आपदा पीडितो की फरियाद कौन सुनेगा ?

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अरुण नेगी , नरेन्द्र नगर

11 सितंबर 2011 को  डौंर  में पहाड़ टूटने से 6 लोग ज़िंदा दफन हो गए वहीँ  कई घरो को आपदा अपने साथ मलबे के ढेर में तब्दील कर गयी  शायद  ही  इस तबाही  को बयां करना मुश्किल हो…..आलम कुछ इस कदर है कि आज भी यहाँ के ग्रामीण डर के साए  में जीने को मजबूर है , आपदा से पहले यह गांव एक खुशहाल गांव हुआ करता था चारो तरफ खेती हरयाली …. पर 11 सितम्बर 4 बजे  पहाड़ टूटने से एक खुशहाल गाँव खंडर में  तब्दील हो गया यहाँ के ग्रामीणों का कहना है की जब भी बरसातों का मौसम आता है वे लोग अपने आशियानों को छोड़ने को मजबूर हो जाते है और किराये  के घरों में रहना पड़ता है ,  ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के  मौसम में सभी रास्ते टूट जाते है, यहाँ तक की स्कूली बच्चे स्कूल  भी पढ़ने नही जाते , लबे समय से ग्रमीण अपने विस्थापन की मांग कर रहे है ग्रामीणों का कहना है कि वे लोग अपनी खेती करके अपना रोजमारा  की ज़िंदगी  को चलाते थे लेकिन आपदा में उनके खेत –  खलियान सब आपदा की भेंट चढ़ गए …. जहाँ एक समय चारो तरफ हरियाली दिखती थी आज वहां बंजर खेतो के सिवा  कुछ नज़र नही आता वहीँ डौंर गांव के प्रधान का कहना है कि vlcsnap-0692-03-20-23h08m39s4472011 से आपदा के बाद लगातार भू धंसाव हो रहा है जिसके चलते सभी के घरों में दरारें पड़ चुकी है उन्होंने कहा कि गांव में पीने का पानी नही है  खेती के लिए नहरे , गुंले सभी नष्ट  हो चुकी है जिससे पूरा गाँव  आज खंडर में तब्दील हो चूका है यहाँ  के ग्रामीण न जाने कितनी ही बार राज्य सरकार व  केंद्र सरकार से मदद की गुहार लगा चुके है पर प्रसाशन ने तो पहले से ही आँखे मूंदी हुई है 2011 में फौरी राहत के तौर पर कुछ ग्रामीणों व मृतको के परिवार को मुवाबजा भी दिया गया लेकिन सरकार द्वारा दिया गया मुवाबजा भी ऊँठ के मुह में ज़ीरा इस कहावत को सच करता हुआ दिखाई  देता है  , ज़िन्दगी भर की कमाई से इन ग्रामीणों ने अपने आशियानों को बनाया आज वहीँ ग्रामीण अपने आशियानो को छोड़ने को मज़बूर है  लगातार विस्थापन की मांग कर रहे ग्रामीण कई बार शासन प्रशासन से गुहार लगा चुके है पर  प्रशासन ने भी सिर्फ अस्वाशन   के अलावा कुछ करने की जहमत उठाता नही दिख रहा अब देखना यह होगा की आखिर कब तक ये लोग खौफ के साए में जीने को मजबूर रहेगे और कब  शासन प्रशासन की नींद टूटेगी….

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