उत्तराखंड का ‘दर्द’ है उत्तरा का ‘प्रतिकार’

 

निसंदेह ‘उत्तरा प्रकरण’ उत्तराखंड की सियासत के लिये कोई सामान्य घटना नहीं है । जिस राज्य की आधारशिला महिलाओं के त्याग और बलिदान पर रखी गयी हो, उस राज्य में मुख्यमंत्री के जनता दरबार में पहुंची एक विधवा महिला को मुख्यमंत्री द्वारा सरेआम बेइज्जत किया जाना सामान्य घटना हो भी नहीं सकती । लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सरकार, विपक्ष और मीडिया, हर किसी के स्तर से इस प्रकरण को समझने में अभी चूक हो रही है ।

 

 

योगेश भट्ट

इन दिनों उत्तराखंड की सियासत में ‘उत्तरा’ प्रकरण की गूंज है । अब हर कोई इस प्रकरण पर हाथ साफ करने में लगा है । कोई अपनी ‘भड़ास’ निकालने में लगा है, तो कोई इस पर सियासी रोटियां सेकने की फिराक में है । किसी को इस बहाने त्रिवेंद्र और उनके मैनेजरों पर हमले का मौका मिला है तो कोई अपने लिये ‘संभावनाएं’ तलाशने में लगा है । निसंदेह ‘उत्तरा प्रकरण’ उत्तराखंड की सियासत के लिये कोई सामान्य घटना नहीं है । जिस राज्य की आधारशिला महिलाओं के त्याग और बलिदान पर रखी गयी हो, उस राज्य में मुख्यमंत्री के जनता दरबार में पहुंची एक विधवा महिला को मुख्यमंत्री द्वारा सरेआम बेइज्जत किया जाना सामान्य घटना हो भी नहीं सकती । लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सरकार, विपक्ष और मीडिया, हर किसी के स्तर से इस प्रकरण को समझने में अभी चूक हो रही है ।
सियासी दल इस मुद्दे को भले ही आज सियासी बनाने पर तुले हैं, लेकिन सही मायनों में यह सियासत का नहीं बल्कि राज्य की राजनैतिक व्यवस्था, उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता से जुड़ा मुद्दा है । उत्तरा प्रकरण को इस वक्त बेहद संजीदगी से समझने की आवश्यकता है । एक 57 वर्षीय विधवा शिक्षिका के साथ मुख्यमंत्री के जनता दरबार में जो कुछ हुआ वह यह दर्शाता है कि आज उत्तराखंड में एक आम आदमी की हैसियत क्या है ? इस घटना से एक तो यह साबित होता है कि यह राज्य सिर्फ जुगाड़बाज नेताओं, ठेकेदारों , भ्रष्ट चापलूस अफसरों, सत्ता के दलालों और माफिया के लिये बना है। आम आदमी, आम कर्मचारी, आम व्यापारी, आम शिक्षक की यहां न कोई हैसियत है और न सम्मान । निसंदेह उत्तरा ने मुख्यमंत्री की ‘दुत्कार’ का ‘प्रतिकार’ कर साहस दिखाया है ।
मुख्यमंत्री के व्यवहार पर उत्तरा के ‘प्रतिकार’ ने आज सरकारों के रवैये पर सोचने को मजबूर किया है । तमाम सवाल जेहन में उठते हैं, मसलन क्या उत्तराखंड में एक आम आदमी को अपनी बात रखने का कोई हक नहीं है ? क्या यही दिन देखने के लिये उत्तराखंड राज्य की लड़ाई लड़ी गयी, इसके लिये ही उत्तराखंड बना ? नीतियां, नियम, कानून क्या सिर्फ असहाय और निर्बल के लिये हैं ? नेताओं, अफसरों और असरदारों के लिए क्या कोई कायदे कानून नहीं ? सरकार की ‘दबंगई’ क्या सिर्फ आम जनता के लिए है ? सवाल व्यक्तिगत तौर पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह पर भी है । आखिर त्रिवेंद्र एक विधवा शिक्षिका को दुत्कार कर क्या साबित करना चाह रहे थे ? क्या वह यह साबित करना चाह रहे थे वह बहुत दबंग और कायदे कानून वाले हैं ? इसके लिए उन्होंने अगर एक विधवा शिक्षिका को चुना तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । ज्यादा दूर नहीं जाते हाल ही की बात करते हैं, मुख्यमंत्री की यह दबंगई उस वक्त कहां गयी जब धूमाकोट बस हादसे में राहत के लिये तीन घंटे तक हैलीकाप्टरों ने उड़ान नहीं भरी ? तब कहां गयी थी मुख्यमंत्री की सख्ती, जब पता चला कि हृदयविदारक दुर्घटना के बाद घायलों को इलाज इसलिये नहीं मिल पाया क्योंकि धूमाकोट अस्पताल में डाक्टर ही नहीं थे।
