विश्वविद्यालयों की ’डर्टी पॉलिटिक्स’ पर लगाम की दरकार

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(देवकृष्ण थपलियाल)

इस समय राज्य के सभी छोटे-बडे महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के छात्र संगठनों के चुनाव र्निविघ्न संम्पन्न हो चुके है। चुनावों के बाद की तस्वीर भी लगभग साफ हो चुकीं हैं। सभी उच्च शैक्षिणिक संस्थानों के छात्र-छात्राओं को उनके अध्यक्ष, महासचिव सहित तमाम, संबंधित पदाधिकारी प्राप्त हो चुके हैं। एक तरह से लम्बे अर्से से उच्च शिक्षा के इन पाक-साफ मंदिरों में जो अनावश्यक हुडदंगबाजी, कोलाहल, गंदगी और असमंजस से भरा वातावरण था, काफी हद तक उससे निजात मिल चुकीं है। इसलिए आशा की जानी चाहिए, की ये संस्थान जिन उद्देश्यों के लिए संचालित किए जा रहे हैं वे अब आसानीं से गति पकड पायेंगें और छात्र-प्राध्यापक सुगमता से अध्ययन, अध्यापन का कार्य निभा पायेंगें, यह संन्तोष उन सैंकडों-हजारों अभिभावकों को भी होगा, जो मुफलिसी और मंहगाई के इस दौर में भी अपनें बच्चों को पढाईं-लिखाई लिए सुदूर पहाडी ग्रामीण इलाकों से शहर/कस्बों की तरफ भेज रहे है, इस उम्मीद के साथ कि उनके पाल्य अच्छी शिक्षा, अच्छा रोजगार ग्रहण कर, योग्य नागरिक बन सकें, और अपनी उम्मींदों को पंख लगा सकें, ?

लेकिन हॉल की छात्र राजनीति और छात्र संगठनों के चुनावों का अवलोकन करें तो, इसनें आम चुनावों से भी बदत्तर शक्ल अख्तियार कर ली है, जिसमें चुनाव जींतनें के वे तमाम फंडे अपनाये जाते हैं, जिससे ऐन-केंन प्रकारेण जीत हासिल हो सके, ये बतानें की जरूरत नहीं है, की चुनाव जीतनें के लिए राजनीतिक दल और उनके प्रत्याशी क्या-क्या करते हैं, अथवा क्या नहीं करतें है ? यह भारतीय राजनीति की बडी समस्या है, (जिस पर विचार के लिए यहॉ समय और स्थान दोंनों का अभाव है,) लेकिन ठीक वही स्टाईल हमारे नवोदित छात्र नेताओं के चरित्र में भी झलक रहा है, जो न केवल इन उच्च शैक्षिणिक संस्थानों पढ रहे छात्र-छात्राओं के लिए अशोभनींय है, बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा जगत के लिए भी अपमानजनक है।

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इस छोटे से चुनाव में पैसा जिस तरह से पानीं की तरह बहाया जा रहा है, वह एक अच्छी प्रवृत्ति का संकेत नहीं है, चुनाव प्रचार के दौरान व्यावहारिक धरातल पर निगाह डालें, तो एक उम्मीवार लाखों रूपये खर्च कर रहा है, आखिर एक सवाल यह भी उठता है, की एक कालेज में पढनें वाले विद्यार्थी के पास इतना पैसा आखिर आता कहॉ से है ? और जहॉ से पैसा आ रहा वह स्रोत भी कुछ न कुछ अपेक्षा के साथ उस छात्र को पैसा भेज रहा है, निःसंदेह यह लेंन देंन शिक्षा जगत के लिए कतई शुभ नहीं है ? महंगे बैनर-पोस्टर और बडे-बडे होर्डिंक्स वार की तो बात क्या करना है ? पूरा शहर बैनर पोस्टरों से ऐसा पटा रहता है, मानों जैसे ये किसी कॉलेज के छात्र संगठन के चुनाव न हो कर पूरे शहर भर का चुनाव हो, जिसमें आम मतदाताओं नें वोट देंना हो !

