‘पहाड़’ से ‘कनेक्ट’ नहीं हो पाई त्रिवेन्द्र सरकार

छह दिन तक सत्र का चलना, सदन में 17 विधेयकों का पारित होना व प्रतिदिन प्रश्नकाल में औसतन 17 सवालों का जवाब दिये जाने को सरकार सत्र की उपलब्धि मान रही है। लेकिन इस सत्र का एक स्याह पहलू भी है। वो यह कि राजधानी के मुद्दे पर गैरसैंण के हाथ मायूसी तो लगी ही पर इस दौरान सरकार खुद को स्थानीय लोगों से कनेक्ट करने में भी नाकाम रही।

 

 

deepak farswan

देहरादून। गैरसैंण (भराड़ीसैंण) विधानसभा सत्र को लेकर सरकार के अपने दावे हैं। सत्र को ऐतिहासिक बताया जा रहा है। पहली बार भरड़ीसैंण में राज्यपाल का अभिभाषण, छह दिन तक सत्र का चलना, सदन में 17 विधेयकों का पारित होना व प्रतिदिन प्रश्नकाल में औसतन 17 सवालों का जवाब दिये जाने को सरकार सत्र की उपलब्धि मान रही है। लेकिन इस सत्र का एक स्याह पहलू भी है। वो यह कि राजधानी के मुद्दे पर गैरसैंण के हाथ मायूसी तो लगी ही पर इस दौरान सरकार खुद को स्थानीय लोगों से कनेक्ट करने में भी नाकाम रही। सरकार का जनता से न तो लगाव दिखा और न ही जुड़ाव। लोक संस्कृति व लोक परम्पराओं से पूरी तरह परहेज किया गया। माननीयों की थाली से स्थानीय व्यंजन पूरी तरह गायब दिखे। दीवालीखाल से भराड़ीसैंण तक चार किलोमीटर का एरिया किले में तब्दील दिखा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र राजधानी के मसले पर आन्दोलन कर रही क्षेत्र की जनता से सीधी बात करने की हिम्मत न जुटा सके। सरकार के दो मंत्री आन्दोलनकारियों से बात करने पहुंचे भी तो रात के अंधेरे में। यूं कहा जा सकता है कि भराड़ीसैंण में बिताये सात दिन सरकार ने सिर्फ और सिर्फ सदन के भीतर बिजनेस पूरा करने में जाया कर दिये। जाया इसलिये क्योंकि आखिरी दिन विनियोग विधेयक से लेकर तीस विभागों का बजट मिनटों में पास कर दिये गये। बजट पर न तो कटौती का प्रस्ताव आया और न की कोई चर्चा हुई। राज्य का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि सदन में 17 विधेयक कानून बने और वो भी बगैर किसी बहस के। इसमें कोई दोराय नहीं कि इसके लिये विपक्षी भी बराबर का जिम्मेदार है। आइये! जानते हैं कि भराड़ीसैंण सत्र में सरकार किस तरह स्थानीय परिस्थितियों से आत्मसाथ नहीं कर सकी।

लोक संस्कृति की नहीं दिखी झलक
भराड़ीसैंण में बीते 20 मार्च को बजट सत्र की शुरुआत हुई। राज्यपाल डा. केके पॉल अभिभाषण के लिये पहुंचे लेकिन उनके स्वागत में ऐसा कोई समारोह आयोजित नहीं किया गया जिसमें लोक संस्कृति (छोलिया नृत्य, झांझरी आदि) की झलक दिखे। इससे पहले भराड़ीसैंण में जब भी विधानसभा सत्र आयोजित हुये उनका शुभारम्भ स्वागत समारोह के साथ हुआ, जिसमें लोक नृत्य व लोक गीतों का आयोजन किया गया। साथ ही आगंतुकों को उपहार स्वरूप स्थानीय वस्तुएं भेंट की जाती रही।

जलस्रोत के पानी से परहेज – 
भाराड़सैंण में बने विधानसभा परिसर में पानी की कोई कमी नहीं है। स्वच्छ प्राकृतिक स्रोत से पाइप लाइन बिछाकर परिसर तक पानी पहुंचाया गया है। लगभग सात हजार की फीट पर स्थित भराड़ीसैंण में माननीयों ने प्राकृतिक जलस्रोत के इस पानी को पीने से परहेज किया। ट्रक भर कर लाई गई मिनरल वाटर की बोतलों का पानी पीने और हाथ धुलने के लिये इस्तेमाल किया गया। मिनरल वाटर के इंतजाम में पानी की तरह पैसा बहाया गया।

थाली से नदारद रहे स्थानीय व्यंजन – 
इत्तेफाक रहा कि भाराड़ीसैंण विधानसभा सत्र के दौरान 24 मार्च (शनिवार) को मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कालेश्वर में स्थित एक समारोह में हार्क संस्था के स्थानीय उत्पादों की लॉचिंग की। अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि हमें पहले खुद स्थानीय उत्पादों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के साथ ही उनकी ब्रांडिंग के प्रयास करने होंगे। लेकिन इधर भराड़ीसैंण में आयोजित सत्र की अवधि में माननीयों को भोजन की जो भाली परोसी गई उसमें स्थानीय व्यंजन नदारद थे। इससे पहले भीराड़सैंण में आयोजित होनने वाली कैबिनेट की बैठकों व विधानसभा सत्र में हमेशा पहाड़ी व्यंजनों को ही तरजीह मिलती आई है।

आन्दोलनकारियों से रूबरू नहीं हुये त्रिवेन्द्र – 
गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से आन्दोलन चल रहा है। गैरसैंण व्यापार संघ व टैक्सी यूनियन के दो प्रतिनिधि आमरण अनशन पर बैठे हुये हैं। सत्र के दौरान सीएम त्रिवेन्द्र अधिकांशत: भराड़ीसैंण में ही मौजूद रहे लेकिन उन्होंने एक बार भी आन्दोलनकारियों से वार्ता नहीं की। 25 मार्च को देर रात कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत व राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धन सिंह आन्दोलनकारियों से मिलने पहुंचे लेकिन आन्दोलनकारी सीएम से मुलाकात पर अड़े रहे।

डरी-सहमी रही सरकार
भराड़ीसैंण में सात दिन के सत्र के दौरान सरकार डरी सहमी दिखाई दी। दीवालीखाल से भराड़ीसैंण में चप्पे चप्पे पर सुरक्षा कर्मी तैनात किये गये थे, जिसका प्रतिकूल प्रभाव वहां के जनजीवन पर दिखाई दिया। विधानसभा परिसर के आसपास स्थित गावों के लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक आने जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। सीएम 5 दिन तक भराड़ीसैंण में रहे लेकिन जनता से उन्होंने दूरी बनाकर रखी। जनसमस्याओं की सुनवाई तक उन्होंने नहीं की।

जाते-जाते ये क्या कह गये सीएम – 
सत्र के अंतिम दिन मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत मीडिया से मुखातिब हुये। राजधानी को लेकर गैरसैंण में चलाये जा रहे आन्दोलन पर जब उनसे सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि राजधानी सिर्फ स्थानीय लोगों के लिये नहीं होती, पूरे प्रदेश व देश के लिये होती है। उन्होंने कहा कि राजधानी का निर्णय सही वक्त पर किया जायेगा। उनके इस बयान से पर्वतीय क्षेत्र में रोष है।

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