क्षेत्रीय दलों के पतन का जिम्मेदार कौन?

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उत्तराखंड में क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व में न आना राजनेताओं के निजी स्वार्थों और कमजोर नेतृत्व की भारी कमी रही लेकिन यूकेडी ने राज्य के मनसूबों पर पानी भी फेरा, जहां क्षेत्रीय दलों की मजबूत पैरवी भी राज्य के विकास के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता था वहीं उत्तराखंड में ठीक उल्टा हुआ और इन 16 सालों में न ही क्षेत्रीय दल न तो जलवा दिखा पाए और न ही कमाल। लेकिन चुनाव आते ही फिर एक बार क्षेत्रीय दल तेजी से जनता के बीच अपनी पैंठ बनाने की जुगत में हैं लगभग उत्तराखंड में 15-20 राजनीतिक दल और राष्ट्रीय पार्टियां हैं लेकिन असल जनता के मुद्दों पर सभी दल फेल रहे हैं सिर्फ 16 सालों में विकास कम और नकारात्मक राज्य के लिए ज्यादा रहा है हम सिर्फ इस बार राज्य के क्षेत्रीय दलों के रिपोर्ट की बात कर रहे हैं जो कि बहुत ही खराब रहा है इसके लिए क्षेत्रीय दलों के नीति नियंता ही जिम्मेदार हैं कि राज्य में क्षेत्रीय दलों को मजबूत न कर पाना इनके एजेंडे से बाहर था अधिकांशतः भारत के हर प्रदेश में क्षेत्रीय दलों की सरकार होती है लेकिन उत्तराखंड और झारखण्ड दो ऐसे राज्य हैं जहां क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय पार्टियों के सरकारों का ही साथ देते रहे।

उत्तराखंड गठन के बाद से क्षेत्रीय मुद्दों की सियासत करने वाले क्षेत्रीय दल प्रदेश में नहीं पनप पाए जिस दल उक्रांद ने राज्य गठन आंदोलन की नींव रखी वह उत्तराखंड बनने के बाद अपने लिए सियासी जमीन नहीं बना पाया। वहीं इसी दौरान पड़ोसी राज्यों यूपी, हरियाणा और पंजाब में क्षेत्रीय दलों से सत्ता हथिया ली। उक्रांद की विफलता के बाद परिवर्तन पार्टी और रक्षा मोर्चा जैसे क्षेत्रीय दल उभरे तो सही, लेकिन अभी तक कोई भी विधानसभा में सियासी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पाए। इन क्षेत्रीय दलों का प्रदेश में 10 प्रतिशत से भी कम वोट बैंक है।  25 जुलाई 1979 में बने उत्तराखंड क्राांति दल का राज्य गठन से पूर्व तक स्वर्णिम इतिहास रहा है राज्य आंदोलन की चिंगारी को भड़काकर शोला बनाने में उक्रांद के इंद्रमणि बड़ोनी जैसे नेताओं का अहम योगदान रहा है, लेकिन 1997 में यूपी विधानसभा चुनाव में भाग लेने को लेकर उक्रांद में पहली बार वैचारिक मतभेद गहराए थे वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव से लेकर वर्ष 2012 के बीच पार्टी का विधानसभा में प्रतिनिधित्व घटकर एक होना आपसी कलह का नतीजा है। जिसका मुख्य कारण पार्टी में खेमेबाजी रही है।

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2011 में पूर्व कैबिनेट मंत्री टीपीएस रावत ने उत्तराखंड रक्षा मोर्चे का गठन किया। उक्रांद के साथ मिलकर चुनाव में उतरने की कोशिश नाकाम रहने के बाद टीपीएस ने 2012 विधानसभा चुनाव में 50 प्रत्याक्षी उतारे। पार्टी का उक्रांद से अधिक मत प्रतिशत रहा लेकिन कोई प्रत्याक्षी नहीं जीता। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी की सक्रियता के बावजूद उनको अभी तक किसी चुनाव में कामयाबी नहीं मिली।
नैनीसार जैसा प्रदेश व्यापी मुद्दा उठा सरकार को झटका देने वाले तिवारी मानते हैं कि क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर आकर राष्ट्रीय दलों के खिलाफ उतरना होगा। यूआरएम के नेता पीसी थपलियाल भी संयुक्त फ्रंट की बात कर रहे हैं।

2000 से लेकर अब तक प्रदेश की सियासत में तैयार नहीं हुआ तीसरा विकल्प

इसके लिए राज्य की जनता और नेता दोनों जिम्मेदार हैं आखिर उत्तराखंड के लोग क्षेत्रीय दलों को क्यों नहीं चाहते हैं? क्या इनमें नेतृत्व की कमी है, निजी स्वार्थों और कमजोर नेतृत्व से क्षेत्रीय दलों का जनाधार गिरा? उत्तराखंड के लोग राष्ट्रीय पार्टियों के साथ जाना पसंद करते हैं? क्षेत्रीय दलों के लिए चेहरे की कमी? राज्य में क्षेत्रीय दलों के पतन के लिए जिम्मेदार कौन?

आखिर कौन है उक्रांद के पतन का जिम्मेदार

घर को आग लगी घर के चिराग से ही……….उत्तराखंड क्रांति दल पर यह कहावत पूरी तरह ठीक बैठती है जिन नेताओं और चेहरों पर उक्रांद को मजबूत करने का जिम्मा था, उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थों की लड़ाई में उलझकर इसको गर्त में धकेल दिया। सत्ता के आकर्षण और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते दल में कई बार फूट और बिखराव के हालात बने। उक्रांद सत्ता में भागीदार बना लेकिन हर बार सिंबल पर जीतने वाला अंत में खुद को अलग कर लेता है मौजूदा समय में भी यही हाल है। पार्टी के सिंबल पर जीते एकमात्र विधायक प्रीतम पंवार कैबिनेट मंत्री बनने के बाद से दल से पूरी तरह अलग हैं इससे संगठन मजबूत होने के बाद कमजोर होता चला गया पार्टी अब तक कई विभाजन झेल चुकी है सबसे विस्फोटक स्थिति 2011 में हुई जब भाजपा से गठबंधन तोड़ने के लिए तत्कालीन कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट और विधायक ओमगोपाल को निष्कासित कर दिया। वर्ष 2012 के चुनाव के बाद दल की बतौर क्षेत्रीय दल निर्वाचन आयोग से मान्यता तक चली गई। अब दल के दो खेमे आपस में चुनाव चिन्ह को लेकर भिड़ रहे हैं।

अब 2017 की है तैयारी

उक्रांद, यूआरएम और परिवर्तन पार्टी विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए ताल ठोक चुके हैं इनमें गठबंधन करने की बात तो होती रहती है लेकिन ऐन मौके पर सब अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं उक्रांद के सामने बड़ी दिक्कत यह है कि उसमें दो धड़े हैं जिसमें एक पुष्पेश त्रिपाठी की अध्यक्षता में है तो दूसरा त्रिवेंद्र पंवार के अध्यक्षता में चल रहा है एकमात्र विधायक प्रीतम पंवार इस बार उक्रांद का दामन छोड़ने की तैयारी में है जबकि दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल पहले ही भाजपा का दामन थाम चुके हैं यूआरएम आरबीएस रावत जैसे चेहरों के साथ कुछ ब्यूरोक्रेट्स को जोड़कर उतरने की तैयारी में हैं हालांकि अब संस्थापक अध्यक्ष टीपीएस रावत दल का हिस्सा नहीं है। परिवर्तन पार्टी को कुमांऊ में कुछ सीटों से उम्मीद है।

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