उत्तराखंड में ‘जंगलराज’ को शह क्यों ?

 

प्रदेश के जंगलों में वन्य जीवों की जान पर बनी है। पिछले कुछ सालों से टाइगर, गुलदार और भालू के शिकार की घढ़ोतरी हुटनाओं में आश्चर्यजनक बई है। जंगल में अवैध शिकार के साथ ही वन्य जीव दुर्घटनाएं और मानव वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है।

 

योगेश  भट्ट

प्रदेश के जंगलों में वन्य जीवों की जान पर बनी है। पिछले कुछ सालों से टाइगर, गुलदार और भालू के शिकार की घढ़ोतरी हुटनाओं में आश्चर्यजनक बई है। जंगल में अवैध शिकार के साथ ही वन्य जीव दुर्घटनाएं और मानव वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन जंगल में तो ‘जंगलराज’ कायम है। वन्य जीवों के अवैध शिकार पर महकमे की भूमिका को लेकर विभाग के बड़े अधिकारी से लेकर सरकार तक कटघरे में है।

महकमे के जिन अफसरों पर वन्य जीवों की सुरक्षा का जिम्मा है उनकी ही भूमिका अवैध शिकार के मामलों में संदिग्ध है। पुलिस बड़ी मात्रा में वन्य जीवों के अंग बरामद करती है, यह भी साबित हो जाता है कि वन्य जीव उत्तराखंड के हैं। इसके बावजूद महकमे के जिम्मेदार अफसरों पर कोई सवाल नहीं उठता। वन्य जीवों की हत्या करने वालों को पकड़ने के बजाय विभाग की भूमिका मामले को रफा-दफा करने की रहती है। हालिया एक मामले में तो विभाग को अवैध शिकार की जानकारी देने और वन्य जीव बरामद कराने वाले मुखबिर को ही केस बनाकर गिरफ्तार कर दिया गया। अफसोसजनक स्थिति यह है कि उत्तराखंड के जंगलों में क्या कुछ चल रहा है यह जानकर एक केंद्रीय मंत्री विचलित हो जाती हैं, लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री या वन मंत्री को कोई फर्क नहीं पड़ता।
उत्तराखंड का वन महकमा इन दिनों चर्चाओं में है। फिलवक्त इसकी वजह है ‘जयराज बनाम जंगलराज’। जंगल में लंबे समय से ‘जंगलराज’ है, खासकर वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर। विभाग के ही एक चर्चित अधिकारी डीएस खाती का अभी तक एकक्षत्र राज चलता रहा है। तमाम विवादों से जुड़े होने के बावजूद मजबूत सियासी पकड़ के चलते डीएस खाती महकमे में पावरफुल पदों पर बने हुए हैं। बहरहाल वह लंबे समय से प्रदेश में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक एवं प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव के पद पर हैं। एक तथ्य यह है कि उनके इस पद पर बने रहने के दौरान तकरीबन पांच दर्जन बाघ व गुलादारों की खालें और दर्जन भर से अधिक भालू की पित्तियां पुलिस एसटीएफ पकड़ चुकी है। इतना ही नहीं बड़ी संख्या में हाथियों की मौत भी हुई है। हैरत की बात यह है कि सीधे जिम्मेदार होने के बावजूद इस सबकी आंच उन पर कभी नहीं आयी। अभी तक वह जो करते रहे, पहले तो उस पर सवाल ही नहीं उठा और उठा तो उसे दबा दिया गया। लेकिन अब विभाग में उन्हें चुनौती मिलने लगी है। वन विभाग में मुखिया के पद पर जयराज की ताजपोशी के बाद परिस्थतियां थोड़ा बदली हैं। जयराज विभाग में एक अलग साफ सुथरी छवि के अधिकारी रहे हैं उनके हौफ (हेड आफ फारेस्ट फोर्स) बनने के बाद महकमे में खासी हलचल है। जयराज के ही हालिया एक एक्शन ने विभाग में चल रही ‘अंधेरगर्दी’ को ‘बेपर्दा’ कर दिया है। मामला यह है कि मार्च के महीने में राजाजी टाईगर रिजर्व की हरिद्वार रेंज में गुलदार की खाल, मांस व हड्डियां बरामद हुई। हर बार की तरह इस मामले में लीपापोती होती कि इससे पहले ही ‘हौफ’ ने हस्तक्षेप कर दिया। इसके बाद से मामला इस कदर तूल पकड़ चुका है कि इस पर ‘हौफ’ जयराज व मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक डीएस खाती खुलकर आमने सामने आ गए हैं। खाती का आरोप है कि यह घटना विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की साजिश है। उन्होने इस मामले में अपनी ओर से जांच बैठाते हुए विभाग के मुखबिर को ही गिरफ्तार करा दिया। जबकि दूसरी ओर इस घटना में राजाजी टाईगर प्रशासन की ओर से की गयी कार्यवाही को विभाग संदिग्ध मान रहा है। ‘हौफ’ जयराज के मुताबिक मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने कुचेष्टा करते हुए अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है। उनकी ओर से इस प्रकरण में वन्य जीवों की निर्मम हत्या करने वाले दोषियों को दण्ड दिलवाने से अधिक प्रकरण को साजिश सिद्ध करने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है। दोनो अफसरों में टकराव की स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि, मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक ने मामले की जांच एक वन क्षेत्राधिकारी को सौंपी तो ‘हौफ’ ने इस पर सवाल उठाते हुए चर्चित आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया। संजीव चतुर्वेदी की पहचान भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा लेने वाले एक ईमानदार व दबंग अधिकारी की है, ‘हौफ’ के इस आदेश के बाद से तमाम वनाधिकारी खौफजदा हैं। खाती नहीं चाहते कि किसी भी कीमत पर चतुर्वेदी जांच करें। ‘हौफ’ के इस फैसले को डीएस खाती ने शासन में चुनौती दी है। बहरहाल अभी जांच शुरू नहीं हुई है, दूसरी ओर इस प्रकरण को जयराज और खाती के बीच जंग के तौर पर भी देखा जाने लगा है।
जबकि हकीकत यह है कि मुद्दा दो अफसरों के बीच जंग का नहीं बल्कि वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा का है। मुद्दा व्यवस्था और सुशासन का है। मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक डीएस खाती के विरुद्ध लगातार राज्य के वन मंत्रालय और मुख्यमंत्री को शिकायतें होती रही हैं। लेकिन उनकी पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि न पिछली सरकार में उनके खिलाफ शिकायतों की सुनवाई थी, और न इस सरकार में कोई सुनवाई है। अब इस हालिया प्रकरण के बहाने बात निकली है तो बहुत दूर तक जाएगी। इस मामले के तार वर्ष 2016 में कार्बेट टाइगर रिजर्व में हुए बाघों के शिकार से जुड़े बताए जा रहे हैं। उस समय भी खुलासा पुलिस ने किया लेकिन वन्य जीव विभाग ने मामले की लीपापोती कर रफादफा किया था। जानकारों की मानें तो निष्पक्ष जांच हुई तो संभव है कार्बेट में कई बाघों की हत्या का राज भी खुल जाए। फिलहाल सरकार के रुख से इसकी उम्मीद कम ही नजर आ रही है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वन्य जीवों जैसे संवेदनशील विषय से जुड़े होने के बावजूद सरकार इस पर गंभीर नहीं है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की जानकारी तक में यह मामला है, उन्होंने गंभीरता को समझते हुए मुख्यमंत्री को इस प्रकरण में उच्च स्तरीय जांच के लिये कहा है। इतना सब होने पर भी सरकार में सन्नाटा है। सवाल उठना स्वाभविक  है

 

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