प्रायः आसपास के गॉव-कस्बों की दीवारें भी इन पोस्टरों/बैनरों और होर्ल्डींक्स की मार से अछुते नही रह पातें हैं । अब सवाल उठता है, चुनाव सामग्री पर इतना खर्चा तो अन्य खर्चों को लगाकर क्या प्रत्याशी मामूली खर्चे में इन चुनावों की वैतरिणी पार पा कर रहें हैं ? जाहिर सी बात है, नहीं ? इसका आशय यह हुआ की किसी भी सामान्य और गरीब परिवार के छात्र-छात्रा के लिए प्रत्याशी बनना भी मुश्किल नहीे नामुमंकिन भी है। हालांकि छात्र संघ चुनाव, निर्वाचन विशुद्व रूप से लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, यह भावी नागरिकों में नेतृत्व क्षमता के साथ-साथ समस्याओं से जुझानें की प्रवृत्ति को सिखाता है, और निश्चित तौर से स्कूल कालेजों में पढनें वाले कल के नागरिकों को जिन्होंनें भविष्य में देश का नेतृत्व करना है, उन्हें इन प्रक्रियाओं से निश्चित रूप से गुजरना चाहिए और सिखना चाहिए कि किस प्रकार छात्रों की समस्याओं के साथ-साथ देश और समाज की समस्याओं से कैसे निपटा जा सकेगा ?

शायद यही कारण रहा होगा कि हमारे शिक्षाविद्ों नें महाविद्यालयों में छात्र संगठनांे की परम्परा का विकसित, प्रोत्साहित और महत्व प्रदान किया। इसलिए उच्च शैक्षिणिक संस्थानों में हो छात्र संघों के चुनावों की पंरपरा कोई नई रीति-नीति, नहीं है अपितु काफी पहले से छात्र संगठनों के चुनाव संपन्न होते आये हैं। हालांकि नई बात ये है, विगत कई सालों से चुनाव लडनेंध्लडानें के तरीकों में काफी अंतर आ गया है, यह फर्क साल दर साल बढता ही जा रहा है।

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उच्च शैक्षिणिक संस्थानों में हो रहे तमाम छात्र संगठनों के चुनावों का स्वरूप लगभग आम चुनावों की तरह होना शैक्षिणिक जगत के पतन की कहानीं बयॉ करते हैं, जो की किसी समाज, देश व राज्य के लिए बिल्कुल भी शुभ नहीं कहा जा सकता है, हालांकि इन चुनावों को संपन्न करानें के लिए लिंगदोह कमेटी नें गाईड लाइन जारी की है कहनें के लिए इसी कमेटी के दिशा-निर्देशों के अनुसार छात्र संघों के चुनाव संपन्न भी हो रहे हैं, पर वास्तव में ये चुनाव व्यवहारिक धरातल पर राजनीतिक दलों के इशारों पर संपन्न हो रहें या ये कहें की इन युवाओं के कंधों पर बंदुक रख कर राजनीतिक दलों के नेतागण अपना स्वार्थ सिद्व करनें में लगे रहते हैं, लगंे भी क्यों नहीं ? जो छात्र संगठन चुनाव लड रहे होते हैं, वे उन्ही दलों के अनुषांगिक संगठन होते हैं, जो उन्हीं दलों की विचारधाराओं को ढोते हैं,और उन्हीं के लिए वोट बैंक की लहलहाती हुई खेती तैयार करते हैं। इस समय राज्य के प्रमुख उच्च संस्थानों में परिणाम आये वे सभी राज्य की दो प्रमुख राजनीतिक दलों के अनुंषांगिक संगठनों की विजय की कहानीं बयां करते हैं।

