फूलों की घाटी के लिए शूल बना अपना ही फूल

(रणजीत रावत)
समुद्र तल से 11479 फीट की ऊंचाई पर स्थित विश्व धरोहर फूलों की घाटी के लिए उसी का एक फूल शूल बन गया है। 87.5 वर्ग मीटर में फैली इस घाटी के तकरीबन दो किमी हिस्से में पॉलीगोनम नामक फूल पांव पसार चुका है। सफेद रंग का यह झाड़ीनुमा फूल जहां भी उगता है, आसपास अन्य प्रजाति के फूल खिलने बंद हो जाते हैं। यह फूल घाटी की जैव विविधता के लिए भी खतरा बना हुआ है।

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फूलों की घाटी में 500 से अधिक प्रजाति के फूल खिलते हैं। इन्हीं में से एक है पॉलीगोनम, जो एक स्थान पर उगने के बाद लंबे-चैड़े क्षेत्र में फैल जाता है। वर्ष 2014 तक घाटी को पर्यटकों के लिए खोलने के बाद नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क प्रशासन पॉलीगोनम को उखाड़ने का काम करता था। इससे काफी हद तक यह कम भी हो गया था, परंतु बीते दो साल से पार्क प्रशासन ने यह काम बंद कर रखा है। नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क सर्वेश कुमार दुबे ने बताया कि दो वर्षों से बजट के अभाव में यह कार्य रोकना पड़ा है। उन्होंने बताया कि पार्क प्रशासन की ओर से इस बार भी शासन से बजट की मांग की गई है।

दो दशकों से घाटी में फोटोग्राफी कर रहे स्थानीय गाइड भरत सिंह चैहान कहते हैं कि श्जब से स्थानीय पशुओं का चरान-चुगान बंद हुआ है, तब से पॉलीगोनम बढ़ा है। पहले बकरियां इसे खा जाती थी और उनके खुरों से भी यह फूल नष्ट हो जाता था।श् वह कहते हैं यही आलम रहा तो फूलों की घाटी को इतिहास बनने से कोई नहीं रोक सकता।

जोशीमठ पीजी कॉलेज में वनस्पति विज्ञान के प्रवक्ता डॉ. सुमन सिंह राणा भी इससे चिंतित हैं। वह कहते हैं कि एक बार जड़ें जमाने के बाद पॉलीगोनम गाजर घास की तरह फैलने लगता है। ऐसे में यह घाटी की जैव विविधता के लिए खतरा बन गया है।

हिमालय के सभी बुग्यालों में पाया जाता है पॉलीगोनम
भारतीय वन अनुसंधान संस्थान के वर्गीकरण विज्ञानी डॉ. एचबी नैथानी बताते हैं कि दरअसल पॉलीगोनम हिमालय के सभी बुग्यालों (उच्च हिमालय में पाए जाने वाले घास के मैदान) में पाया जाता है, लेकिन फूलों की घाटी की आबोहवा इसके लिए बेहद मुफीद है। जब घाटी में मवेशियों के चरान-चुगान की व्यवस्था थी तब संतुलन बना रहता था। चरान पर प्रतिबंध के बाद से स्थिति विकट हुई है।

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