समाज के लिए मिसाल बनीं पौड़ी की उमा खंडूड़ी….महिला दिवस पर विशेष

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शंखनाद टीम

महिला दिवस के अवसर पर हम किसी सेलेब्रिटी के बात न करके एक आम घरेलु महिला जिन्होंने अपने त्याग और मेहनत के बेमिसाल उधारण देते हुए सबके लिए एक प्रेंरण बानी है आज हम उस खास महिला के बारे मे बात रहे है जिसे शायद समाज न जनता हो आज के समय में जहां एक ओर बुढ़े मां-बाप बोझ लगने लगते हैं तो वहीं पौड़ी निवासी उमा खंडूड़ी ने अपनी बुढ़ी एवं मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर सास की सेवा कर समाज के लिए एक मिसाल कायम की है। देहरादून जनपद के विकासनगर क्षेत्र में जन्मीं व पली-बढ़ी उमा खंडूड़ी का विवाह पौड़ी गढ़वाल के कमेड़ी गांव निवासी सुशीला खंडूड़ी के इकलौते पुत्र विरेन्द्र खंडूड़ी से हुआ। मैदानी क्षेत्र में रहने वाली उमा ने बड़ी कठिन परिस्थितियों के बावजूद स्वयं को पहाड़ी जीवन में आसानी से ढ़ाल लिया। शादी के कुछ वर्षों बाद ही उनके पति का निधन हो गया। जिसके बाद उमा पर दुखों का पहाड़ टूट गया और उनकी बीमार सास व तीन बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेवारी उमा के कंधों पर आ गई। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने मेहनत की खेतों में काम किया, नजदीक के स्कूल में बच्चों को पढ़ाकर दो-तीन सौ रूपयों की नौकरी भी की। इसके साथ ही उन्होंने बीए व एमए की पढ़ाई करते हुए एक सामाजिक संस्था में भी अपनी सेवाएं दी व साथ ही पौड़ी के अतिदुर्गम क्षेत्र के एक जूनियर स्कूल में लगभग 6 वर्षों तक कार्य किया। इसी बीच उनकी सास का स्वास्थ्य खराब हो गया। अपनी सास की सेवा की खातिर उमा ने मुश्किलों से हासिल हुई नौकरी से भी त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने अपनी बीमार सास की इस प्रकार सेवा की जैसे मां अपनी छोटी बच्ची की देखभाल करती है। उमा खंडूड़ी का कहना है कि इंसान की जिम्मेदारियां कभी समाप्त नहीं होती लेकिन इंसान जब हर कार्य को मेहनत व लगन से अपना समझकर करता है तो वो एक दिन उससे पार पा जाता है तथा साथ ही उसे आत्मसंतुष्टि का भी अनुभव होता है। उमा का कथन है कि हमारे बुढ़े माता-पिता व सास-ससुर बोझ नहीं हैं बल्कि वे हमारा साया होते हैं। हमें बुर्जुगों की उपेक्षा न कर उनकी सेवा को अपना कर्तव्य समझना चाहिए। उनका मानना है कि जिस व्यक्ति के भीतर मेहनत व लगन से कार्य करने की क्षमता होती है उसे एक दिन सफलता जरूर मिलती है। बहरहाल जहां अपनी बीमार सास और बच्चों की देखरेख के लिए अपना सबकुछ दाव पर लगाने वाली उमा खंडूड़ी ने समाज के लिए एक नई मिसाल कायम की है तो वहीं, आज भी हमारे समाज में कई कर्मठ और ईमानदार महिलाएं हैं जो अपने हक के लिए आगे नहीं आ पाती हैं। जरूरत है उन्हें प्रोत्साहित किये जाने की। ये कडुवा सच है किन्तु आज भी सरकार की वास्तविक योजनाओं का लाभ आम महिलाओं तक नहीं पंहुच पाता है। बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि आगे बढ़ते हुए समाज में आज भी आम महिलाएं पिछड़ी हुई हैं जिन्हें आगे लाने की आवश्यकता है।

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