मित्र पुलिस की तानाशाही और खाकी को बदनाम करते यशपाल सिंह

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सूचना आधिकार से प्राप्त जानकारी और सूचना आयुक्त द्वारा आरटीआइ कार्यकर्ता भूपेन्द्र कुमार को अप्रैल 2015 से अप्रैल 2016 तक दर्ज विभिन शिकायतों के सम्बन्ध मे दर्ज प्राथमिकी पर करवाई न होने से नाराज सूचना आयुक्त मे उलेखित शिकायतों का आलोकन हेतु पुलिस को निर्देश दिया . आरटीआइ की जानकारी ने मित्र पुलिस की पोल खोल कर जनता के सामने रख दी है जिससे मित्र पुलिस कहा जाता है उससे अगर शत्रु पुलिस कहे कोई बुरा नहीं है ,तो अतिशयुक्ति नहीं है राज्य मे अपराधिक मामलो की शिकायतो पर अमल ना हों इसकी वानगी है शिकायतों की  बढोतरी दिन प्रतिदिन आधिक होना और उस पर कार्यवाही ना होना मित्र पुलिस की प्रणाली पर कई सवाल खड़े कर रही है आखिर जनता की इंसाफ कब मिलेगा इन सवालो के घेरे मे कई शिकायते धीरे धीरे दम तोड़ रही है  जानकर हैरानी होती है कि पुलिस सिर्फ 17.02 फीसद शिकायतों पर ही एफआइआर दर्ज करती है एसएसपी/एसपी के माध्यम से थानों तक पहुचने वाली शिकायतों के बात करे तो एफआइआर का आकड़ा 7.4 फीसदी पर सिमट जाता है शिकायतों   मे देहरादून जनपद मे शहर कोतवाली डालनवाला , वसंतविहार और रायवाला पुलिस सबसे फिसड्डी साबित हो रही है मित्र पुलिस का रवैये की हकीकत आरटीआइ मे जब सामने आई तो आरटीआइ कार्यकर्ता ने पुलिस मुख्यालय से अप्रैल 2015 से 2016 के बीच शिकायतों और उन पर एफआइआर की जानकारी मागी थी तो जो जानकारी मिली वह पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करती है देहरादून की पुलिस को इस कसोटी पर परखा जाए तो पता चलता है कि रायवाला मे इस दौरान मे प्राप्त किसी भी शिकायत पर एफआइआर दर्ज नहीं की गई  गई जबकि शहर कोतवाली  . डालनवाला और वसंतविहार पुलिस का एफआइआर का आकड़ा दो फीसदी से भी कम है अप्रैल 2015 से अप्रैल 2016 के बीच पुलिस को 8842 शिकायते प्राप्त हुई और शहर कोतवाली मे पुलिस को 2456 शिकायते सीधे प्राप्त हुई और इनमे से 110 पर ही एफआइआर की गई जबकि एसएसपी के माध्यम से पुलिस के पास 2030 शिकायती पत्र पहुचे इन पर एफआइआर का आकड़ा और भी सिमटकर 38 रह गया. जिस पुलिस के सुरक्षा के  भरोसे जनता रहती है अगर वही पुलिस प्रसाशन जनता की फरियाद ना सुने तो आखिर जनता  कहा जाए और इंसाफ की उम्मीद किसे रखे ?जनता जाए तो जाए कहा ?किससे रखे …यह अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो चूका है ……

 

खाकी को बदनाम करते यशपाल सिंह बिष्ट

यशपाल के सिर पर कानून का रौब सिर चढ़ कर अपने ही अंदाज मे महकमे में रहे है गत 30 दिसम्बर 2016 को हुए प्रेस क्लब चुनाव मे कोतवाल महोदय ने पत्रकारों को लातों से पीटते नजर आये इस पर एफ आरआइ दर्ज ही नहीं हुई जब प्रदेश की राजधानी मे प्रेस की आजादी पर कानून के रक्षक इस तरीके का खौफनाक हमला करते है तो आम आदमी कानून के रक्षकों से किस प्रकार की आशा कर सकता है शायद कोतवाल  यशपाल सिंह बिष्ट पद के नशे मे अपनी मर्यादा को ताक पर रखकर हिंसा से कानून का खौफ दिखा कर अपनी आधिकारो को ज़ारी करना चाहते है कोतवाल को ये पता नहीं है कि इनके अपने कानून से इंसाफ का कानून कब इनके कारनामो को ले डूबेगा .                (  फाइल फोटो यशपाल सिंह बिष्ट)17392922_895446250598512_1292906432_n

