वरुण गांधी ने सांसदों की सैलरी को बढ़ाने के अधिकार का विरोध किया।

 

भाजपा सांसद वरुण गांधी ने मंगलवार को संसद में शून्यकाल के दौरान सांसदों के खुद की सैलरी को बढ़ाने के अधिकार का विरोध किया।

उन्होंने ना सिर्फ सैलरी बढ़ाने के अधिकार बल्कि आधार बिल को बिना गंभीर चर्चा के पास किए जाने का भी विरोध किया। शून्यकाल में अपनी बात को रखते हुए वरुण गांधी ने कहा कि सांसदों की सैलरी को बढ़ाने का अधिकार उन्हें नहीं देना चाहिए, बल्कि किसी ऐसे तंत्र को यह अधिकार दिया जाना चाहिए जो सांसदों के अधिकार क्षेत्र में ना हो।

वरुण गांधी ने सवाल किया कि जब सैलरी से संबंधित मुद्दे रखे जाते हैं तो मुझे यह सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि क्या यही सांसदों की नैतिकता है, तकरीबन 18000 किसानों ने पिछले एक वर्ष में आत्महत्या कर ली है, लेकिन हमारा ध्यान कहां है। उन्होंने कहा कि यह शर्मनाक है कि लोकसभा सत्र के कार्यकाल में काफी कमी आई है, उन्होंने कहा कि 1952 मे यह 123 दिन हुआ करती थी लेकिन अब यह 2016 में घटकर सिर्फ 75 रह गई है। गांधी ने कहा कि 2016 में शीतकालीन सत्र में 16 फीसदी की कमी आई, यह शर्मनाक है।

गांधी ने कहा कि कर से जुड़े बिल और आधार बिल को महज दो हफ्ते के भीतर पास कर दिया गया, इसे कमेटी के पास भी नहीं भेजा गया। जिस तरह से वरुण गांधी ने आधार बिल को कमेटी के पास नहीं भेजे जाने के खिलाफ सख्त बयान दिया है वह उनकी पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है, विपक्षी दलों ने भी आधार बिल को लेकर सरकार की आलोचना की थी।

सांसदों के द्वारा खुद की सैलरी बढ़ाने के मामले पर बोलते हुए गांधी ने कहा कि जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पहली कैबिनेट की बैठक में साझा फैसला लिया था कि सांसद अगले छह महीने तक सैलरी नहीं लेंगे, क्योंकि उस वक्त लोग काफी मुश्किलों से जूझ रहे थे। हाल ही में नई दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए वरुण गांधी ने कहा कि किसानों न मूत्र पिया और हड्डियों के साथ प्रदर्शन किया, ताकि वह अपने राज्य में किसानों की आत्महत्या के खिलाफ लोगों को जगा सके। लेकिन तमिलनाडु की विधानसभा ने 19 जुलाई को विधायकों की सैलरी को दोगुना बढ़ा लिया, इससे जो बड़ा संदेश जाता है वह है असंवेदनशीलता।

गांधी यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि यूके में सांसदों की सैलरी 13 फीसदी बढ़ती है, जबकि भारत में पिछले एक दशक में 400 फीसदी सैलरी में इजाफा हो चुका है, क्या हमने सच में इस बढ़ोत्तरी को कमाया है। सांसदों के काम पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने कहा कि महज 50 फीसदी बिल संसदीय कमेटियों में जाने के बाद पास हुए हैं। उन्होंने कहा कि जब बिल बिना गंभीर चर्चा के पास होते हैं तो यह संसद के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करता है, आखिर में क्या जरूरत है संसद की जब बिल पर चर्चा नहीं होनी है।

बिल को बिना गंभीर चर्चा के पास कराने की जल्दबाजी बिल के उद्देश्य को ही खत्म कर देती है, संसद का गठन ही इसलिए हुआ था कि यहां इस पर्चा हो, विरोध हो और इसका आंकलन किया जाए, ताकि इस बात को सुनिश्चित किया जा सके कि जो भी बिल पास हो उसके पीछे मजबूत नीति हो। लिहाजा बिल को जल्दबाजी में पास कराने सा राजनीतिक लाभ हो सकता है लेकिन नीतिगत लाभ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि 41 फीसदी बिल बिना चर्चा के ही पास कर दिए गए हैं।

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