उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की परिसम्पतियों का जल्द होगा बटवारा

06_02_2016-06uttrakhand01

 

उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश से अलग हुए 16 साल हो गये है लेकिन अभी तक दोनों राज्यों के बीच परिसंपत्तियों को बंटवारा नहीं हो पाया है। उत्तराखण्ड पावर काॅरपोरेशन, परिवहन निगम, खाद्य विभाग और सिचांई विभाग समेत कई विभागों की परिसंपत्तियों का बंटवारा न होने से राज्य को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। कई बांध और नहरें उत्तराखण्ड की भूमि पर है, लेकिन इसका नियंत्रण और लाभ उत्तराखण्ड को नहीं मिल पा रहा है। कई कर्मिकों को भी उत्तराखण्ड से यूपी जाना है, जिस पर यूपी सरकार कोई पहल नहीं कर रही है। अब जबकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड दोनों राज्यों में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बन चुकी है। ऐेसे में अब उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड  के बीच चला आ रहा 16 वर्षाे से विवाद सुलझने के आसार है। खास बात यह है कि यूपी के नए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ मूल रूप से उत्तराखण्ड के है। योगी सीएम के बनने पर यूपी में भी उत्तराखण्ड का दबदबा है। ऐसे में यूपी उत्तराखण्ड के बीच परिसंत्तियों के जल्द निपटारे की संभावना जताई जा रही है। उल्लेखनीय है कि एक नवंबर 2000 को उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना हुई थी। राज्य स्थापना के दौरान यहां की परिसंत्तियों का बंटवारा नहीं किया गया। जिससे आज भी राज्य की परिसंत्तियों पर उत्तर प्रदेश शासन का स्वामित्व है। वर्ष 2012 में नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखण्ड शासन को राज्य में स्थित उत्तर प्रदेश के कब्जे वाली परिसंत्तियों को अपने नाम कराने और यूपी शासन का कब्जा खारिज कराने के आदेश दिये थे। जिसके तहत हरिद्वार जिले की परिसंत्तियां उत्तराखण्ड सरकार के नाम दर्ज हो गई। वहीं अन्य परिसंत्तियों दर्ज होने से पूर्व ही यूपी शासन ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट होने से पूर्व ही यूपी शासन ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और भारत सरकार को इस मामले में पफैसला लेने को कहा। बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों में सरकार द्वारा वरिष्ठ आईएएस अफसरों की उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। लेकिन आपसी सामंजस्य न होने के कारण बंटवारे की लड़ाई आज तक नहीं सुलझी। इन जलाशयों में मत्स्य पालन का ठेका तो उत्तराखण्ड सरकार कराने लगी। परंतु उत्तराखण्ड के ऊधमसिंह नगर जिले के अलावा उत्तर प्रदेश के बरेली पीलीभीत, लखीमपुर, बदायूं आदि जिलों की लाखों एकड़ जमीन में सिंचाई के एवज में आबपासी के करोड़ों रूपये यूपी सरकार ही वसूलती है। इससे उत्तराखण्ड सरकार को करोड़ों रूपये की हानि हो रही हैै। वहीं यहां की जनता को डैम के पानी की बाढ़ से इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। अधिकांश संपत्तियां उत्तराखण्ड में है और इस पर कब्जा उत्तर प्रदेश का है। उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड को वजूद में आए सत्रह साल होने जा रहे हैं लेकिन दोनों राज्यों के बीच परिसंपत्तियों के बंटवारे का मामला अब तक सुलझ नहीं पाया है। नैनीताल हाईकोर्ट ने 2009 में दिए अपने निर्णय में उत्तर प्रदेश को निर्देश दिए थे कि उत्तराखण्ड की परिसंत्तियां उसे लौटा दे लेकिन उत्तर  प्रदेश सरकार ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। यह मामला तब से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

सिंचाई परिसंपत्तियों पर यूपी का कब्जा

उत्तराखण्ड की सिंचाई परिसंपत्तियों पर उत्तर प्रदेश शासन का स्वामित्व होने से नानक सागर और बैगुल जलाशय सरकारों की उपेक्षा का दंश झेल रहे है। सरकारों द्वारा इस ओर ध्यान न देने से पर्यटन की दृष्टि से ये दोनों बांध विकास से कोसों दूर है। वही, जर्जर हालत में पहुंच चुके बांधों के टूटने का खतरा भी बना हुआ है। परिसंपत्तियों के बंटवारे की फाइल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। मामले में कोई पहल न होने से सरकार को आबपासी के एवज में मिलने वाले करोड़ों रूपये के राजस्व की हानि हो रही है और जनता भी इसका खामियाजा भुगत रही है। सरकारों के नकारापन से लटका परिसंपत्तियों का बंटवारा नहीं हो पाया। बांध उत्तराखण्ड की धरती पर है। इसका नुकसान उत्तराखण्ड झेलता आया है। जबकि इनसे होने वाली सिचांई पर भी उत्तराखण्ड का अधिकार होना जरूरी है। डैम और बांध के पानी को उत्तर प्रदेश जाने से रोका जा सकता हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार से सिंचाई के पानी के बदले उत्तराखण्ड को राजस्व दिया जाना चाहिए।

 

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