कोई खास अच्छा नहीं रहा है, लेकिन इतिहास हालिया सरकार के इस तथ्य को कैसे नकारेगा कि 70 सीटों वाली विधानसभा में जनता ने ऐतिहासिक जनादेश देते हुए, इस कालखंड में एक ही पार्टी के 57 विधायकों को चुनकर भेजा । इन 57 विधायकों की सरकार ने पहली छमाही में सबसे बड़ा फैसला यह लिया कि विधायक निधि एक करोड़ सालाना बढ़ाते हुए 3 करोड़ 75 लाख कर दी । दूसरी छमाही का सबसे बड़ा फैसला भी इन्ही माननीयों के खाते में गया । विधायक और मंत्रियों की तनख्वाह में 120 फीसदी इजाफा कर दिया गया । यह कैसे नजरअंदाज हो सकता है कि विधायक निधि में बढ़ोतरी उस वक्त हुई जब देश भर में विधायक निधि पर सवाल उठ रहे थे, और कई राज्यों में इसे खत्म करने की मांग उठ रही थी। इतिहास लिखा जाएगा तो यही दर्ज होगा कि जनता ने जनमत तो अपने लिये दिया, लेकिन नेताओं ने इसका इस्तेमाल सिर्फ अपने लिये किया और जनता ठगी सी देखती रही । मजबूत सरकार ने प्रदेश और प्रदेश की जनता की जरुरतों को भले ही नजरअंदाज किया हो, लेकिन अपनी जरुरतों पर कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । यह कैसे भुलाया जाएगा कि सरकार कर्ज लेकर घी पीती रही, जिन संसाधनों पर जनता का हक था उन्हें लुटाती रही। विकास के लिए रुपए में पूरे पंद्रह पैसे भी नहीं और दावे विकास और सुशासन के करती रही सरकार । सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि सालाना खर्च में एक रुपए में विकास के हिस्से बामुश्किल सिर्फ 13 पैसे ही दिये जा रहे हैं। यह कैसे नजरअंदाज किया जा सकेगा कि इसी सरकार में वीआईपी तक को प्रदेश में इलाज नसीब नहीं हुआ । खुद उसके एक विधायक की मौत राजधानी के प्राइवेट मेडिकल कालेज में हो गयी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पिता का इलाज भी नहीं हो पाया यहां । प्राइवेट मेडिकल कालेजों के यह हाल होने के बावजूद सरकार की मेहरबानी देखिये कि फीस तय करने का अधिकार भी सरकार ने उन्हीं को सौंप दिया । निजी मेडिकल कालेजों ने भी एक ही झटके में फीस चार लाख से बढ़ाकर 19 लाख कर दी, यह सिर्फ एमबीबीएस की है बाकी दूसरे कोर्सों का भी यही हाल है। प्राइवेट मेडिकल कालेजों पर मेहरबानी का आलम यह कि सरकारी अस्पताल भी उन्हें दे डाले । प्रदेश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में पीपीपी मोड बुरी तरह फेल होने के बावजूद सरकार ने जिला अस्पतालों को पीपीपी पर देने का फैसला किया । पब्लिक राजधानी में जिन प्राइवेट विश्वविद्यालय और निजी मेडिकल कालेजों की बाढ़ से तंग आ चुकी है उन्हीं को बढ़ाने का सिलसिला जारी रखा । निसंदेह प्रदेश के इतिहास में यह कालखंड राज्य में पहली बार मजबूत जनादेश की सरकार के लिये जाना जाएगा, तो वहीं पहली बार ही राजनैतिक स्थिरता के लिये भी पन्नों में दर्ज होगा । लेकिन दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश के लिये नेतृत्व के लिहाज से जिस कालखंड को स्वर्णिम काल के रूप में दर्ज होना चाहिये था, वह मजबूत सरकार के कमजोर नेतृत्व के लिये जाना जाएगा। यह दौर इसके लिये जाना जाएगा कि सियासत में जनता किस तरह ठगी जाती है, कैसे पथभ्रष्ट होते हैं राजनेता । कैसे कमजोर और स्वार्थी राजनेता अपने हितों के लिये प्रदेश के भविष्य से खेलते हैं। कैसे प्रदेश की जनता को हाशिये पर धकेल अपना उल्लू सीधा किया जाता है ।

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