उत्तराखंड की स्वास्थ्य महकमे का स्याह सच जानकर आप हैरान रह जाएगे….

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उत्तराखंड में चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं को भाजपा और कांग्रेस सरकारों ने तवज्जों नहीं दी है। राज्य गठन को सोलह वर्ष हो गए हैं, लेकिन पहाड़ों में डाक्टर व दवाएं आज तक नहीं पहुंच पाई है । दुर्गम पहाड़ों के परिवारों की गिनती तो पांच साल में एक बार महज वोटों के लिए होती है। विधानसभा चुनाव हो चुका है परिणाम आना शेष है, लेकिन चुनाव के दौरान किसी दल अथवा प्रत्याशी ने उत्तराखंड की चिकित्सा स्वास्थ्य व शिक्षा की बात नहीं की। सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में तो किसी तरह जीवन जी लेने का ही संकट है। बीमारी का पता तो तब लगता है जब बचने की उम्मीद ही नहीं रहती। जिला अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाएं खुद बीमार हैं । उत्तराखंड की लाइलाज हो चुकी चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं को बेनकाब करती है ।  ग्रामीण भारत के लिए ग्रामीण स्वास्थ्य सुधार के लिए स्वास्थ्य राष्ट्रीय हैल्थ मिशन कार्यक्रम की यह योजना 12 अप्रैल 2005 में शुरू हुई लेकिन इसका लाभ आमजन तक पहुचने में अभी सदियों की 0दूरी लगती है। इस योजना के लिए जितना पैसा केन्द्र की सरकार से आया है और जो योजनाएं आई भी हैं वे अधिकांश घोटालों की भेंट चढ़ गई । चाहें वह दवाओं का मामला हों , मशीनों की दलाली हो अथवा रख-रखाव से सम्बन्धित कार्य हों सभी किसी न किसी रूप की दलाली में फंस गए हैं । कई जगह पर बजट का आवंटन इस तरह किया गया है कि सही नियोजन के अभाव में मरीजों को इन योजनाओं का लाभ मिलने के बजाय ठेकेदारों का लाभ हो रहा है। जैनरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 80 फीसदी सस्ती होती हैं । किन्तु अधिकांश डाक्टर जो एलोपैथिक दवाएं लिखते हैं वह किसी ब्रांड की होती हैं और जिनको खरीदना मरीज की मजबूरी हो जाती है। हालांकि अस्पतालों में मुफ्त दवा देने का प्रवाधान है लेकिन अधिकांश दवाएं बाहर से ही लिखी जाती हैं। पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं की बतर हलात का एक बड़ा कारण यह है कि डाक्टर पहाड़ पर नहीं जाना चाहते यदि कोई चला जाता है तो उसे फिर सरकार निर्धारित अवधि में नीचे नहीं उतारती। वैसे भी पहाड़ों में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। इसलिए भी डाक्टरों का पहाड़ में जाने का मन नहीं होता । पहाड़ों में अस्पताल की बिल्डिंग खड़ी हैं, लेकिन कंपाउंडर के भरोसे ही पूरे अस्पताल चल रहे हैं । जिन डाक्टरों की पहाड़ों में नियुक्ति है वह कुछ दिन की हाजरी दिखा कर 0मेडिकल की छुट्टी लेकर चले गए । किसी तरह अपना कार्यकाल पूरा करके मैदानी क्षेत्रों में स्थानांतरण करवा लिया है या फिर प्राइवेट प्रैक्टिस में अपना भाग्य अजमाने लगे हैं । उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र में फैले प्राइवेट अस्पताल और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल का जाल इसका प्रमाण है। वास्तव में उत्तराखंड के अधिकांश अस्पतालों में आज भी बेड, दवाइयों व जरूरी सुविधाओं का अभाव है। चुनाव में बेहिसाब धन बहाया गया, लेकिन किसी ने मतदाता के दर्द का अहसास नहीं किया।  राज्य के सरकारी मेडिकल कालजों में पोस्ट ग्रेजुऐट कोर्स के लिए सौ नई सीट मिली हैं। उत्तराखंड में यह प्रावधान है कि सरकारी कालेजों से पास आउट होने के बाद तीन साल पहाड़ में सेवा न करने वाले एमबीबीएस को दो करोड़ और विशेषज्ञ डाक्टर को ढाई करोड़ जुर्माना देना होगा। किन्तु वास्तव में डाक्टरों का अभाव बताता है कि उत्तराखंड के पहाड़ी अस्पतालों में डाक्टरों की संख्या में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। पहाड़ों पर तीन साल की अनिवार्य सेवा देने के बजाय डाक्टर भाग जाते हैं।

राज्य में चिकित्सकों के खाली पद
ऊधमसिंह नगर 118
अल्मोड़ा 179
पिथौरागढ़ 121
नैनीताल 164
चम्पावत 51
बागेश्वर 60
देहरादून 130
रुद्रप्रयाग 57
हरिद्वार 113
पौड़ी 245
टिहरी 159
उत्तरकाशी 91
चमोली 130
उत्तराखंड में राजकीय एलोपैथिक चिकित्सालयों
जिला चिकित्सालय 13
जिला महिला चिकित्सालय 7
बेस चिकित्सालय 3
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 43
एडिशनल पीएचसी 215
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 59
एलोपैथिक चिकित्सालय 321
संयुक्त चिकित्सालय 46
तहसील व जिला प्रसवोत्तर केंद्र 24
हैल्थ पोस्ट 9
क्षय रोग क्लीनिक 18
सरकारी अस्पतालों में बैड 9149
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान 1

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