देश में स्वयंसेवक तक सुरक्षित नहीं सरकार कर क्या रही है!

जरा भागवत जी की बात पर भी गौर करें ?बहुत गहरी बात कही है ??”

 

मोहन  भागवत

केंद्र में प्रचारक की सरकार होते हुए देश में स्वयंसेवक तक सुरक्षित नहीं पर समस्या तो यह है की सरकार को करना क्या था और सरकार कर क्या रही है!
अगर देश में हो रही राजनीतिक हत्याओं की श्रृंखला को रोकने की नियत होती तो अपने अधीन संसाधनों का प्रयोग कर केवल एक काण्ड में अपराधियों को पकड़ कर न्याय प्रक्रिया द्वारा कठोर दंड का उदाहरण प्रस्तुत कर उक्त अपराध के प्रति दंड के भय द्वारा समाज में प्रतिरक्षा उत्पन्न की जा सकती थी पर केंद्र की सरकार आज कर क्या रही है ?
अगर अपनी बातें मनवाने के लिए धरना, प्रदर्शन और आंदोलन ही यदि करना था तो भला अपनी सरकार बनाने का क्या मतलब ?
जो स्वयंसेवक समाज और राष्ट्र के लिए अपनी जान तक देने के लिए तैयार रहते हैं उन्हें किसी राजनीतिक दल अथवा नेता के संरक्षण या समर्थन की आवश्यकता नहीं, बल्कि, वर्त्तमान की परिस्थितियों में राजनीतिक दल व् राजनेताओं के अस्तित्व को अपने प्रभाव व् महत्व के लिए स्वयंसेवकों के साथ की आवश्यकता है।
संघ की स्थापना पराधीन भारत में हुई थी , याद दिलाने का तात्पर्य केवल इतना है की संघ अथवा स्वयंसेवकों के लिए सत्ता का पक्ष या सत्ता का सामर्थ उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की राष्ट्रहित को सुनिश्चित करने के प्रयास में वह अपनी भूमिका द्वारा अपने लिए अर्जित करें। ऐसे में, आज जब भारत स्वाधीन है और केंद्र में प्रचारक की सरकार होते हुए भी यदि जो होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा है तो क्या हमें केवल इसलिए शांत बैठ जाना चाहिए क्योंकि सत्ता पक्ष हमारी अनुसांगिक इकाई है ; क्या यह उचित होगा ?
स्वयंसेवकों ने समाज में वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता को महसूस करते हुए ‘अपनी’ सरकार इसलिए नहीं बनाई है ताकि सत्ता का राजनीतिक प्रयोग कर तुस्टीकरण की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास किया जाए।
भारत की जनता ने सत्ता परिवर्तन इसलिए किया था ताकि वर्त्तमान की परिस्थितियों को देखते हुए बेहतर सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के लिए जो करने की आवश्यकता हो वह किया जाए पर जब सत्ता के समर्थ का दुरूपयोग व्यक्तिगत लोकप्रियता के प्रयास में किया जाए और समाज का कल्याण व् राष्ट्र का हित उपेक्षित हो तो क्या नेतृत्व की अयोग्यता से दाल को गलत सिद्ध होने दिया जा सकता है ? व्यक्ति बड़ा या विचारधारा , आखिर सत्ता तो राष्ट्र का पर्याय नहीं हो सकता ?
समस्याओं के प्रति वर्त्तमान के दृष्टिकोण में परिवर्तन से ही यथार्थ में नयी संभावनाओं को जन्म दिया जा सकता है, और इसके लिए, विचारधारा के व्यावहारिक प्रयोग की आवश्यकता होगी ;
व्यवस्था बदलने के लिए सामाजिक जीवन में महत्व की प्राथमिकताओं को बदलना होगा, शाश्कीय नीतियों के सुधार के लिए नेतृत्व की मानसिकता को बदलना होगा और राजनीतिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए समाज के समक्ष नेतृत्व के बेहतर उदाहरण को प्रस्तुत करना होगा ; इसके लिए नेतृत्व परिवर्तन के अलावा कोई और विकल्प नहीं, क्या हम इसके लिए तैयार हैं? अब नहीं तो कब ?”
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