कब जनभावनाओं की कदर करेंगे राजनैतिक दल उत्तराखंड के ? गैरसैंण


कब जनभावनाओं की कदर करेंगे राजनैतिक दल उत्तराखंड के ?
देहरादून /देहरादून,
गैरसैंण राज्य निर्माण के पूर्व से अब तक उत्तराखंड कि जनता के साथ ही सियासत के लिए भी एक बड़ा मुद्दा रहा है। जनता के लिए तो इसलिए क्योंकि यह उसके भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है लेकिन सियासत व सियासतदाओं के लिए सियासत के खेल से ज्यादा कुछ नहीं है। जिसे उन्होंने जब जैसे चाहा उसे अपनी सहूलियत के हिसाब से इस्तेमाल कर लिया। तभी तो बारी बारी सत्ता में आयी कांग्रेस व भाजपा कि सरकारे गैरसैंण को अपने हिसाब से परिभाषित करती आयी है। किसी ने उसे अस्थाई राजधानी तो किसी ने गीष्मकालीन राजधानी बनाने कि बात कही, लेकिन स्थाई राजधानी के नाम पर दोनों ही दल चुप्पी साधे रहे, क्योंकि गैरसैंण तो हमेशा ही राजनैतिक दलों के लिए गैर था और गैर ही रहेगा। जरूरत महज मजबूत इच्छा शक्तिकि है जो राजनैतिक दलों में नदारत दिखती है।
आखिर सोचने वाली बात है कि राजनीतिक दल गैरसैंण पर कितना छल क्यों कर रहे है। जनभावनाओं का हवाला देते हुए गैरसैंण में करोड़ों रूपये खर्च कर विधानसभा भवन, विधायक आवास समेत तमाम निर्माण कार्य हो चुके हैं। पूर्ववर्ती सरकार गैरसैंण में तीन बार विधानसभा सत्र भी आयोजित कर चुकी है, जिनमें से एक सत्र तो भराड़ीसैंण स्थित नए विधानसभा परिसर में आयोजित हुआ। इतना ही नहीं, विधानसभा सचिवालय के नाम पर चोर दरवाजे से करीब डेढ़ सौ तक नियुक्तियां भी की जा चुकी हैं। कांग्रेस सरकार पूरे कार्यकाल के दौरान ग्रीष्मकालीन राजधानी का राग अलापती रही, लेकिन आखिर तक गैरसेंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी भी घोषित नहीं कर पाई। दोहरे चरित्र की हद देखिए कि अब जब सत्ता से बेदखल हुई तो नई सरकार से गैरसैंण पर स्टैंड पूछ रही है।
दूसरी तरफ सत्ताधारी भाजपा, जो तब विपक्ष में रहते हुए आए दिन इस मुद्दे पर सरकार को घेरती थी। जो भाजपा तब गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने का संकल्प लेकर आई। संकल्प भी उस नेता के जरिए लाया गया जो व्यक्तिगत तौर पर गैरसैंण के विरोधी थे। जब विधानसभा चुनाव का वक्तआया तो यही भाजपा स्थाई से ग्रीष्मकालीन राजधानी पर आ गई। चुनावी घोषणापत्र में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का वादा किया। गजब देखिए कि अब सत्ता में आने पर यही भाजपा ग्रीष्मकालीन राजधानी भी घोषित नहीं कर पा रही है। उत्तराखंड का हर नागरिक जनता है कि गैरसैंण का स्थाई समाधान सिर्फ और सिर्फ स्थाई राजधानी ही है और इसका समाधान तो उस दिन खुद हो जाएगा, जिस दिन सरकार स्थायी राजधानी का फैसला कर लेगी। असल में जिस फैसले के लिए इच्छा शक्तिचाहिए, वो इच्छाशक्ति शायद किसी भी राजनैतिक दल के पास नहीं है ।पर कब जनभावनाओं की कदर करेंगे राजनैतिक दल ?

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