’थींक टेंक’ का सियासीकरण

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देव कृष्ण थपलियाल    

विश्वविद्यालयों की दिनों-दिन गिरती साख को लेकर देशव्यापी चिंन्ता स्वाभाविक है, विश्वविद्यालयों के जिन परिसरों को ज्ञान के आलोक की दरकार थी, उसका नितांत अभाव, सोचनें पर मजबूर कर रहा है। शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा के प्रति सरकार का उदासीन रवैया निःसन्देह हानिकारक है। अगर मनुष्य गढनें का औजार ही उपयुक्त और कारगर न हो तो देश ओर समाज किस दिशा में जायेगा इसका अंदाजा स्वतः ही लगाया जा सकता है ? सवाल सरकार की नियति का भी है, एक तरफ शिक्षा को लेकर कारोबार का विचार है, जिसमें शिक्षा को बाजार के हवाले कर दिया गया है, और मुनाफा कमानें के नाम पर तमाम निजी विश्वविद्यालय धडल्ले से मंजूर हो रहे हैं ? बस किसी भी तरह से डिग्रियों को बेचनें की कला में प्रवीण होना चाहिए ? वहीं दूसरी ओंर सरकारी शिक्षा है, आज तमाम विश्वविद्यालय सरकारी छत्र-छाया में चल रहें हैं, पर दुर्भाग्यवश सरकारों की बदलती नीतियों के अनुुसार उनकी नीतियों में परिवर्तन होंनें लगता है, और सियासी भले पिछले दरबाजे ही क्यों न हो, अपनें तई नीतियाॅ थोपनें में देरी नहीं करते ? भले विश्वविद्यालयों को चलानें वाली संस्था यूजीसी एक नियामक संस्था है, पर सरकार और सियासी दलों के ’’लोंगों की तैनाती’ इस कमी पूरा कर ही देती है, इन्हीं दोराहे पर खडे आज देश के विश्वविद्यालय लचर स्थिति में खडे हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं है, की अपना देश सदियों से ’ज्ञान’ के क्षेत्र में दुनियाॅ भर की धुरी रहा है, इसीलिए इस देश को ’विश्वगुरू’ के नाम से पहचान मिली । देश में स्थापित तमाम प्राचीन उच्च शैक्षिणिक संस्थान इस बात की तस्दीक करते हैं, की देश में ऐसे-ऐसे उच्च शैक्षिणिक संस्थान थे जिनकी ख्याति न केवल देश में अपितु विश्व भर के लोग इन संस्थानों की क्रिया कलापों से प्रभावित थे। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशीला विश्वविद्यालयों की ज्ञान आधारित शिक्षा अध्ययन/अध्यापन व छात्र/शिक्षकों के आदान-प्रदान शिष्टाचार और तौर-तरीकों के रूपहले अतीत से दुनियाॅ भर के शिक्षाविद्ों को मुरीद किया है, वे इन विशेषताओं से प्रेरित होते हैं/अनुसरण करते हैं। यहाॅ से शिक्षा प्राप्त छात्र-नौंजवानों का समाज और देश के निर्माण में एक विशिष्ट योगदान रहा है, किन्तु विदेशी शासन के चलते जो भारतीयता और प्राचीन साॅस्कृतिक व नैतिक मूल्य की शिक्षा थी, वह नष्ट होती चली गयी या यों कहें की जानबुझकर नष्ट कर दिया गया। आजादी के बाद पुनः इस देश में उच्च शिक्षा का प्रसार प्राराम्भ हुआ, शुरू-शुरू में तीन विश्वविद्यालय मद्रास, बंबई और कलकत्ता की स्थापना हुई, फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय खोला गया, बनारस और अलीगढ में भी सरकार नें विवि स्थापित किए, फिर देश के तमाम क्षेत्रों में भी विश्वविद्यालयों को स्थापित करनें का क्रम चल पडा, जैसे-जैसे जरूरत हुई, विवि स्थापित होते चले, पर उनकी गुणवत्ता और कार्यपद्वति को लेकर वास्तव में कोई चिंतन नहीं हो पाया, अथवा सियासत चमकानें में सियासतदानों के लिए वह एक जरिया बनते चले गये, नतीजन आज उच्च शिक्षा अपनें निम्न कोटि के व्यवहार के लिए प्रसिद्वि पा रही है। जो न केवल समाज के लिए बल्कि देश के लिए भी घातक है। अफसोस तो तब होता है, की हमें विदेशी विश्वविद्यालय से प्रेरणा लेनीं पड रही है, कई बुद्विजीवी भारतीय सोचते हैं, प्रिंस्टन, हाॅर्वड, येल, एमआईटी, ही उत्कृष्टता के नमुनें हैं, जबकी देशी के विश्वविद्यालयों को निखारा जाता तो वे देश-दुनियाॅ के लिए अनुकरणीय होते ?

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