भाई – बहन के प्रेम की अनूठी मिसाल है “भिटौली”

उत्तराखंड राज्य, अपनी विशिष्ट लोकपरंपराओ, रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है | यहां कई ऐसी परम्पराएं है, जिसे अंचल विशेष के क्षेत्रों में ही मनाया जाता है,ऐसी ही एक परम्परा है,जिसे “भिटौली” कहते हैं | भिटौली को शाब्दिक अर्थों में भेंट करना भी कहा जाता है | चैत्र में वसंत ऋतु के प्रारंभ के साथ ही पहाड की लोकसंस्कृति से जुड़ी इस अद्वितीय परम्परा ” भिटौली” का इंतजार पहाड़ की विवाहिता महिलाएं करती हैं|

 

 


 

 

मयंक मैनाली, रामनगर

उत्तराखंड राज्य, अपनी विशिष्ट लोकपरंपराओ, रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है | यहां कई ऐसी परम्पराएं है, जिसे अंचल विशेष के क्षेत्रों में ही मनाया जाता है,ऐसी ही एक परम्परा है,जिसे “भिटौली” कहते हैं | भिटौली को शाब्दिक अर्थों में भेंट करना भी कहा जाता है | चैत्र में वसंत ऋतु के प्रारंभ के साथ ही पहाड की लोकसंस्कृति से जुड़ी इस अद्वितीय परम्परा ” भिटौली” का इंतजार पहाड़ की विवाहिता महिलाएं करती हैं| मान्यता है कि जब संचार और संपर्क के माध्यम क्षीण हुआ करते थे, तब विवाहित महिला को उसके मायके पक्ष के परिजन भिटौली दिया करते थे|उत्तराखंड के कुमाऊं के पारम्परिक तीज त्यौहारों में भिटौली शामिल है |( मार्च, अप्रैल) फाल्गुन का महीना खत्म होते ही देहरी पूजन का त्यौहार पड़ता है| भाई के घर बहिन देहरी को पूजती है व उनकी लंबी आयु की कामना करती है यह पूरा महीना भिटौली का कहलाता है इस महीने में कभी भी भाई बहिन की रोली अक्षत लगाकर आसन पर बैठाकर पकवान खिलाता है | यह भी मान्यता है कि कुमाऊं मे हर घर मे यह माना गया है,कि हर बहिन को उसके भाई का बुलावा आयेगा भाई बहिन को भिटौली देता है यदि बहिन दूर है तो भाई ससुराल जाता है बहिन भी भाई का रोली अक्षत लगाकर सम्मान करती है तथा कुछ इस तरह आशीष देती है
“जी रये जाग रये यो दिन यो मास
नित नित भेटण रये पढिये लिखिये यो मास
नित नित भेटण रये

पर्वतीय अंचलों में विवाहित महिलाओं को रहता है भिटौली का इंतजार

भिटौली से मायके का प्रेम बहनों को देते हैं भाई

कुमाऊं अंचल मे छोटी बालिकाएं अपनी थाली मे चावल गुड फूल आदि लेकर घर से निकलती है ईष्ट मित्रो के घर उनके देहरी पर डालकर उनके ऐश्वर्य की कामना करती है | इस अवसर पर घर के लोग थाली मे यथाशक्ति चावल गुड़ आदि देकर कन्याओ को विदा करते है| इस संबध मे एक लोककथा प्रचलित है, कि पहाडो पर चैत के महीने एक चिडिया कुई कुई बोलती है इसे घुघुती कहते है भिटौली के साथ ही इसका गहरा संबन्ध है| एक गांव मे देबुली व नरिया दो भाई बहिनो मे अपार प्रेम था एक दिन देबुली की शादी सात नदी सात पहाड दूर एक गांव मे हो जाती है, अपनी शादी और नरिया का बिछोह 14 -15 साल की देबुली को बुरा लगता है बारात विदा होने पर नरिया खूब रोता है तब दुल्हन बनी देबुली कहती है रो मत चैत का महीना नजदीक है तू भिटौली लाना कुछ समय बाद चैत आता है नरिया की ईजा भिटौली तैयार करती है सिर पर भिटौली की टोकरी रख चैत को भटैणा दीदी चैत को भटैणा गुनगुनाते नरिया जाता है उसे जाते जाते चार-पाच दिन लग जाते है सात नदी पार सात पहाड सात पट्टी नरिया शुक्रवार की रात पहुच पाता है तब तक उसकी दीदी सो चुकी होती है नरिया दीदी के पैर छूकर सो जाता है नरिया की नींद अचानक खुल जाती है उसे ध्यान आता है कि आज शनिवार है उसकी ईजा ने कहा था शनिवार का दिन पडे तो देबुली के घर मत जाना यह सोच नरिया अक्षत पिठ्या निकाल कर दीदी के पैर छूकर भिटौली की टोकरी रख बिना देबुली को निकल पडता है वही देबुली सपने मे देखती है कि उसका भाई आया है नीद खुलते ही देबुली को टोकरी देख विश्वास आता है कि सचमुच उसका भाई आया था| वह अपने भाई को ढूढंने जाती है पर नरिया तब तक दूर जा चुका था वह बडे अफसोस से कहती है मेरा भाई आया मै सोती रही धीरे धीरे उसे अंदर ही अंदर दुख हो जाता है, और इसी दुख में उसके प्राण निकल जाते है | कहावत है चैत के महीने मे तब से एक चिडिया की आवाज चारो तरफ गूंजती है | घुघूती भूखो मै सोती
घुघुती चिडिया आज भी चैत मे कूकती है|तब से घुघुती चिडिया बासूती उसका कूकना है| हांलाकि आज के समय में अन्य कई परम्पराओं की तरह “भिटौली” का स्वरूप बदल चुका है |पुराने समय में “भिटौली” के रूप में भाई, पिता अथवा अन्य परिजन पारंपरिक चीजें, भोजन, अथवा खाद्य सामग्री भेंट स्वरूप दिया करते थे|परंतु आज के समय में धन, जेवर, गहने, नए वस्त्र भी प्रचलन में आ गए हैं | वहीं लोकगायकों ने भी अपने लोक गीतों में इस परम्परा को पिरोया है | “न बासा घुघूती चैत की याद ऐं जांछी मिकै मैत की”| वहीं प्रसिद्ध लोकगायक स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी के इस गाने मे भिटोला महीना के बारे मे वर्णन है.

“बाटी लागी बारात चेली ,बैठ डोली मे,
बाबु की लाडली चेली,बैठ डोली में
तेरो बाजू भिटोयी आला, बैठ डोली मे

लेकिन आज समय बीतने के साथ ही इस परंपरा में व्यापक तौर पर बदलाव आ चुका है। इस परम्परा पर भी शहरीकरण ने गहरा प्रभाव छोडा है| वर्तमान समय में यह परम्परा अपना वास्तविक स्वरूप खो चुकी है, अधिकतर स्थानों पर आज यह स्टेटस सिंबल का प्रतीक बन चुकी है | लेकिन आज भी सुदूर ग्रामीण इलाकों विशेषतौर पर पर्वतीय अंचलों में आज भी प्रेमभाव व पारिवारिक सौहार्द के साथ भिटौली का खासा महत्व बना हुआ है |

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