राज्य के सबसे बडे महाविद्यालय डीएवी पीजी कॉलेज देहरादून में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद नें लगातार दसवीं बार विजयश्री हासिल की है, यहॉ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राहुल कुमार नें अपनें निकटतम प्रतिद्वंदी को महज दस मतों के अंतर से, संजय तोमर से यह जीत दर्ज की है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढवाल केंन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र अंकुर रावत नें अध्यक्ष का पद पर बाजी मारी है, विश्वविद्यालय के पौडी परिसर में एनएसयूआई के छात्र शुभम सिंह को अध्यक्ष पद पर सफलता मिली है। केंद्रीय विश्वविद्यालय के दूसरे परिसर बादशाही थौल टिहरी गढवाल में अघ्यक्ष पद निर्दलीय प्रत्याशी छात्र रविन्द्र सिंह के नाम रहा, नरेंन्द्र नगर टिहरी गढवाल के स्व0 धर्मानंद उनियाल राजकीय महाविद्यालय में अध्यक्ष पद भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के खाते में गया है, सुदूरवर्ती महाविद्यालय स्व0 थान सिंह रावत राजकीय महाविद्यालय पटोटिया नेैंनीडांडा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद दोंनों एनएसयूआई के नाम रहा ।

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इसी तरह सभी दूसरें दूर दराज से प्राप्त महाविद्यालयों के नतीजों बताते हैं कि वे किसी न किसी बडे सियासी पार्टी की शाखा के (संगठन) प्रतिनिधि है, और यह स्वाभाविक भी है कि भविष्य में वे इसी दल, विशेष से अपना राजनीतिक कैरियर प्राराम्भ करनें वाले है, ये बात अलग है,की वे अपनीं भी राजनीतिक पारी सुनहरी कर पाते हैं अथवा नहीं लेकिन फिलहाल तो वे दलध्व्यक्ति विशेष के लिए सुनहरे मौके के रूप में उपलब्ध हैं। इसीलिए इन शैक्षिणिक संस्थानों का माहौल लगभग राजनीति के अखाडे की तरह तब्दील होता रहा है, पर्दे के पीछे से ही सहीं राजनीतिक दल अपनीं विचार धारा के साथ-साथ वह तमाम सर्कींणताओं से इन पवित्र मंदिरो को भी लपेट लेते हैं, जिससे वहॉ का संकुचित होने लगता है, यह जाहिर सी बात है की राजनीति कभी बिना छल के संभव नहीं हो पायेगीं ?

चुनाव जीतनें के बाद संमंधित राजनीतिक दल के नेताओं को कालेज परिसरों के विभिन्न कार्यक्रमों बतौर अतिथि आमंत्रित करनें की पंरपरा है, सालों पुरानीं है, जो समझ से परे रही है ? छात्र नेताओं का ध्यान नेताओं की ’’विशेष कृपा‘‘ पर निर्भर होती है, जिससे वे ये बतानें की कोशिश कर सकें उनके कार्यकाल में अमुख ’कार्य’ कर पायें हैं, जो की केवल, सिवाय खोखले अश्वासन और झूठ पर आधारित होंनें के कुछ नहीं। कॉलेज-विश्वविद्यालय में निर्माण कार्य, पुस्तकालय, अन्य मदों के खर्च हेतु सरकारें बजट रिलीज करतीं हैं जो विशुद्व रूप से संवैधानिक और नियमों पर आधारित प्रक्रिया है, महज कुछ झुनझुना पकडा कर राजनीति करनें के इस चलन को रोकना होगा चाहे यह पंरपरा कितनी भी पुरानीं क्यों न हो ? कालेज परिसरों में विज्ञान, कला, संस्कृति, समाज सेवा, बहादुरी, खेल, धर्म-आध्यात्म व विभिन्न क्षेत्र की प्रतिभाओं को बतौर अतिथि आमंत्रित किया जाना चाहिए, जो अपनें अनुभवों, कार्यों से छात्रों का मार्गदर्शन कर सकें। उच्च शैक्षिणिक संस्थानों में ज्ञान आधारित प्रतिस्पर्धा, नवीन विचारों, अविष्कारों और सभ्यताओं का विकास होंना था, वह तभी संभव है, जब अनुकूल और स्तरीय व्यक्तियों का आगमन परिसरों में होता रहे।

