तो क्या मुख्यमंत्री पद की ‘शपथ’ तोड़ रहे हैं त्रिवेन्द्र

 

उत्तराखंड में सिर्फ 57 विधानसभा में ही समीक्षा क्यों? 70विधानसभा में क्यों नहीं? क्या इन 13 विधानसभा के लोगों को विकास नहीं चाहिए है ? या आप की सरकार बनने के बाद इन 13 विधानसभाओं में कोई विकास कार्य हुआ ही नहीं जिन की समीक्षा आप कर सकें ? मुख्यमंत्री जी आप पुरे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और सभी विधानसभाओं की समीक्षा बैठक कर सन्देश देने के लिए काम करेंगे। कांग्रेस ने इसे भी मुद्दा बना दिया है। कि आप सिर्फ भाजपाई विधायक के क्षेत्रों में ही समीक्षा कर रहे हैं। केदारनाथ विधायक मनोज रावत ने शोशल मीडिया के द्वारा कडी प्रतिक्रिया की है।

 

 

दीपक फरस्वान

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के विधानसभावार विकास कार्यों व कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा का कार्यक्रम जारी होते ही एक बार फिर सरकार की किरकिरी होने लगी है। सचिवालय से जारी इस कार्यक्रम में 70 में से सिर्फ 57 विधानसभा क्षेत्रों को ही शामिल किया गया है। ये 57 विधानसभा क्षेत्र वो हैं जहां का प्रतिनिधित्व भाजपा के विधायक कर रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि 13 अन्य विधानसभा क्षेत्रों की समीक्षा न करके त्रिवेन्द्र सिंह रावत मुख्यमंत्री पद की शपथ का उल्लंघन कर रहे हैं।

केदारनाथ के विधायक मनोज रावत का कहना है कि मुख्यमंत्री के समीक्षा कार्यक्रम में 70 में से उन 13 विधानसभा क्षेत्रों को छोड़ दिया गया है जिनमें कांग्रेस या निर्दलीयों को जीत मिली है। मुख्यमंत्री की ओर से यह पक्षपात राजनैतिक विद्वेष से किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि त्रिवेन्द्र सिंह का यह रवैया राजनैतिक दुर्भावना का ही नहीं बल्कि उनके द्वारा की जा रही मुख्यमंत्री पद की शपथ के उल्लंघन का भी उदाहरण है। रावत का कहना है कि मुख्यमंत्री को सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों को बराबर नजरों से देखते हुये उनके विकास की योजना बनानी चाहिये और समय-समय पर उनकी समीक्षा भी करनी चाहिये लेकिन सिर्फ भाजपानीत विधायकों वाली विधानसभा क्षेत्रों की समीक्षा को अपने एजेंडे में शामिल करके मुख्यमंत्री ने लोकतंत्र की व्यवस्था को धक्का पहुंचाया है।

 

‘मुख्यमंत्री को न जाने क्या हो गया है। शायद उन्हें मालूम नहीं कि वो पूरे राज्य की जनता के मुख्यमंत्री हैं। भाजपा और कांग्रेस के विधायकों के क्षेत्र को देखते हुये यदि वे विकास योजनाओं की समीक्षा करेंगे तो यह जनता के साथ अन्याय माना जायेगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र को जवाब देना होगा कि जिन विधानसभा सीटों में विपक्ष के विधायक हैं, आखिकर उनकी समीक्षा करने में उनकी दिलचपी क्यों नहीं है ? क्या यह मुख्यमंत्री पद की शपथ का उल्लंघन नहीं है’ ?

 इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष।

 

‘लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष की व्यवस्था दी गई है। यह इसलिये नहीं दी गई कि मुख्यमंत्री इस व्यवस्था के हिसाब से राज्य का बंटवारा करें। मुख्यमंत्री तो पूरे प्रदेश के होते हैं। पूरी जनता के होते हैं। देखना होगा कि मुख्यमंत्री विधानसभा क्षेत्रों की समीक्षा में इतना पक्षपातपूर्ण कदम क्यों उठा रहे हैं। कम से कम उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ याद रखनी चाहिये’।

 प्रीतम सिंह, अध्यक्ष प्रदेश कांग्रेस।

 

मुख्यमंत्री पद की शपथ का प्रारूप

‘मैं, अमुक, ईश्वर की शपथ लेता हूं/लेती हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा/रखूंगी (संविधान का सोलहवां संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित।) मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण रखूंगा/रखूंगी। मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूंगा/करूंगी तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा/करूंगी।’

 

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