कहते है पद का मद अच्छे अच्छे सूरमाओं को भी हो जाता है और फिर वो जो करता है उसे वो हर तरफ से सही लगता है। ऐसा ही में दरोगा से इन्सपेक्टर बने एसएचओ डालनवाला यशपाल सिंह बिष्ट के है । यशपाल सिंह वो नाम है जिन्हें उनके खुद के महकमे में कई बार सस्पेंड और कई बार  मुकदमो के लिए जाना जाता रहा है। वावजूद इसके ना यशपाल के तेवरों में नरमी आयी और ना उनका वो पुराना अंदाज बदला। ३० दिसम्बर को प्रेस क्लब देहरादून के चुनाव में हुए बवाल के बाद यशपाल पत्रकारों पर ही लाठियां भांजते नजर आये। हद तो तब हुई जब यशपाल एक पत्रकार को गिरफ्तार करने के दौरान लातों से पीटते कैमरे में कैद हो गए। यशपाल बिष्ट के इस रवैये की शिकायत पत्रकारों ने मुख्यमंत्री से भी की लेकिन न जाने यशपाल को किसकी शह है कि सीएम भी यशपाल पर कार्रवाई नहीं कर पाए। प्रेमनगर थाने में कैदी को अधमरा किये जाने से भी दरोगा काफी चर्चित रहे .. जो मोरल पुलिसिंग करने वाली उत्तराखण्ड पुलिस के दरोगा यशपाल बिष्ट के नाम दर्ज है। साल2016 में यशपाल ने प्रेमनगर थाने का एसओ रहते हुए एक जमीन के मामले में सुद्धौवाला जेल में सजा काट रहे एक कैदी को पूछताछ के नाम पर रिमांड पर लिया और उसके बाद कैदी को अधमरा कर वापस जेल भेजने की कोशिश की। जेलर ने कैदी का मेडिकल लाने की बात कही तो यशपाल के कारनामे सामने आ गए। यशपाल ने अपने बचाव के लिए दून अस्पताल के तीन डॉक्टरों से सांठगांठ कर कैदी का फर्जी मेडिकल बनवा लिया और जब कैदी के परिजनों ने उसका निजी अस्पताल में दोबारा मेडिकल करवाया तो यशपाल का सारा खेल सामने आ गया। तत्कालीन 17356837_895441610598976_969089426_oएसएसपी देहरादून डॉ सदानंद दाते ने मामले को गंभीर मानते हुए एसओ यशपाल बिष्ट को लाइन हाजिर कर दिया। यही नहीं कैदी के परिजनों की तहरीर पर यशपाल और उनके एक साथी एसआई सहित दून अस्पताल के तीन डॉक्टरों पर कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया गया जिसका अभी तक मामला कोर्ट में चल रहा है। यशपाल जहां  रहे वहाँ उन्होंने ऐसा वबाल किया जो चर्चित रहा . ऐसा नहीं है कि यशपाल का यह पहला मामला हो कि वो अपने अंदाज की वजह से निशाने पर आते रहते है , इससे पहले भी एसओ सहसपुर रहते हुए भी उन पर एक अखबार के पत्रकार से मारपीट करने के साथ अन्य कई संगीन आरोप लगते रहे है। श्रीनगर और टिहरी में तैनाती के दौरान भी यशपाल विवादों में रहे। टिहरी में टैक्सी यूनियन के पदाधिकारियों से मारपीट का मामले के बाद यशपाल को टिहरी से हटा दिया गया। श्रीनगर में भी यशपाल के खिलाफ मारपीट के आरोप में मुकदमा दर्ज होने की बात सामने आयी है। जिससे साबित हो जाता है यशपाल का विवादों से पुराना नाता रहा है। सीधे मुह बात करने में यशपाल को गुरेज है और वहा उत्तराखण्ड की मित्र  पुलिस की छवि को बार बार धूमिल कर रहे है यशपाल एक ऐसे पुलिस कर्मी रहे है जिन्हें आम आदमी हो या पत्रकार किसी से सीधे मुह बात करने में गुरेज है। खाकी के नशे में चूर यशपाल को उत्तराखण्ड पुलिस की मोरल पुलिसिंग की भाषा रास नहीं आती। हर बार किसी विवाद में फसने में यशपाल का आक्रामक रवैया ही सामने आता है। यशपाल को किसकी शह पर  बार बार अपने अंदाज से चर्चाओं में आ जाते है इसके पीछे किसी न किसी का हाथ अवश्य है सूत्रों की माने तो सता के गलियारे में कुछ लोगों का वरद हस्त यशपाल के सिर पर है। जिस वजह से वो खाकी को हथियार बना हर बार अपने अंदाज से महकमे और जनता को असहज करते रहे है। 30 दिसम्बर को  देहरादून के प्रेस क्लब मे हुई घटना ने पूरे प्रदेश को चौका दिया थाने के अंदर ही हवालात मे यशपाल सिंह बिष्ट ने पत्रकार के साथ बदसलूकी कर मित्र पुलिस को शर्मसार कर दिया 30 दिसम्बर को ही देहरादून के एसएसपी कार्यालय मे एसएच्ओ के विरुद्ध तहरीर दी है कि 3 माह बीत जाने के बाद भी प्रदेश के उच्च आधिकारी व डीजीपी ने कोई कदम नहीं उठा पा रहे है  एसएच्ओ द्वारा जबरन एक पत्रकार को घसीटते हुए अपने वाहन मे डाल कर थाने ले जाया गया और बंदीगृह के अन्दर थानाध्यक्ष व ओमवीर तथा अन्य पांच पुलिस कर्मियों ने पत्रकार के साथ मारपीट की लेकिन आज तक भी इनके विरुद्ध कोई भी मामला दर्ज नहीं हुआ है . देखना यहाँ  है कि अब इन घटनाओ  के साथ राज्य के उच्च पुलिस आधिकारी क्या करवाई करते है यह अभी भविष्य के गर्भ मे है.

 

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