अगर वहॉ का नौजवान सर्कींण राजनीति के दल-दल में फॅस गया तो क्या समाज का चरित्र होगा और कैसे देश का निर्माण होगा ? जरूरी है नई सोच के साथ इन संस्थानों के चरित्र को बदलनें की, छात्र संगठन के चुनावों में एक नई गाइड-लाईन जारी की चाहिए।
छात्र संघ चुनावों में जीत हासिल करनें के नाम पर जिस तरह से धनबल, क्षेत्रवाद, जातिवाद का सहारा लिया जा रहा है, वह निश्चित ही किसी डरावनें भविष्य की ओंर इशारा कर रहा हैं ? इसकी जडें निश्चित रूप से वे बडे राजनीतिक दल हैं, जो ऐंन-केेंन प्रकारेण इन युवाओं के बल पर अपनीं चुनावी खेती को हरा-भरा कर देंना चाहते हैं, अभी हाल में सम्पन्न हुए चुनावों के बाद के उपद्रवों पर नजर डालें तो छात्रों के बीच जो मारपीट व विद्वेष का संचार हुआ है उसके पीछे राजनीतिक दलों की ही कुटील चालें थीं।

abvp500कोटद्वार स्थित महाविद्यालय के छात्रों नें न केवल अपनीं हार के लिए शहर भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं को जिम्मेदार ठहराया अपितु शहर में एक बडा आंदोलन खडा कर, सीधे-सीधे पार्टी के प्रदेश नेतृत्व को कार्यवाही के लिए दबाव डालनें प्रयास किये, जिससे कालेज में पठन-पाठन प्रभावित हुआ ही साथ ही शहर और कालेज में एक नकारात्मक वातावरण का निर्माण हुआ। विश्वविद्यालय के पौडी परिसर में छात्रों पर लाठी चार्ज जैसीं निंदनीय घटना घटी जिस कारण कई छात्र चोटिल हुए, विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर श्रीनगर में भी चुनाव नतीजों के बाद कोई दर्जन भर छात्रों के मारपीट का मामला प्रकाश में आया, श्रीनगर से देहरादून जा रहे छात्र संघ अध्यक्ष और पदाधिकारियों पर दूसरे छात्र संगठन के छात्रों के बीच में आपस मे मारपीट से कई छात्रों पर जानलेवा हमले हुए, दोंनों संगठनों के मध्य वैमनस्यता का बीजारोपण से आगामी दिनों में विश्वविद्यालय का माहोल दूषित ही करेगा, जिसका खामियाजा उन होनहार छात्रों को भी भुगतना पडेगा जो इस लडाई से बहुत दूर हैं।

माना की छात्र राजनीति का परिसरों में एक विशेष महत्व रखती है, और खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहायक है। लेकिन उत्ंतराखंड जैसे छोटे राज्य में, आज छात्र राजनीति जिस दिशा में जा रही है, क्या उस पर चिंतन नहीं होंना चाहिए ? क्या भविष्य में ये महाविद्यालय और विश्वविद्यालय ’केवल और केवल’ राजनीति के अखाडे बन कर नहीं रह जायेंगें ? अगर समयबद्व तरीके से इस बिन्दु पर विचार नहीं किया गया, तो निश्चित रूप से ये शैक्षिणिक संस्थान ’राजनीति’ के अखाडे ही सिद्व होंगें, जिन महान् मुल्यों के लिए हमारे महामनीषियों नें इन विवि-महा विद्यालयों की स्थापना की थीं वे अपनें उद्देश्यों से भटक जायेंगें, शिक्षा, शोध व पठन-पाठन अनुशासित व्यक्तित्व का निर्माण का उद्देश्य बना रहे इसके लिए, जरूरी है कि कॅालेज की छात्र राजनीति सीमित और अनुशासित ढंग से चलती रहे। अपनें स्थापना वर्ष से आज तक राज्य के दों महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों (कूॅमायू और गढवाल विवि) की उपलब्धि पर थोड़ा गौर फरमाऐं तों दोंनों संस्थानों का इतिहास दूर्भाग्यवश ऑदोलनों का ही इतिहास है, जबकी विश्वविद्यालय क्षेत्रीय विकास के संवाहक माने जाते हैं, ऐसा कोई शोध कार्य, खोज या खास उपलब्धि, जिससे यहां के आम जनमानस की संस्कृति, समाज और पर्यावरण के लिए लाभदायक हो, आज तक प्राप्त नहीं हुई, लेकिन आए दिन छोटे-छोटे मुद्दों पर यहां के छात्रों का आंदोलित होना आम बात है।

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