जिस अंदाज में मुख्यमंत्री ने एक विधवा शिक्षिका को दुत्कारा क्या उसी अंदाज में राज्य के किसी भ्रष्ट आईएएस अफसर को दुत्कारने की हिम्मत है उनमें ? मुख्यमंत्री शायद भूल रहे हैं कि उनके ही राज में भ्रष्ट आईएएस अफसरों को सेफ एग्जिट दिया गया है। रही बात कायदे कानून और फर्ज की तो त्रिवेंद्र सिंह पर सवाल है कि मुख्यमंत्री बनते ही वह एक डाक्टर को पहाड़ से उतारकर मैदान किस नियम से लाए । जबकि लंबे समय से देहरादून में जमे इस डाक्टर को पिछली सरकार ने देहरादून से पहाड़ पर भेजा गया था । क्या सिर्फ इसलिये कि उस डाक्टर ने मुख्यमंत्री की शान में एक किताब लिखी ? यह भी एक बड़ा सवाल है कि किस नियम के तहत उनकी और उनके तमाम राजनैतिक सहयोगियों की शिक्षिका पत्नियां वर्षों से देहरादून के स्कूलों में तैनात हैं । अब बात निकली है तो दूर तक जाएगी, मुख्यमंत्री संभवत: यह भूल रहे हैं उनसे जुड़े ऐसे तमाम सवाल हैं जो सियासी तौर पर उन्हें असहज कर सकते हैं ।
सच्चई यह है कि लोकतंत्र में एक मुख्यमंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह एक फरियादी को सरेआम दुत्कारने लगे । दुत्कार का फरियादी द्वारा प्रतिकार करने पर वह अपना ‘आपा’ खो बैठें और फरियादी शिक्षिका को निलंबित कर गिरफ्तार करने का फरमान सुना डालें । आखिर क्या अपराध था दो दशक से दुर्गम में नौकरी कर रही उस विधवा शिक्षिका का ? सिर्फ यही कि उसने सरकार में, व्यवस्था में और मुख्यमंत्री में भरोसा जताया । यह अपराध था उसका कि उसकी पैरवी करने वाला कोई नेता, अफसर या असरदार नहीं था । न्याय तो उत्तरा को पिछली सरकारों में कई सालों से नहीं मिला लेकिन दुत्कारने का हक तो किसी को नहीं था, खासकर मुख्यमंत्री को तो कतई नहीं । क्योंकि मुख्यमंत्री सिर्फ सरकार का मुखिया ही नहीं बल्कि राज्य की जनता के लिये उसका पालक है, अभिभावक है । जनता के दुखों को महसूस करना, उन्हें दूर करना उसका धर्म है । एक अच्छा मुख्यमंत्री सिर्फ और सिर्फ प्रदेश और प्रदेश की जनता के प्रति उत्तरदायी होता है, लेकिन मुख्यमंत्री रहते हुए त्रिवेंद्र को शायद इसका भान तक नहीं। त्रिवेंद्र के व्यवहार से यह भी साफ है कि वह मुख्यमंत्री के रूप में जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं है । वह उत्तरदायी है तो सिर्फ अपने राजनैतिक आकाओं, चुनाव प्रबंधकों, परिजनों और फाइनेंसरों के प्रति ।
दरअसल गलती त्रिवेंद्र की नहीं बल्कि राजनैतिक व्यवस्था की है । लोकतंत्र में व्यवस्था की कमान एक जननेता के हाथ में होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा राजनैतिक व्यवस्था तो दिल्ली की गुलाम है । उत्तराखंड का दुर्भाग्य है कि यहां नेता दिल्ली से थोपे जाते रहे हैं । बहुत बड़ा फर्क होता है एक जननेता और थोपे गए नेता में । थोपा गया नेता कभी भी जनता के प्रति उत्तरदायी हो ही नहीं हो सकता, न ही जनता उसकी प्राथमिकता हो सकती है । नतीजा सामने है, उत्तरा ने प्रतिकार स्वरूप जिन शब्दों “चोर-उचक्के” का इस्तेमाल किया, वह आज नेताओं और अफसरों के लिए हर आम की जुबां पर हैं । उत्तरा को न्याय भले ही नहीं मिला, लेकिन उत्तरा ने बता दिया है कि सब्र का बांध अब टूटने लगा है। उत्तरा का प्रतिकार सही मायनों में राजनैतिक व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है, सरकार और सिस्टम दोनो को समय रहते इसे समझना होगा । सनद रहे कि उत्तरा का प्रतिकार आगाज है, यह 18 साल में ‘तकलीफों’ के ‘तूफान’ बनने का संदेश है । यह सिर्फ एक विधवा शिक्षिका का ‘दर्द’ नहीं बल्कि उत्तराखंड की मूल अवधारणा के चोटिल होने का ‘दर्द’ है । उत्तरा उस अंतिम व्यक्ति की ‘व्यथा’ का ‘प्रतीक’ है जो सिस्टम से निराश हो चुका है । तय मानिये एक दिन यह ‘प्रतिकार’ जरूर रंग लाएगा ।

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